संदर्भ / देश नहीं, अभी दिल्ली तक ही ठीक हैं केजरीवाल

राजदीप सरदेसाई

राजदीप सरदेसाई

Feb 14, 2020, 12:44 AM IST

अरविंद केजरीवाल के उदय को वैसे ही भारतीय राजनीति में पिछले दशक का स्टार्टअप्स कहा जा सकता है, जैसे कि नरेंद्र मोदी इसी अवधि की सबसे बड़ी ब्रांड क्रांति हैं। दोनों की ही खास कहानियां हैँ, जो मध्यम वर्ग और आकांक्षी भारत को लुभाती हैं। एक आईआईटी से पढ़े भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता केजरीवाल ने देश की राजनीतिक संस्कृति को बदलने के वादे के साथ राजनीति में प्रवेश किया था। दूसरी ओर, आरएसएस प्रचारक रहे मोदी ने नेहरूवादी संस्थानों को बदलने का वादा किया है।

अपने समर्थकाें के लिए दोनों ही अलग-अलग तरीकों से उम्मीद और बदलाव के प्रतीक हैं। आम आदमी पार्टी नेता जहां सामाजिक तौर पर अधिक जागरूक व समतावादी भारत के सपनों को प्रदर्शित करते हैं, वहीं मोदी हिंदुत्व की राजनीति के ध्वज वाहक हैं, जहां पर धार्मिक और राष्ट्रवादी उत्साह नए भारत के विजन का मूल है। दोनों ही नेता लोकप्रिय व कल्याणकारी उपायों वाला शासन देते हैं और एकाधिकारवादी हैं।


इसलिए केजरीवाल की दिल्ली में एक बार फिर जीत होने से यह सवाल बार-बार पूछा जाने लगा है कि क्या वह भविष्य में प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती दे पाएंगे? इसका छोटा उत्तर हां और ना है। जबकि, लंबे जवाब के लिए भारतीय चुनावी राजनीति के विस्तृत विश्लेषण की जरूरत है।

दिल्ली विधानसभा और पिछले साल लोकसभा के चुनाव परिणामों में भारी विरोधाभास से साफ हो गया है कि मतदाता अब राज्य व देश के चुनाव में अंतर करने लगा है। लोकसभा चुनाव नेतृत्व के मुद्दे पर था और मोदी इस सवाल को बेहतर तरीके से उठाने में सफल रहे कि मोदी के मुकाबले कौन? इसके विपरीत विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर होता है और जरूरी सुविधाओं की स्थिति निर्णायक होती है। केजरीवाल के बिजली-पानी, स्कूल-मोहल्ला क्लिनिक लोगों को आकर्षित करने में अधिक सफल रहे। 


लोकसभा में मोदी की ही तरह राज्य स्तर पर कोई प्रतिद्वंद्वी न होने से केजरीवाल का काम और आसान हो गया। साथ ही केजरीवाल ने चालाक प्रचार अभियान चलाकर सरकार की हर योजना से खुद को जोड़ा। इससे केजरीवाल दिल्ली का एक विश्वसनीय चेहरा बन गए। लेकिन, इसने उनकी ब्रांड वैल्यू को सात लोकसभा सीटाें वाली दिल्ली तक ही सीमित कर दिया। उदाहरण के लिए शिवसेना ने कई दशकों तक स्थानीय स्तर पर काम करने वाले की भूमिका निभाई।

उसके शाखा प्रमुखों का नेटवर्क एक क्षेत्रीय संपर्क स्थापित करने में सक्षम था, जिसने पैसे वाले बृहन मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में उसका दबदबा स्थापित कर दिया। क्या केजरीवाल अपने शिक्षा-स्वास्थ्य माॅडल से भ्रष्टाचार में डूबी बीएमसी का कोई विकल्प दे सकते हैं? तब तक नहीं, जब तक कि आप एक ऐसा स्थानीय संगठन बनाने में कामयाब नहीं होती, जाे शहर की महाराष्ट्रीयन प्रकृति को समझता हो।

