जीने की राह / जरूर करें वार्तालाप की दुनिया की सैर

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Jan 15, 2020, 12:09 AM IST

जिंदगी के रंग बहुत तेजी से बदलते रहते हैं। एक रंग में जीवन कभी नहीं बीतता। आज दुख है तो कल सुख है। धूप-छांव, रात-दिन, ईर्ष्या-प्रेम, निंदा-प्रशंसा.. सब जिंदगी में अलग-अलग ढंग से मिलता रहेगा। इसलिए इतना तो तय मान लीजिए कि जीवन कभी एक ढर्रे पर नहीं चलेगा। हमारी तैयारी कमजोर हुई तो जिंदगी बोझ हो जाएगी।

जीवन में थोड़ा हल्का होना सीखिए और उसके लिए एक प्रयोग करें। अपनी एक ऐसी मंडली तैयार करें जो कहासुनी का ग्रुप हो। इसे यूं समझा जाए कि अपने व्यवहार, व्यवसाय और संबंधों के चलते हम जिंदगी में बहुत से लोगों से बात करते हैं, उनके साथ उठते-बैठते हैं। उसके बाद थक भी जाते हैं, क्योंकि मनुष्य के मस्तिष्क की रचना बड़ी जटिल है।

100 अरब से अधिक स्नायुकोष हैं इसमें। इसीलिए विज्ञान कहता है कि मनुष्य का मस्तिष्क अंग नहीं, अंगों का समूह है। इस खोपड़ी को संतुष्ट करना तो बहुत मुश्किल है। हां, अपने उठने-बैठने को तीन भागों में बांट लें तो शायद इसको थोड़ा संतोष मिल जाए। इसके लिए तीन ग्रुप बना लीजिए।

एक ऐसा जिसमें आप मस्तिष्क से बात करें। आपस में जो भी विचार-विमर्श हो उसका स्तर ऊंचा हो। दूसरा एक ग्रुप ऐसा बनाएं, जिसमें बातचीत हृदय से की जाए। और तीसरा ऐसा ग्रुप ऐसा हो, जिसमें सदस्यों में बोलने से अधिक शून्य होकर बातचीत सुनने की क्षमता हो। अपनी दिनचर्या में कुछ समय मस्तिष्क को रोककर, शून्य होकर वार्तालाप की दुनिया की सैर जरूर करें। 

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