संदर्भ / एनआरसी को आधिकारिक रूप से दें विश्राम

चेतन भगत

चेतन भगत

Jan 16, 2020, 12:32 AM IST

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। इसने न केवल लोगों की राय का ध्रुवीकृत कर दिया है, बल्कि एक उत्तेजना का माहाैल बना दिया है और वास्तव में लोगों को सड़कों पर ला दिया है। जो सरकार कुछ दिन पहले एनआरसी लाने पर आमादा दिख रही थी, वह अब बैकफुट पर है।

हालांकि, उसने अभी तक वह नहीं किया है, जो उसे करना चाहिए था। यानी एनआरसी को आधिकारिक तौर पर वापस लेना या उसे लंबे समय के लिए ठंडे बस्ते में डाल देना। अगर देखा जाए तो एनआरसी कोई बुरा विचार नहीं है। यह दूसरे देशों में भी लागू हैं। लेकिन, अगर इसे लागू करने में कोई  दिक्कत है और भारत की वास्तविकता को देखते हुए इसके फायदों पर सवाल उठ सकता है तो बेहतर होगा कि इसे किया ही न जाए। अगर इसे आज के भारत में किया गया गया था इसके परिणाम दिशाहीन व घातक होंगे। इसके अलावा यह एक महंगी, निरर्थक और अराजक प्रक्रिया होगी। बुरी स्थिति में यह गृह युद्ध भी शुरू कर सकती है।


यह कहा जा सकता है कि जब एनआरसी का ब्योरा ही नहीं आया तो इस पर टिप्पणी कैसे की जा सकती है, विशेषकर तब जबकि नागरिकता साबित करने का तरीका और मानदंड ही तय नहीं किए गए हैं। यहां पर ही दिक्कत है। यह बात मायने नहीं रखती कि मानदंड क्या है, लेकिन इस समय एनआरसी व्यावहारिक नहीं है।


अगर मानदंड बहुत आसान हैं, तो इससे हर कोई एनआरसी में आ जाएगा। सिर्फ तीन गवाह या कोई मौजूदा पहचान पत्र ही इसके लिए काफी है तो भारत की भूमि पर मौजूद हर व्यक्ति एनआरसी में होगा। इसके बावजूद भारत के हर सरकारी काम की तरह इसके लिए लाइनें लगेंगी, विशाल कागजी काम, शोषण व गलतियां हाेंगी। यह आधार जैसी ही प्रक्रिया होगी। क्योंकि हर कोई इसे करेगा, इसलिए इसका कोई अंत नहीं होगा। हम एक गलतियों भरा रजिस्टर बनाने के लिए भारी मात्रा में धन, समय व उत्पादकता को बेकार करेंगे। 


दूसरी स्थिति, अगर मानदंड बहुत ही कठिन हैं तो यह और अधिक डरावना होगा। आप एक नागरिक हैं इसके लिए ऐतिहासिक कागजी काम करना होगा। कई साल पुराने जन्म प्रमाणपत्र जुटाने होंगे। हो सकता है कि वे अस्पताल ही बंद हो गए हों जहां कोई पैदा हुआ हो। जिस ग्राम अधिकारी ने जन्म प्रमाणपत्र जारी किया हो, वह मर गया हो। घर में पैदा होने वालों को तो पता ही नहीं होगा कि करना क्या है?

सभी उपलब्ध पहचान पत्र अवैध होंगे। इस स्थिति में सभी भारतीय तब तक गैर-नागरिक होंगे, जब तक वे अपनी नागरिकता साबित नहीं कर देंगे। अमीर और असरदार लोग यह कर देंगे। गरीब गिड़गिड़ाता और मांगता ही रह जाएगा। सरकारी बाबू इस अतिरिक्त अधिकार का आनंद लेंगे। यानी जितने कठिन मानदंड उतनी ही अधिक कीमत। और फिर फर्जी दस्तावेजों का संकट आएगा।

