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मनमोहन-2 जैसे हश्र की ओर मोदी-2 के कदम

8 महीने पहलेलेखक: योगेंद्र यादव
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सीएए और एनआरसी के विरोध में देशभर में हो रहा प्रदर्शन। (फाइल फोटो)
  • सिर्फ पूर्वोत्तर और मुस्लिमों तक सीमित नहीं रह गया है नागरिकता संशोधन कानून का विरोध

क्या मोदी सरकार की दूसरी पारी में उसकी वही गति होगी, जो मनमोहन सिंह सरकार की दूसरी पारी में हुई थी? हालांकि नरेंद्र मोदी की दूसरी पारी की शुरुआत मनमोहन सिंह की तुलना में ज्यादा धमाकेदार थी, लेकिन इस पारी में मोदी सरकार की साख कहीं ज्यादा तेजी से गिरती दिखाई दे रही है। नागरिकता संशोधन कानून संसद में पास होने के बाद से पिछले एक महीने से पूरे देश ने एक अभूतपूर्व उथल-पुथल देखी है। पिछले महीने भर में इस जन-उभार के चरित्र में बदलाव हुआ है। यह केवल पूर्वोत्तर और मुस्लिम समाज के प्रभावित वर्गों का आंदोलन नहीं, बल्कि देश के युवजन का आंदोलन बन चुका है। अब यह केवल एक कानून या एक मुद्दे पर विरोध नहीं है, बल्कि एक समग्र जनआंदोलन की शक्ल ले चुका है। यह केवल विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सकारात्मक आंदोलन का रूप ले चुका है। शुरुआत में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध केवल उन समुदायों द्वारा हुआ, जिन्हें इससे सीधा नुकसान होने की आशंका थी। इस कानून के पास होते ही असम और पूर्वोत्तर के कुछ अन्य राज्यों में जो जबरदस्त प्रतिरोध शुरू हुआ वह आज भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। इस आंदोलन ने असम गण परिषद सहित सभी राजनैतिक दलों को किनारे कर दिया है और इसकी कमान युवाओं ने थाम ली है। इसे नैतिक बल असम के साहित्यकार और कलाकार दे रहे हैं। अब यह आंदोलन बड़े शहरों से उतरकर गांव-गांव तक पहुंच चुका है। याद रहे कि असम और त्रिपुरा में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वाले अधिकांश लोग हिंदू हैं। उन्हें अपनी भाषाई पहचान की चिंता है। आज असम में भारतीय जनता पार्टी और उसकी सहयोगी असम गण परिषद के नेताओं को मुंह छुपाने की जगह नहीं मिल रही है। उसके तुरंत बाद मुस्लिम समुदाय का देशव्यापी विरोध शुरू हो गया। पिछले पांच साल से परेशान और सशंकित मुसलमान को इस सरकार के खिलाफ अब आवाज उठाने पर मजबूर होना पड़ा। यहां भी मुस्लिम समुदाय ने अपने राजनीतिक और धार्मिक ठेकेदारों को दरकिनार कर दिया है। देशभर में स्वत: स्फूर्त तरीके से मुस्लिम समाज अपनी नागरिकता बचाने की लड़ाई में खड़ा हो रहा है। कुछ हिंसा की घटनाओं के बावजूद कुल मिलाकर यह आंदोलन शांतिपूर्ण रहा है। तिरंगे झंडे के तले, संविधान की दुहाई देकर और और देशप्रेम के नारों के साथ यह आंदोलन देश भर में फैल गया है। शाहीन बाग की तर्ज पर चल रहे महिलाओं के संघर्षों ने इस आंदोलन को एक अनूठा स्वरूप दिया है। बीजेपी ऐसा सोच सकती है कि उसे मुसलमानों का वोट तो मिलता नहीं था तो उनके आंदोलन से उसे कोई नुकसान नहीं होगा। चुनावी रणनीतिकार इसमें बीजेपी का नफा भी ढूंढ़ सकते हैं। लेकिन अंततः अगर समाज का कोई वर्ग नैतिक आधार