सुर्खियों से आगे / मुई! कोख न होती तो महिला, दुनिया के हर दर्द से परे होती!

नवनीत गुर्जर

नवनीत गुर्जर

Dec 04, 2019, 12:52 AM IST

आजकल ज्यादातर रामायणों में लव-कुश काण्ड होता ही नहीं है। वाल्मीकि रामायण के इस काण्ड में एक मार्मिक क्षेपक है। वाल्मीकि आश्रम में रह रही सीता जब पास ही पानी लेने जाती हैं तो देखती हैं- एक बंदरिया अपने बच्चों को छाती से चिपकाकर कुएं की पाल पर इधर-उधर कूदती फिर रही है। सीता पूछती हैं- ये बच्चे कुएं में गिर गए तो?

जवाब मिलता है- इस बच्चे का जो भी होगा, उसकी मां के सामने होगा। तेरा बच्चा (लव) तो वहां आश्रम में सो रहा है... और ऋषि वाल्मीकि ध्यान में मग्न हैं। कौन उठा ले जाएगा, किसको खबर? सीता दौड़ी चली आईं आश्रम... और लव को साथ ले आईं। ऋषि का ध्यान टूटा तो देखा- झोली (पलना) खाली। मन में प्रश्न उठा- सीता को क्या जवाब दूंगा? तकिए से निकालकर काश का एक तिनका झोली में डाला और झूला दे दिया। बन गया कुश! लव का छोटा भाई।


अर्थ ये, कि अनहोनी होने पर अपना परलोक सुधारने के जवाब सबके पास थे। बंदरिया के पास जवाब था कि जब तक सांसें रहीं, बस चला, तब तक बच्चे को छाती से चिपकाए रखा। सीता के पास जवाब था- जैसे ध्यान आया- दौड़ी चली आई। ऋषि तो कुश देकर जवाब दे ही चुके थे। हम पुरुषों के पास जवाब क्या है? कहां है? वो पुरुष कैसे हैं जो नराधम बनकर बच्चियों के साथ ग़लत कर रहे हैं। उन्हें मार रहे हैं और जला रहे हैं? 


बच्चियों के साथ हो रहे इन अन्यायों, इन दुष्कर्मों का सिलसिला गर्भ से ही शुरू हो रहा है। कोई उन्हें गर्भ में ही मार दे रहा है। कोई उन्हें गर्भनाल कटते ही मौत की नींद सुला रहा है और ज्यादातर उन्हें बड़ी होने, ब्याहने, मां बनने ही नहीं दादी-नानी बनने के बाद भी नहीं बख्स रहा है। महिला कहीं भी और किसी भी उम्र में सुरक्षित नहीं है।

क्या इस देश के पुरुष इतने क्रूर हो चुके हैं कि जिस कोख से वे निकले हैं, उसका भी सम्मान नहीं कर सकते? दुनिया में कई देश हैं जो दावा करते हैं कि उनके यहां क्राइम रेट ज़ीरो है। क्या वहां महिलाएं नहीं रहतीं? क्या वहां के पुरुष सच में महिलाओं का सम्मान करना जानते हैं? हो सकता है ऐसा हो। लेकिन उन देशों में ऐसा होने के पीछे वहां के कड़े क़ानून हैं।

चोरी की तो सरेआम हाथ काट डालो। दुष्कर्म किया तो चौराहे पर फांसी दे दो। हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं है। नेताओं और उनके बच्चों के लिए अलग व्यवस्था, धनी लोगों के लिए अलग और कई मामलों में तो अलग-अलग धर्म के लोगों के लिए भी अलग! यह सब क्यों? अगर दुष्कर्म करने वाले पकड़े गए हैं तो लंबी सुनवाई, लंबी बहस की ज़रूरत ही क्यों? कम से कम दुष्कर्म के मामलों में तो यह हो ही सकता है कि चौराहे पर खड़ा कीजिए और लटका दीजिए फांसी पर।

दया याचिका जैसे प्रावधान भी क्यों होने चाहिए? कैसी दया? और क्यों? विधानसभाएं हैं, संसद हैं, लेकिन कोई ऐसे क़ानून बनाने के लिए आगे आने को तैयार नहीं है। इन्हें पता है कि हर दुष्कर्म के बाद कुछ दिन शोर होगा, फिर शांति। क्योंकि जिस समाज को आगे आना चाहिए, जिस विधानसभा या संसद को आगे आना चाहिए, ये सब पुरुष प्रधान हैं। इन कापुरुषों को किसी से कोई मतलब नहीं है। कम से कम महिलाओं के साथ हो रहे अन्यायों के इस दौर में तो यह कहा ही जा सकता है। पुरुषों की इस क्रूरता पर थक-हारकर सिर्फ़ यही कहा जा सकता है कि मुई कोख न होती तो महिला दुनिया के हर दर्द से परे होती।

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना