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पोर्नोग्राफी समाज को प्रभावित करने वाला एक वायरस है

5 महीने पहले
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प्रतीकात्मक फोटो।
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(शिव नारायण ढींगरा, रिटायर्ड जस्टिस, दिल्ली हाईकोर्ट). आजकल इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी से जुड़ा कंटेंट सभी के लिए आसानी से माैजूद है। पोर्नोग्राफी का युवाओं के मनाे-मतिष्क पर गहरा असर पड़ता है, जिसने समाज के लिए गंभीर चिंताएं खड़ी की हैं। यही वजह है कि अश्लील साहित्य और इंटरनेट पर पाेर्नाेग्राफी काे नियंत्रित करने या इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के लिए आवाजें उठती रही हैं। वहीं व्यक्ति के निजता के अधिकाराें के हिमायती किसी भी तरह के प्रतिबंध का विराेध करते हैं और सुप्रीम काेर्ट ने भी इंटरनेट पर वयस्काें के निजी तौर पर पोर्नोग्राफी देखने के अधिकार को बरकरार रखा है।

निजता के अधिकाराें के समर्थकाें का एक तर्क यह भी है कि सरकार लाेगाें के लिए नैतिक पुलिसिंग नहीं कर सकती। हालांकि, कानून और नैतिकता बहुत निकट से जुड़े हैं। भारतीय संविधान ने पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य और उनकी शक्तियाें का दुरुपयाेग राेकने के लिए नीति व कानून बनाने की जिम्मेदारी (अनुच्छेद 39-ई) राज्य काे दी है।


आजादी के बाद सरकार ने वे कानून बनाए, जिन्हें स्वस्थ समाज के लिए जरूरी माना गया। इसमें नशीली दवाओं का इस्तेमाल और व्यापार करने वालों को दंडित करने वाले कानून हैं। कोई यह तर्क दे सकता है कि किसी व्यक्ति का मादक पदार्थ सेवन करना या नहीं करना निजी फैसला है। कुछ राज्यों ने अपनी सीमा में शराबबंदी लागू भी की।


इसी प्रकार जुआ और उपद्रव से समाज की रक्षा के लिए कई राज्यों ने जुआ प्रतिबंधित किया है। आजादी से पहले कुछ क्षेत्रों में बाल विवाह प्रचलित था, बाल विवाह के खिलाफ भी कानून बना। दहेज विराेधी अधिनियम भी पारित किया गया। हालांकि, दहेज देना अभी भी एक निजी अधिकार माना जाता है, लेकिन किसी ने कभी यह सवाल नहीं उठाया कि इस कानून को लागू नहीं किया जाना चाहिए था।

एक ओर निजता के अधिकार के पक्षधर इस बात पर अड़े रहते हैं कि निजता का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए और दूसरी ओर वे देश में अपराधों में वृद्धि पर सरकारों को कोसते रहते हैं। बच्चों और महिलाओं के प्रति अपराधों में वृद्धि का एक कारण समाज के किशोर, युवा और वयस्कों का इंटरनेट पर पोर्न और हिंसा से जुड़ी सामग्री देखना है। अध्ययनों से पता चला है कि यौवन से पहले ही बच्चों तक बड़े पैमाने पर अश्लील सामग्री पहुंच जाती है।


बार-बार पोर्नोग्राफी देखने से नशीले पदार्थों की तरह लत भी लग सकती है। पोर्नोग्राफी के हानिकारक प्रभावों में एकाग्रता में कमी, रचनात्मकता खत्म हाेना, शिथिल यौन जीवन, विवाहों का टूटना, महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा आदि शामिल हैं। भारत के अधिकांश स्कूलों में अगर सर्वेक्षण किया जाए ताे यह पाया जाएगा कि कम उम्र में महिलाओं के प्रति आक्रामकता, कम उम्र में सेक्स, ड्रग्स का सेवन और अश्लील सामग्री देखने का प्रभाव एक-दूसरे से जुड़ा है और एक काम दूसरे के लिए उकसाता है।
 
अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या सरकार को पोर्नोग्राफी को नियंत्रित करने में दखल देना चाहिए? इसके खिलाफ एक तर्क यह है कि तकनीकी कारणों से इस तरह के कानून को लागू करना असंभव हाेगा, क्योंकि सभी इंटरनेट कंपनियाें के सर्वर भारत से बाहर हैं। यहां तक कि सर्वरों में भरी गई सामग्री पर कोई नियंत्रण नहीं है और पोर्नोग्राफी पर किसी भी प्रकार की राेक या प्रतिबंध के तरीके और साधन नहीं हैं।


ऐसे में इस तरह के कानून को लागू करना संभव नहीं होगा। मेरी राय में यह तर्क निराधार है। दुनियाभर में पहले जिन राेगाें काे बेकाबू और अकल्पनीय माना जाता था, उनके खिलाफ पूरी दुनिया में एक माहाैल बना और उन्हें मिटा दिया गया। पोर्नोग्राफी भी एक वायरस की तरह है, जो हमारे समाज को प्रभावित करता है। इसलिए जैसे सरकार ने ड्रग्स के खिलाफ कानून बनाए हैं उसी तरह उसका कर्तव्य है कि पोर्नोग्राफी पर भी राेक लगाए।

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