संदर्भ / मजबूत सरकार नहीं, मजबूत नागरिक अहम

प्रीतीश नंदी

प्रीतीश नंदी

Dec 05, 2019, 12:23 AM IST

महाराष्ट्र में सरकार बनाने वाला महा विकास आघाड़ी कई तरह से भविष्य के संकेत देता है। यह कोई ऐसा गठबंधन नहीं है, जैसा पहले नहीं बना हो। इनमें कुछ सफल रहे और कुछ विफल हो गए। लेकिन, शायद ही पहले ऐसा हुआ हो जब पूरी तरह भिन्न इतिहास और विचारधारा वाले तीन दल अपने सभी मतभेदों को भुलाकर एक दंभी व जनता की बात को न सुनने वाले शासन का विकल्प देने के लिए ऐसे न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत साथ आए हों, जिसमें तीनों अपनी अलग पहचान को कायम रखते हुए साथ काम कर सकते हैं।


अाघाड़ी ने एक तरह से आने वाले समय में विचारधाराओं की तकदीर तय कर दी है। बाकी दुनिया की तरह हम भी अब राजनीति के एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं, जहां पहले की जाति, धर्म व विचारधारा की बड़ी-बड़ी बातों व उनके परस्पर विरोधी इतिहास पर कुछ समय के लिए रोक लगेगी।

हम तकनीक, डाटा, मीडिया, पर्यावरण की चिंता व मानव के भविष्य को संचालित करने वाली बदलाव की ताकतों के बीच ऐसे आसान गठबंधन बनते हुए देख सकते हैं। अगर और कुछ नहीं तो भी यह हमें बाकी दुनिया के साथ शामिल करेगा और उम्मीद है कि देश को जला रही संघर्ष और टकराव की राजनीति से बाहर निकलने का कोई रास्ता सुझाएगा।


इसके अलावा यह महाराष्ट्र में पिछले पांच सालों से चल रहे शासन के तरीके में भी वांछित बदलाव ला सकता है। संभवत: हमें फिर से एक ऐसी शासन व्यवस्था मिलेगी, जो हर तरह के विरोध की आवाजों को सुनने के लिए तैयार होगी। फिर वह चाहे आत्महत्या के लिए मजबूर किया जा रहा गरीब किसान या बेरोजगार युवा हो, नोटबंदी और जीएसटी की वजह से अपनी आजीविका खाेने वाले व देश की 80 फीसदी वास्तविक अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करने वाले छोटे व्यापारी हों अथवा जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण को हो रहे नुकसान से चिंतित लोग।


उद्धव ठाकरे द्वारा उठाए गए कुछ कदम दिखाते हैं कि और कुछ न भी हो तो भी वे असहमति के स्वरों को सुनने के लिए तैयार हैं। उद्धव अनुमानित लगते हैं, लेकिन वे स्पष्ट तौर पर ऐसा कुछ करने की तैयारी में हैं, जिससे फड़नवीस सरकार के बहरेपन की वजह से चोट खाए लोगाें की चिंताओं का निराकरण हो सके।

किसानों से तत्काल राहत का वादा किया गया है। उन्होंने आश्वासन दिया है कि आरे में मेट्रो कार शेड के लिए अब एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। उन्होंने यह वादा भी किया है कि शहर की पर्यावरणीय धरोहर आरे को एक बार फिर से पहले की तरह वन विभाग को दे दिया जाएगा। मेट्रो पर काम जारी रहेगा, लेकिन कार शेड के लिए कोई और जगह तलाशी जाएगी।


उन्होंने यह भी कहा है कि मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना पर भी पुनर्विचार होगा। इसकी व्यावहारिकता का अध्ययन किया जाएगा। इसके रूट पर विस्थापित होने वाले लोगों और गांवांे के बारे में भी जांच होगी। इसके बाद अगर राज्य को लगता है कि केंद्र सरकार का यह तकनीकी शोपीस अपनी कीमत के मुताबिक काम का नहीं है तो वह इसे खत्म करने के लिए कह सकती है।

वह चाहेगी कि इस पर खर्च होने वाले धन को मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली उपनगरीय रेल सेवा नेटवर्क पर खर्च करना चाहिए, जिसके आधुनिकीकरण की बहुत आवश्यकता है। हकीकत में तो लोगों को बाहर दूसरे शहर जाने से पहले काम पर जाने की जरूरत होती है।

इसके अलावा यह रिसर्च भी रुचिकर हो सकती है कि कैश और सोने को लाने व ले जाने वाले अंगादिया को छोड़कर कितने मुंबईवाले सालभर में अहमदाबाद जाते हैं। साथ ही यह भी पता करने की जरूरत है कि इनमें से कितने लोग तड़क-भड़क वाली बुलेट ट्रेन का किराया वहन करने में सक्षम हैं।


आरे में हजारों पेड़ों को काटने के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोगों पर दर्ज एफआईआर को भी वापस लिया जा रहा है। अब संभवत: किसानों से ऐसे वादे नहीं किए जाएंगे, जिनको पूरा न किया जा सके। पिछले कुछ सालों में हुई ऐसी गलतियों को सुधारा जा सकता है। लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण क्या है? हमारे पास अब ऐसी सरकार और ऐसा मुख्यमंत्री है, जो लोगों को सुनने को तैयार है।

यही वो बात है, जो अंतर पैदा करेगी। यह बात मायने नहीं रखती कि कितने दल साथ मिलकर काम कर रहे हैं और उनमें हिंदुत्व या धर्मनिरपेक्षता पर समानता है या नहीं। इसका भी कोई मतलब नहीं है यह सरकार कितने दिन चलेगी। यह बात भी कोई अर्थ नहीं रखती कि अवैध तरीके से शपथ लेने वाली 80 घंटे की फड़नवीस सरकार में उपमुख्यमंत्री बनने वाला इस सरकार में भी उपमुख्यमंत्री बनता है या नहीं। जो मायने रखता है वह है नीयत। यह सरकार क्या करना चाहती है और क्या यह अपने नागरिकों की बात सुनेगी?


यही वह जगह है, जहां पर राहुल बजाज की चेतावनी गंभीर रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर लोग प्रदर्शन करने से डरते नहीं हैं। अगर वे जानते हैं कि हमारे पास एक अच्छी सरकार है, जो अपने लोगों की बात सुनने के लिए तैयार है, भले ही वह आलोचना ही क्यों न हो।

यही तो था जिसकी कमी पिछले पांच सालों से महाराष्ट्र महसूस कर रहा था। ठाकरे इसे वापस ला सकते हैं और हमें दिखा सकते हैं कि लोकतंत्र का भविष्य सुरक्षित है और इसी तरह महाराष्ट्र का भविष्य भी। यह भी याद रखें कि एक मजबूत सरकार नहीं मजबूत नागरिक महत्वपूर्ण है।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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