खुली बात / रेप के नाबालिग दोषियों को न मिले कोई राहत

प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

  • 2012 से 2018 के बीच 18 साल से कम के 12,125 किशोरों पर दर्ज किए गए हैं दुष्कर्म के मामले

दैनिक भास्कर

Jan 15, 2020, 12:00 AM IST

(आरके सिन्हा, राज्यसभा सांसद). निर्भया के साथ दुष्कर्म और फिर उसकी हत्या करने वाले चारों गुनाहगारों को आगामी 22 जनवरी को फांसी की सजा दे दी जाएगी। पर, इस भयानक केस से जुड़े एक नाबालिग दोषी के खिलाफ कोई एक्शन नहीं होगा। आखिरकार, इस तरह 7 साल 37 दिन के बाद ही सही निर्भया को इंसाफ मिलेगा।

इसके साथ ही यह भी सवाल है कि दुष्कर्म की शिकार हुई हजारों अन्य महिलाओं को इंसाफ कब मिलेगा। हालांकि, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। यही दुष्कर्मियों के हौंसले बुलंद करता है। निर्भया के साथ जब दुष्कर्म हुआ था, तब भी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में रोज 68 दुष्कर्म हो रहे थे। 

तब से अब तक दुष्कर्म के मामले 33 फीसदी बढ़े ही हैं। यानी अब रोज 90 दुष्कर्म हो रहे है। ये आंकड़े डराते हैं। आंकड़े नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक, देश में 2012 में दुष्कर्म के 24,923 मामले दर्ज हुए थे। 


अगर बात दिल्ली भर की ही करें तो यहां 2012 में दुष्कर्म के 706 मामले सामने आए थे, 2019 में 15 नवंबर तक ही दुष्कर्म के 1947 केस दर्ज हो चुके थे, यानी सात साल में दिल्ली में दुष्कर्म के मामले 176 फीसदी बढ़े। इन पर रोक तो तब ही लग सकती है, जब दोषियों को त्वरित और सख्त सजा मिले। अगर इस मोर्चे पर हम विफल रहे तो देवी की आराधना करने वाले भारत में नारी शक्ति का अपमान होता रहेगा।

देश की सभी अदालतों में 2018 के अंत तक 1.38 लाख से ज्यादा  रेप के मामले लंबित थे। 2018 में सिर्फ 27 फीसदी मामलों में ही सजा मिल सकी। अगर हम यह सोच रहे हैं कि निर्भया के दोषियों को सजा देकर हमने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है तो यह हमारी भूल ही होगी।

हमने निर्भया के बाद से बलात्कारी तत्वों के खिलाफ क्या बड़ी कार्रवाई की। इन सब प्रामाणिक सरकारी अांकड़ों को देखकर तो यही लगता है कि दुष्कर्मी मानसिकता के लोगों को कानून का कोई डर ही नहीं है। उन्हें भरोसा है कि वे जैसे-तैसे, कुछ न कुछ तरकीब/जुगाड़ से अंतत: बच ही जाएंगें। 


ताजा हालत यह है कि 2018 के अंत तक देश की अदालतों में दुष्कर्म जाे 1.38 लाख मामले चल रहे हैं, उनमें से सिर्फ 17,313 मामलों में ही जिरह पूरी हुई है और सिर्फ 4708 मामलों में ही सजा सुनाई गई। 2018 में सजा देने की दर 27.2 फीसदी रही, जो 2017 की तुलना में पांच फीसदी कम है।

एक बात बहुत साफ है कि दुष्कर्म में नाबालिगों को किसी भी तरह से राहत नहीं मिलनी चाहिए। चार साल पहले निर्भया कांड के नाबालिग दोषी के रिहा होने की स्थिति में दिल्ली सरकार के महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने उसके पुनर्वास की योजना पेश की थी। इसके मुताबिक दिल्ली सरकार उसे 10 हजार रुपये की आर्थिक मदद और एक सिलाई मशीन देने की बात कही थी, ताकि वो दुकान किराए पर लेकर टेलरिंग का काम कर सके।

दिल्ली सरकार के इस कदम पर ऐतराज जताते हुए केंद्र ने उस समय कहा था कि अभी नाबालिग दोषी की मानसिक स्थिति संदिग्ध है। इसलिए केंद्र चाहता है कि अभी उसे बाल सुधार गृह में ही रखा जाए। यह बात समझ से परे है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सरकार ने नाबालिग दोषी को लेकर इतना उत्साह क्यों दिखाया था। क्या उन्हें मालूम नहीं था कि इसी नाबालिग ने असहाय निर्भया के साथ दानवों से भी ज्यादा नृशंस कुकृत्य किया था।


बहरहाल, 2012 से 2018 के बीच 12,125 नाबालिगों पर दुष्कर्म के मामले दर्ज किए गए हैं। अगर इन सात सालों का औसत निकाला जाए तो हर दिन पांच नाबालिगों पर दुष्कर्म के केस दर्ज हुए। दुष्कर्म के मामलों के अलावा 2012 से 2018 के बीच 10,052 नाबालिगों पर महिलाओं के खिलाफ अत्याचार से जुड़े केस दर्ज दिए गए।

साफ है कि रेप जैसे जघन्य कांड में लिप्त नाबालिगों पर भी कसकर कानून की चाबुक चलनी चाहिए। रेप से जुड़े मामलों के लिए या तो अलग से कोर्ट बने या फिर उन्हें निपटाने की कोई समय सीमा तय होनी चाहिए। रेप संबंधी केस लटकने नहीं चाहिए। अगर रेप से जुड़े मामलों पर भी तारीख पर तारीख दी जाती रहेगी तो फिर हम इन्हें कैसे रोक पाएंगे।

इस तरह के मामलों को लेकर सरकार और समाज का रुख भी एक है। तो फिर दुष्कर्मियों पर हल्ला क्यों नहीं बोला जाता है? रेप से जुड़े केस एक साल के अंदर ही खत्म हो जाने चाहिए। यानी इस दौरान दोषियों को सजा मिल जानी चाहिए। अगर हम इस तरह का उदाहरण पेश करेंगे तो सारी दुनिया में भारत का सम्मान बढ़ेगा।

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