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सैनिकों की संख्या घटाना रावत के लिए चुनौती

6 महीने पहलेलेखक: हर्ष वी पंत
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प्रतीकात्मक फोटो।
  • सीडीएस की नियुक्ति से तीनों सेनाओं में विकसित होगी सामूहिकता की भावना
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मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) के रूप में जनरल बिपिन रावत की नियुक्ति को एक प्रमुख नीतिगत फैसला कहा जा सकता है। 2019 में शानदार जीत के बाद मोदी ने लंबे समय से लंबित इस सुधार को लागू किया है। 2001 में कारगिल रिव्यू कमेटी ने इसकी सिफारिश की थी। सीडीएस तीनाें सेनाओं के प्रमुखों के समान ही एक चार सितारा अधिकारी होगा, लेकिन उसे हम समान लोगों में पहला कह सकते है। यानी वह तीनों सेनाध्यक्षों से विर्मश करेगा और उनकी बातों को सुनेगा, लेकिन अंतिम फैसला सीडीएस का ही होगा। वह रक्षामंत्री का प्रमुख सलाहकार भी हाेगा। वह सेनाओं के लिए होने वाली खरीद प्रक्रिया को भी देखेगा। हालांकि, युद्धपोत व लड़ाकू विमानों की खरीद पर अब भी रक्षा मंत्रालय व रक्षा सचिव का ही नियंत्रण रहेगा। तीनों सेनाओं से जुड़े मसलों पर सीडीएस ही रक्षामंत्री को सलाह देने वाला एक मात्र सेनाधिकारी होगा, जबकि तीनों सेनाध्यक्ष अपनी सेनाओं से संबधित मसलों को रख सकेंगे। सीडीएस को तीनों सेनाध्यक्षों को निर्देश देने का अधिकार होगा। सीडीएस रक्षा मंत्रालय के अधीन सैन्य मामलों के विभाग (डीएमए) का भी प्रमुख होगा। चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी के स्थायी चेयरमैन के रूप में सीडीएस के पास तीनों सेनाओं की खरीद जरूरतों की प्राथमिकता तय करने का भी अधिकार होगा। यद्यपि सीडीएस के पास किसी भी तरह का कमांड अधिकार नहीं होगा। लेकिन, डीएमए प्रमुख के तौर पर प्रोन्नति, प्रमुख पदों पर नियुक्तियों, यात्रा और विदेश में तैनाती पर उसका नियंत्रण रहेगा। डीएमए में सेना व सिविल दोनों ही वर्गों के अधिकारी रहेंगे। वह नाभिकीय कमान प्राधिकरण (एनसीए) में भी सलाहकार की भूमिका में होगा। इन सबसे ऊपर सीडीएस की भूमिका तीनों सेनाओं के बीच ऑपरेशन के दौरान बेहतर तालमेल को स्थापित करना व इनके बीच होने वाले विवादों को न्यूनतम स्तर पर लाना होगा। वास्तव में सीडीएस को इन भूमिकाओं में एक अच्छा नौकरशाही राजनेता बनना होगा, जो भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान के जटिल व भूलभुलैया जैसे क्षेत्र को रास्ता दिखा सके। नियुक्ति के तत्काल बाद ही जनरल रावत ने कुछ अच्छी घोषणाएं कीं। उन्होंने एक वायु रक्षा कमान (एडीसी) के गठन की घोषणा की और आईडीएस को इस साल 30 जून तक इस बारे में प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया। एकीकृत एडीसी का क्षेत्र पूरे देश में होगा, इससे युद्ध में अपने ही लोगों को निशाने बनने से बचाया जा सकेगा और वायु रक्षा ऑपरेशन में एक सामूहिकता का भाव पैदा होगा। इसके अलावा उन्होंने इस बात का भी इरादा जाहिर किया है कि अगर दो या अधिक सेनाएं एक ही जगह पर तैनात होती हैं तो उनके बीच साजोसामान को लेकर तालमेल बनाया जाएगा। सीडीएस के रूप में जनरल रावत के सामने तीन चुनौतियां होंगी। पहली सेवा संकीर्णता से ऊपर उठने ही होगी। हालांकि, इस बात के कोई शुरुआती संकेत नहीं हैं कि ऐसा होगा ही। अगर वह अपनी मूल सेवा सेना का समर्थन करते हैं तो निश्चित तौर पर उनका वायुसेना और नौसेना से टकराव होगा। एक अनुमान यह भी है कि वह खुद पैदल सेना के ऑफिसर रहे हैं, इसलिए वे तोपखाना कोर के प्रति पक्षपाती रहेंगे। अगर ऐसा कुछ भी होता है तो सीडीएस की नियुक्ति का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा। क्योंकि, इसका मूल उद्देश्य सेनाओं के भीतर और तीनों सेनाओं के बीच सामूहिकता को बढ़ावा देने के साथ ही अधिग्रहण की प्राथमिकताएं तय करना है। उसका एक काम तीनों सेनाओं में उपकरणों व संसाधनों के दोहरीकरण व बेवजह के खर्च को रोकना है। सीडीएस की भूमिका सिर्फ तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बनाना ही नहीं है, बल्कि रक्षा मंत्रालय और तीनों सेनाओं के बीच भी बेहतर तालमेल स्थापित करना है, ताकि सेनाओं के प्रोजेक्टेड और प्लांड अधिग्रहण आवंटित राशि से अधिक न हाें। दूसरी चुनौती, भारतीय सेना में मैन पॉवर के स्तर की है, जिसकी वजह से रक्षा बजट का बड़ा हिस्सा उस पर खर्च हो जाता है। इसलिए सैनिकों की संख्या में कटौती जनरल रावत के समक्ष अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी। इसका तत्काल कोई समाधान नहीं है, लेकिन लंबे समय में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) में अधिक निवेश को उन्हें बढ़ावा देना चाहिए। एआई तकनीक का इस्तेमाल टैंकों और तोपों पर हो सकेगा, जैसा कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) इस दिशा में काम कर रही है। अंतिम चुनौती इस बात की होगी कि वे किस स्तर तक सेनाओं को स्वदेशीकरण के लिए प्रोत्साहित कर पाते हैं।

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