किसी भी नागरिक शासन के लिए देश के अलग-अलग क्षेत्रों में एक खास क्षेत्रीय आयाम की जरूरत होती है। आप की सीमाएं 2017 में गोवा व पंजाब में दिख चुकी हैं, जहां पार्टी ने विस्तार की कोशिश की थी। पंजाब में शुरू में पार्टी के भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडे को तो समर्थन मिला, लेकिन बाद में किसी स्थानीय सिख नेतृत्व को पहचानने व उसे अधिकार देने में पार्टी की अक्षमता से यह बढ़त काम नहीं आ सकी। पंचायत संचालित ग्राम्य समितियों वाले गोवा में भी आप को एक बाहरी पार्टी के रूप में ही देखा गया। 


आप ने खुद को दिल्ली की प्रमुख राजनीतिक पार्टी के तौर पर स्थापित कर दिया है तो क्या वह वास्तव में देश की राजनीति की प्रकृति को इस तरह से बदलने में कामयाब होगी कि वह मुख्यधारा की राजनीति से निराश हो चुके लोगों के लिए एक आकर्षक विकल्प बन सके? आप के जीते हुए विधायकों में कई युवा और चमकदार चेहरे हैं, लेकिन इसमें अनेक दलबदलू और पैसे वाले भी भरे हैं। चुनावी राजनीति की वास्तविकताओं ने अन्ना आंदोलन के आदर्शवाद को खत्म कर दिया है।

पार्टी में दूसरे दर्जे का नेतृत्व उभारने के प्रति केजरीवाल की अनिच्छा ने आप पर बाकी क्षेत्रीय पार्टियों की तरह एक नेता के प्रभाव वाले दल का ठप्पा लगा दिया है। लेकिन, राजनीति पिछली गलतियों से सीखने वाले लोगों को दूसरा मौका देती है। केजरीवाल 2.0 पहले की तुलना में एक अधिक गंभीर, धैर्यवान और चिंतनशील नजर आ रहे हैं। यह 2014 के वाराणसी वाले केजरीवाल नहीं हैं, जिन्होंने मोदी को चुनौती दी थी।

उन्होंने दिल्ली के चुनावों में एक बार भी गुस्से में मोदी का जिक्र नहीं किया। यही नहीं 2017 से वह सोशल मीडिया पर भी प्रधानमंत्री पर टिप्पणी करने से बच रहे हैं। बल्कि केजरीवाल का नया अवतार एक राष्ट्रवादी (370 पर उनका रुख), एक सांस्कृतिक हिंदूवादी (बार-बार हनुमान का जिक्र) व एक गरीब समर्थक कल्याणकारी योजना बनाने वाला है।

केजरीवाल की यह चुनावी विजय ऐसे महत्वपूर्ण समय पर हुई है, जब कांग्रेस संगठन और नेतृत्व के स्तर पर गंभीर संकट में है और इसका जल्द ही कोई समाधान नजर नहीं आ रहा है। खासकर राहुल, गांधी की एक विपक्षी नेता के तौर पर उभरने में अक्षमता का साफ मतलब है कि विपक्षी नेतृत्व की कुर्सी पूरी तरह खाली है।

ऐसा तो नहीं लगता कि ममता व शरद पवार अपने से जूनियर केजरीवाल के लिए यह स्थान छोड़ेंगे, लेकिन मोदी विरोधी गठबंधन 2024 तक एक विश्वसनीय विकल्प देने की कोशिश करता रहेगा। पांच साल पहले शायद केजरीवाल जल्दबाजी और हेकड़ी में खुद को मोदी के स्वाभाविक विकल्प के तौर पर पेश कर रहे थे। इस बार उन्हें ऐसी कोशिश करने से पहले कुछ विराम लेना चाहिए। 


पुनश्च : मोदी-केजरीवाल की कहानी में अब एक और रोचक कड़ी हैं प्रमुख राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर, जो अब मजबूती से केजरीवाल कैंप में हैं। किशोर के क्लाइंटों में अब ममता से लेकर डीएमके तक कई मोदी विरोधी हैं। क्या अब वह इन सबको एक साथ लाकर बड़ा राष्ट्रीय गठबंधन बनाएंगे? देखते रहिए। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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