सुर्खियों से आगे / आपको चौंकाना पसंद है, नए वर्ष में इस नई सोच से चौंकाइए

मुकेश माथुर

मुकेश माथुर

Jan 02, 2020, 12:32 AM IST

यूपीए सरकार ने जब फैसले लेने बंद कर दिए और अहंकार में डूबे उसके मंत्री ऐसे बयान भी देने लगे जो जनता और जनभावना को कुछ न समझने की तरफ संकेत करते थे तो कांग्रेसनीत सरकार के बुरे दिन शुरू हो गए थे। जनता को खासतौर पर पॉलिसी पैरालिसिस यानी जो जैसा है वैसा रहने दो, वाला उसका रवैया बहुत अखरता था।

कश्मीर जैसे कुछ मुद्दों की फाइल तो इस सरकार ने ‘कुछ नहीं हो सकता’ वाली बास्केट में डाल रखी थी। इसके बाद मोदी आए ही ठहरे हुए पानी में हलचल लाने वाली छवि के साथ। ओबामा के ‘यस वी कैन’ को बेझिझक अपनाने वाले। 


‘कुछ नहीं हो सकता’ की प्रतिक्रिया वाली मोदी सरकार ‘अब सब होगा’ की बुलेट ट्रेन पर सवार थी। मोदी 2.0 में तो इस ट्रेन की स्पीड सुपरसोनिक विमान जैसी रही। कांग्रेस जिन्हें छूने से डरती थी, उन सब मुद्दों को संबोधित करती मोदी सरकार। फिर चाहे वह पाकिस्तान पर कार्रवाई हो, कश्मीर का मसला या फिर नागरिकता का मुद्दा।

राम मंदिर पर भी फैसला तो सुप्रीम कोर्ट ने दिया, लेकिन मंत्रियों ने व्यवहार ऐसे किया जैसे उन्होंने ही इस जटिल मामले का समाधान ढूंढा हो। मोदी सरकार को हर काम लार्जर देन लाइफ करने पसंद हैं। सामान्य से बेहद बड़े, चौंकाने वाले। नोटिस होने वाले। जिनकी गूंज देश में तो क्या, उत्तरी से दक्षिणी ध्रुव तक हो सके।

सबसे बड़ी मूर्ति, बुलेट ट्रेन, चांद पर कदम... सब ह्यूज यानी बहुत बड़ा, विशाल। अंतरिक्ष में युद्ध समय की सबसे बड़ी मांग है, यह मोदीजी ने ही ठीक चुनाव से पहले हमे समझाया। हमारा दिया कोई ऐसा दिन भी होना चाहिए, जिसे दुनिया मनाए, तो योग दिवस हुआ। इतना ही नहीं अब अपने दुश्मन को दूसरे देश में घुसकर सिर्फ अमेरिका ही नहीं मार सकता।


चौंकाने, लोहा मनवाने के इस जज्बे से वाकई हम नोटिस होना शुरू हो गए। धीर-गंभीर, चिंतक राष्ट्र से आक्रामक राष्ट्रवादी देश तक का सफर। वह जो हर चीज वर्ल्ड क्लास तो करना चाहता ही है, साथ ही अपनी दशकों से चली आ रही समस्याओं से भागता नहीं, बल्कि उन पर बड़े फैसले भी करता है।

नागरिकता पर फैसला लेने की बातें कांग्रेस सरकार करती रही, लेकिन लिया मोदी ने। उन वामपंथियों के आदर्श रहे राष्ट्रों में भी नागरिकता के कड़े कानून हैं, जो सरकार की सर्वाधिक आलोचना कर रहे हैं। जो अमेरिका भारत के इस कदम को ‘धर्म आधारित’ बताकर एडवाइजरी जारी कर रहा है, वह अपने एयरपोर्ट पर हर ‘खान’ को अतिरिक्त जांच से गुजारता है।

फिर भी, हमारी सरकार का इरादा जो भी हो, उसके नुमाइंदे चाहते यही हैं कि यह मुद्दा हिंदू-मुसलमान में बदल जाए। उन्हें अपने हर काम की बड़ी गूंज जो चाहिए। लेकिन मुद्दा तो यह है कि चौंकाने वाले फैसलों के बीच जनभावना वाले असल कामों पर भी फैसले लेकर ‘यूपीए’ होने से बचने का समय आ गया है। यह ठीक है कि जनभावना को धर्म-देश आधारित भावुकता में तब्दील करने का साइंस सफल है।

काम-धंधा, व्यवसाय, उद्यम, रोजगार, महिला सुरक्षा और मूल जरूरतों की जगह चौंका देने वाले फैसले ध्यान खींच भी रहे हैं। पर अब नए साल में कुछ नहीं चौंकाने वाले ही सही, लेकिन जरूरी काम किए जा सकते हैं। शुरुआत अपने ही ‘जोरदर आइडिया, कमजोर क्रियान्वयन’ वाले स्किल इंडिया, मेक इन इंडिया में नई जान फूंककर की जा सकती है। शायद बेरोजगारी से निपटने का रास्ता यहां से मिले।

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