क्या किसी पुराने बर्थ सर्टीफिकेट की फोटो कॉपी कराना इतना कठिन है? अगर किसी बाबू को उसकी कीमत नहीं दोगे तो क्या उसके लिए आपके दस्तावेज को खारिज करना कठिन होगा? इसके बाद 20 सालों तक कोर्ट में आप इन्हें सही सबित करने के लिए लड़ते रहें। ये चीजें ठीक नहीं हैं, लेकिन आप हम एक भारतीय के तौर पर जानते हैं कि बिल्कुल ऐसा ही होगा। हाशिए पर डाले गए लोग विरोध कर सकते हैं। कुछ विरोध प्रदर्शन दंगों में बदल जाएंगे। आखिर में एक रजिस्टर तो बन जाएगा, लेकिन डाटा के साथ ही देश की शांति भी दूषित हो जाएगी। 


इसलिए मानदंड का कोई मतलब ही नहीं है। देश की मौजूदा स्थिति में तो एनआरसी काम करता हुआ नहीं दिखता। शायद हमें 2020 के बाद देश में पैदा हो रहे सभी बच्चों के लिए इसकी जरूरत हो। कुछ दशकों में यह एक अच्छा-खासा रजिस्टर बन जाएगा। फिलहाल इसे शुरू न करें। लेकिन हम इसे कर ही क्यों रहे हैं? हमें शक है कि हमारे देश में कुछ घुुसपैठिए हैं, जो हमारे राष्ट्रीय संसाधनों को चूस रहे हैं।

पहले तो यह धारणा सही नहीं भी हो सकती और दूसरे हो सकता है कि ये घुसपैठिए हमारी जीडीपी में योगदान दे रहे हों। चलो, इनके योगदान को किनारे करें और एक अच्छा एनआरसी बनाएं। माना कि सभी भारतीय ईमानदार हो जाते हैं, हरेक के दस्तावेज एक साफ-सुथरी फाइल में लगे होते है और सभी अधिकारी एनआरसी का काम मुस्कुराकर और बिना किसी गड़बड़ी के करते हैं।

हमें एक बहुत ही साफ एनआरसी मिल जाता है। माना पांच फीसदी यानी छह करोड़ लोग भारत के नागरिक साबित नहीं होते हैं। यह संख्या ब्रिटेन की जनसंख्या के बराबर है। आप इनके साथ क्या करेंगे? अब सोचें कि आसान क्या है? इन छह करोड़ लोगों को पहचानकर बाहर करना या अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाकर उसमें पांच फीसदी की बढ़ोतरी करना। अगर घुसपैठिए हमें चूस भी रहे हो तो भी अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने की तुलना में उन्हें रोकना अधिक कठिन है।

दो-चार आम चुराने वाले बच्चों को पकड़ने के लिए दिनभर उनके पीछे भागने से आसान है कि चार नए पेड़ लगा दिए जाएं। एनआरसी उपस्थिति दर्ज करने जैसा है और सिद्दांत रूप में इसमें कुछ भी गलत नहीं है। लेकिन आप एक बंद क्लासरूम में ही उपस्थिति दर्ज कर सकते हो, भारत जैसेे किसी व्यस्त रेलवे प्लेटफॉर्म पर नहीं। यह सिर्फ अराजकता, गलतियां और भगदड़ को ही जन्म देगा। 


बहरहाल एनआरसी को अभी छोड़ने की एकमात्र वजह इसे लागू करने की दिक्कत ही नहीं है। बल्कि यह भाजपा पर विश्वास का भी सवाल है, जाे अल्पसंख्यकों से जुड़े मसलों पर बहुत ही कम है। इसके अलावा इसके लिए यह समय भी ठीक नहीं है। 370 और अयोध्या पर फैसले को देश के कई वर्गों में हिंदू समर्थक के तौर पर देखा जा रहा है। ऐसे में एनआरसी भले ही सेक्यूलर हो पर यह वर्ग उसे ऐसे ही देख रहा है।

इसलिए एक के बाद एक ऐसे फैसलों से एक समुदाय खुद को हाशिए पर महसूस करेगा, जिससे विपक्ष को भाजपा को कोसने का मौका मिल जाएगा और यह हालिया विरोध प्रदर्शनों जैसे विरोध की ओर ले जाएगा। इस समय अर्थव्यवस्था पर बहुत काम करने की जरूरत है। भारत इस समय अराजकता का खतरा नहीं उठा सकता। अभी तो एनआरसी को आधिकरिक रूप से विश्राम देने की जरूरत है। (लेखक के अपने निजी विचार हैं)

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