जीने की राह / अस्तित्व से ही तैयार होगा व्यक्तित्व

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Feb 01, 2020, 12:20 AM IST

संतान कितनी हो, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन कैसी हो, यह फिक्र का विषय होना चाहिए। मनुष्य और जानवरों में बड़ा फर्क यह है कि इंसान अपने बच्चों को वह सब सिखा सकता है, जो कभी-कभी जानवर नहीं सिखा पाते। शरीर के भरण-पोषण की क्रिया जानवर भी अपने बच्चों को सिखा देता है, लेकिन आत्मा की तृप्ति के लिए संस्कारों का जो भोजन होता है, वह सिर्फ मनुष्य ही बच्चों को दे पाता है।

जब कहा जाता है कि संतान दो ही अच्छी, तो इस पर विचार करना चाहिए कि ऐसा क्यों कहा जाता है? दरअसल परमात्मा ने हमारी अधिकांश और महत्वपूर्ण इंद्रियां दो-दो बनाई हैं और शरीर दो हिस्सों में इसलिए बांटा गया है कि दोनों से जीवन का संचालन होता है।

यदि माता-पिता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि बच्चे कैसे हों तो एक पिता को उनके लालन-पालन के समय अपने भीतर की आधी स्त्री पर भी काम करना चाहिए। ऐसे ही एक माता को यदि बच्चों में समझ उतारना हो तो उसके भीतर भी जो आधा पुरुष है, उस पर काम करना चाहिए।

बात गहरी है, पर समझने की है। बच्चों के लालन-पालन में हर माता-पिता शांति से अपने भीतर उतरें, भीतर की आधी स्त्री, आधे पुरुष को पहचानें, उस पर काम करें। तब जाकर पाएंगे आप जो बोल रहे हैं, जो कहना चाहते हैं, बच्चे उसे बड़ी आसानी से समझ लेंगे। यदि भीतर के अस्तित्व पर काम किया तो बाहर संतान का व्यक्तित्व आसानी से तैयार हो सकेगा।

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