पर सरकार का विरोध करता है तो कहीं ना कहीं उसका असर सरकार की साख पर पड़ता है। सरकार के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात इस आंदोलन में छात्रों और युवाओं का जुड़ना है। जामिया विश्वविद्यालय में पुलिस की बर्बरता के विरुद्ध सिर्फ एक समुदाय के नहीं, बल्कि देशभर के विद्यार्थी खड़े हुए। जेएनयू के विद्यार्थियों के साथ पुलिस के संरक्षण में हुई हिंसा का विरोध उन विश्वविद्यालयों में भी हुआ, जहां आमतौर पर छात्र राजनीति गर्म नहीं रहती है। इस बहाने छात्रों का अन्य कई मुद्दों पर सुलगता हुआ आक्रोश भी अब फूट पड़ा है। कैंपस में लगाई गई तमाम उटपटांग बंदिशों से विद्यार्थी परेशान हैं, अधिकारियों द्वारा शिशुवत व्यवहार से अपमानित महसूस करते हैं और शिक्षा तथा रोजगार के सही अवसर न मिलने से चिंतित हैं। अन्ना आंदोलन गवाह है कि जब युवा वर्ग में किसी सरकार की साख गिरने लगती है तो फिर वह जंगल में आग की तरह फैल जाती है। आज मोदी सरकार के सामने कुछ ऐसा ही खतरा मंडरा रहा है। अब यह आंदोलन किसी छिटपुट विरोध प्रदर्शन से बढ़कर एक राष्ट्रव्यापी जनआंदोलन का रूप ले चुका है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध की दोनों धाराएं अब युवा आंदोलन से जुड़ गई है। अब इस आंदोलन में वह वर्ग भी जुड़ रहे हैं जिन्हें सीधे तौर पर नागरिकता संशोधन से कोई खतरा नहीं है। इनकी संख्या भले ही कम हो, लेकिन इनकी भागीदारी से आंदोलन को नैतिक आभा मिलती है। किसी भी बड़े आंदोलन की तरह इसमें भी अब कवि, लेखक, कलाकार और अभिनेता सब शामिल होने लगे हैं। नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के विरोध से शुरू हुआ यह आंदोलन अब एक "भारत जोड़ो आंदोलन» में बदल चुका है। जो लोग नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के विरोधी नहीं भी हैं, उन्हें भी समझ आने लगा है कि कहीं ना कहीं यह सारा मुद्दा देश का ध्यान असली समस्याओं से बांटने के लिए उठाया जा रहा है। आज जब देश के सामने बेरोजगारी चरम सीमा पर पहुंच गई है, देश मंदी की मार का शिकार है, खेती किसान और गांव पर संकट है और महंगाई फिर सर उठाने लगी है, ऐसे में नागरिकता के सवाल पर हिंदू-मुसलमान को बांटने की रणनीति अब लोगों को साफ दिखने लगी है। जनलोकपाल आंदोलन के सामने मनमोहन सिंह सरकार को समझ नहीं आया कि वह क्या करें? इस अनिश्चय में वह सरकार चली गई। मोदी सरकार का चरित्र बिल्कुल अलग है। अनिश्चय या कदम पीछे खींचने की बजाए इस सरकार की प्रवृत्ति आक्रामक रहने की है। इसलिए तमाम विरोध के बावजूद सरकार ने नागरिकता संशोधन को अधिनियमित कर दिया और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के काम को चालू कर दिया है। उत्तर प्रदेश में किसी भी विरोध-प्रदर्शन पर पुलिस के हमले और जेएनयू की हिंसा से सरकार की नीयत साफ है कि वह इस जनांदोलन का दमन करेगी। जन आंदोलनों का इतिहास बताता है कि इनका दमन अल्पकाल में सफल हो सकता है, लेकिन दीर्घकाल में वह सरकार और समाज दोनों के लिए घातक साबित होता है। (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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