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  • Not Only Government Spending On Health, The System Also Improved

स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च ही नहीं व्यवस्था भी सुधरे

7 महीने पहलेलेखक: रीतिका खेड़ा
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प्रतीकात्मक फोटो।
  • हमारे देश के स्वास्थ्य ढांचे की विकसित देशों से तुलना, समीक्षा और फिर सुधार की जरूरत

दिसंबर 2019 में, गुजरात में अहमदाबाद और राजकोट के सिविल अस्पताल में 199 बच्चों की मौत हुई। उसी महीने में, कोटा (राजस्थान) के जिला अस्पताल में सौ बच्चों ने इलाज के दौरान अपनी जान गंवाई। अगस्त 2017 में, उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में केवल एक दिन में 23 बच्चों के मौत हो गई। वहीं पिछले साल जून में, बिहार के मुजफ्फरपुर में 104 बच्चों की मौत हुई, जिनमें 29 बच्चे तीन साल से कम उम्र के थे। बिहार में बच्चों की मौत का कारण कुपोषण के चलते बुखार और ब्लड शुगर कम होना था। जबकि, उत्तर प्रदेश में बच्चों की मौत बकाया पैसों की वजह से ऑक्सीजन सप्लाय बंद कर देने से हुई थी। जो कारण कोटा के जे.के. लोन अस्पताल में हुई मौतों के पीछे बताया गया, वह यह कि 2017 से अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारियों में अनबन चल रही है, जिसका असर वहां के कामकाज पर पड़ा है। जबकि गुजरात के स्वास्थ्य मंत्री ने बयान दिया है कि बच्चों की मौत इसलिए हुई है, क्योंकि अस्वस्थ मांओं के चलते कम वजनी बच्चे जन्म ले रहे हैं। सवाल यह है कि इस सबसे हम क्या सीख ले सकते हैं? पहली बात यह कि बच्चों का स्वास्थ्य उसकी मां की सेहत से जुड़ा है। मां कुपोषित और कमज़ोर होंगी तो बच्चे भी दुर्बल होंगे। मातृत्व लाभ योजना में आवेदन की प्रक्रिया जटिल है और उसे आधार से जोड़ने से पेमेंट की प्रक्रिया भी उलझ गई है। जिसके परिणामस्वरूप देश में हकदार महिलाओं में से केवल 12% को प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना का लाभ मिला है। इसे तुरंत सुधारने की ज़रूरत है। जिन सभी जगहों का जिक्र बच्चों की मौतों को लेकर किया जा रहा है, वहां के जिला अस्पताल पर बहुत ज्यादा दबाव है। डॉक्टरों की नियुक्ति तो हुई है, लेकिन उनकी उपस्थिति समस्या है।  प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामूहिक स्वस्थ्य केंद्रों की हालत कमजोर है। लंबे वक्त तक तो जरूरी दवाइयों की भी कमी थी। भारत के कई राज्यों में इस ढांचे को मज़बूत करने की ज़रुरत है। जिसके लिए दक्षिण के राज्यों और हिमाचल प्रदेश से भी काफी कुछ सीखा जा सकता है। हिमाचल प्रदेश में कुछ साल पहले किए एक सर्वे में देखा था कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के अलावा उप-स्वास्थ्य केंद्र भी खोले गए थे। वहां उपचार के लिए जरूरी सामान उपलब्ध था और डॉक्टर तो नहीं, लेकिन नर्स या हेल्थ वर्कर मौजूूद थे, जो यह पहचान करने में सक्षम हैं कि किस मरीज़ को आगे रेफर करने की जरूरत है। बच्चों की मौतों के परिपेक्ष्य में हमारे देश में स्वास्थ्य ढांचे की समीक्षा करने की जरूरत है। दुनिया के ज्यादातर विकसित देशों में स्वास्थ्य की सरकारी बजट में बड़ी हिस्सेदारी होती है। जहां दुनिया में स्वास्थ्य पर औसत जीडीपी का 6% खर्च किया जाता है, वहीं भारत में यह खर्च पिछले कुछ सालों में जीडीपी के 1% तक बमुश्किल से पहुंचा है। सरकारी खर्च के साथ, व्यवस्था को भी समझना अहम है। जिन देशों में स्वास्थ्य सेवाएं निजी हैं, उन पर सख्त निगरानी रखी जाती हैं। अमेरिका जिसमें एक अपवाद है। लेकिन, जर्मनी में इंश्योरेंस और निजी डॉक्टर के जरिए लोग स्वास्थ्य सेवाएं लेते हैं। यहां इंश्योरेंस फंड से मुनाफा कमाने की इजाजत नहीं होती। इंग्लैंड में तो पूरी व्यवस्था सरकारी है। लोग अपने डॉक्टर के पास जाते हैं और उन्हें पैसा नहीं देना होता। हां टैक्स के जरिए वह इसे चुकाते हैं। आज़ादी के बाद भारत में इस तरह की व्यवस्था तैयार करने की कोशिश की गई, लेकिन स्वास्थ्य को बजट में हमेशा नजरअंदाज किया गया।  नेशनल रूरल हेल्थ मिशन (एनआरचएम) के जरिए कुछ हद तक बढ़ा हुआ खर्च प्राथमिक सेवाओं को मजबूत करने में लगाया गया। लेकिन अब ज्यादा जोर राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और आयुष्मान भारत जैसी इंश्योरेंस योजनाओं पर है। प्राथमिक उपचार की बजाय इंश्योरेंस पर ज़ोर देना किसी भी तरह से औचित्यपूर्ण नहीं है। इसका मतलब यह है कि किसी के घाव पर साधारण पट्टी के लिए हम खर्च करने से इनकार कर रहे हैं, लेकिन जब वह घाव सड़ने लगे और अंग काटने की ज़रूरत पड़े, तब सरकार खर्च करने को आगे बढ़ रही है। चिंता की बात यह है कि भारत में स्वास्थ्य नीति पर प्राइवेट कंपनियों का कब्ज़ा बढ़ता ही जा रहा है। 2015 में आरटीआई के तहत मिली जानकारी से हमने जाना कि स्वास्थ्य मंत्रालय में 360 निजी कंसलटेंट काम कर रहे हैं। हमें अमेरिका के अनुभव से सीखना चाहिए। अमेरिका ने निजी स्वास्थ्य व्यवस्था का ढांचा तैयार करने की बहुत बड़ी कीमत अदा की है। वहां प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च ज्यादा होने के बावजूद, स्वास्थ्य नतीजे अन्य देशों की तुलना में खराब हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि भारत में इन मुद्दों पर चर्चा तक बहुत ही कम होती है। जब ये अहम मुद्दे चर्चा में आते हैं, तो राजनेता बेतुके बयान देते हैं और मुद्दे को उठाने वालों पर हावी हो जाते हैं। 

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