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सौम्यता हमारी तासीर है, पर आज हम उग्र हैं

एक वर्ष पहलेलेखक: मुकेश माथुर
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प्रतीकात्मक फोटो। - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक फोटो।

हाथ में तिरंगे, पोस्टर पर गीता के श्लोक। सीएए के पक्ष और विपक्ष में हाे रहे आंदोलनों की सौम्य तस्वीर। हालांकि, तिरंगा हाथ में क्यों है, इस पर भी टिप्पणियां। उग्र होती हमारी सोच। व्याकरण में सौम्य का विलाेम ‘उग्र’ है। सौम्यता हमारी तासीर है, लेकिन अब हम अपनी प्रकृति के विपरीत व्यवहार कर रहे हैं। शायद यह एक दौर भर है। गुजर जाएगा। हम फिर से सौम्य हो जाएंगे।  नेता-जनता, मीडिया-कलाकार, नीति-व्यवस्था,  समर्थन-विरोध, सोच-प्रतीक, क्रिया-प्रतिक्रिया। हर कहीं उग्रता हमारी सौम्यता को चुनौती दे रही है। प्रधानमंत्री ने शबाना आजमी के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की। लेकिन कुछ लोग आश्चर्यजनक तरीके से ‘आरआईपी’ शबाना लिख रहे थे। कुछ और लोग हैं जो उस दिन प्रधानमंत्री के सीढ़ी पर फिसल जाने पर भी बुरा लिख रहे थे। अगर आप कहते हैं कि बेलगाम सोशल मीडिया से समाज की साेच का अंदाजा मत लगाइए तो ये लीजिए- सीएए के इन्हीं आंदोलनों में चौराहों पर कश्मीर की आजादी के पोस्टर और धर्मों के खंडित किए गए प्रतीक भी हैं। सौम्यता खोती जनता। लेकिन सोच-व्यवहार के पिरामिड में जो शीर्ष से आता है, वही तो नीचे तक जाता है। कांग्रेस मुक्त भारत और चौकीदार चोर जैसे उग्र नारे कौन सा कानों में मिश्री घोलते थे? नेताओं के नारे, बयान, विचार, बर्ताव सभी उग्र। 6 जुलाई, 2000 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कोलकाता की एक झुग्गी में पहुंचे थे। नाराज होकर दिल्ली से लौट आईं अपनी मंत्रिमंडल सहयोगी ममता बनर्जी को मनाने। चर्चा थी कि उनकी पार्टी भाजपा नीत राजग छोड़ देगी। ममता की माता गायत्री देवी के पांव छूते हुए अटल बस इतना ही बोले- ‘आपकी बेटी बड़ी गुस्से वाली हैं। इन्हें बार-बार मनाना पड़ता है।’ देश के प्रधानमंत्री के इस सौम्य व्यवहार ने उस झोपड़ी में मुस्कुराहट और देश की राजनीति में सुगमता बिखेर दी। सहयोगियों ही नहीं, विरोधियों के साथ भी यही सौम्यता नजर आया करती थी। वाजपेयी ने इंदिरा को दुर्गा का नाम तो दिया ही, ममता को अग्नि गणना की उपमा भी उनकी ही दी हुई थी। आज मौत का सौदागर और मानसिक विमंद जैसे संबोधन दिए जा रहे हैं। सौम्यता और उग्रता ऊपर से नीचे तक कैसे आती है, इसके सबसे बड़े उदाहरण हाल ही के हैं। अयोध्या पर फैसला। प्रधानमंत्री का ट्वीट और विपक्षी दलों का संयम। इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास में दर्ज होने लायक है। क्या देश के सबसे विवादित धार्मिक मुद्दे पर आए फैसले के बाद करोड़ों लोगों की ऐसी संयमित प्रतिक्रिया का उदाहरण दुनिया में कहीं मिल सकता है? दूसरी तरफ सीएए के मामले में सरकार और विपक्ष को संवेदनशीलता चाहिए ही नहीं थी। नफरत की आग में झुलसता देश ही चाहिए था। अपने-अपने दूरगामी लक्ष्य। 1951 में रेल दुर्घटना के बाद रेलवे मंत्री लालबहादुर शास्त्री ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया था। बकौल ‘पीएम इंडिया डॉट कॉम’ तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इस्तीफा स्वीकार करते हुए संसद में कहा, मैंने शास्त्रीजी का इस्तीफा इसलिए नहीं स्वीकार किया है कि वे दुर्घटना के लिए जिम्मेदार हैं, बल्कि इसलिए स्वीकार किया है, क्योंकि इससे संवैधानिक मर्यादा में एक मिसाल कायम होगी। मर्यादा, सदाशयता, बड़प्पन, क्षमा जैसे गुणों से रची-बसी हमारी राजनीतिक-सामाजिक सौम्यता नफरत के इस दौर के बाद लौटेगी, इस उम्मीद के साथ... हमारा देश।

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