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(राजेश बादल, वरिष्ठ पत्रकार)
हिंदुस्तान को अब अपने दोस्तों की पहचान हो रही है। विदेश मंत्री जयशंकर ऐसा ही मानते हैं। ईरान के विदेश मंत्री और उसके बाद अयातुल्ला खुमैनी के बयानों से नाराज विदेश मंत्री ने यह टिप्पणी की। ईरान ने कहा था कि भारत को अपने मुल्क में मुस्लिमों के साथ अत्याचार रोकना चाहिए। जयशंकर कहते हैं कि भारत ने दुनिया के मंच पर अपनी बात रखने का तरीका बदला है। पहले भारत रक्षात्मक नीति अपनाता था। अब ऐसा नहीं है। जयशंकर का यह नजरिया राष्ट्रीय विदेश नीति के बदले अंदाज की झलक दिखा रहा है। लेकिन, उनका यह रवैया अनेक सवाल भी खड़े करता है। बेशक देश अब पचास साल पहले वाला नहीं रहा है। दशकों तक देश की प्रतिभाओं ने इसे मजबूत बनाने में अपना खून पसीना बनाया है। भारत के इसी जज्बे और संकल्प का सारा संसार कायल रहा है। पाकिस्तान और चीन जैसे देश अपवाद हो सकते हैं। अधिकतर तो भारत से अच्छे रिश्ते ही रखते रहे हैं। इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की साख बड़ा कारण है। यह साख दो-चार दिनों में नहीं बनी। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक सारे प्रधानमंत्रियों और सरकारों ने इसमें अपनी आहुति दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी बुनियाद पर रक्षात्मक विदेश नीति छोड़ने का जुआ खेला है।
यह सच है कि भारत के बारे में पहले मलेशिया, फिर तुर्की और अब ईरान ने आपत्तिजनक बयान दिए हैं। मगर यह हकीकत है कि सदियों से साथ रहते आए हिंदू और मुसलमानों के संबंधों में आज भी कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं आया है। आज भी वे इस देश में अपनी-अपनी मजहबी आजादी का लाभ उठा रहे हैं। स्वतंत्रता के 73 साल बाद भी ये कौमें वैसे ही रह रही हैं, जैसे पहले रहती थीं। कभी-कभार दंगों की छिटपुट घटनाओं ने उनके रिश्तों में कोई स्थायी दरार नहीं डाली है। हिंदुस्तान की मुस्लिम आबादी दुनिया के अनेक मुल्कों के मुसलमानों की तुलना में यहां बेहतर ढंग से जी रही है। फिर शिया बाहुल्य ईरान को एक सख्त बयान क्यों देना पड़ा? भारत एक तरह से शिया मुसलमानों का दूसरा बड़ा घर माना जाता है। ईरान-भारत संबंधों में स्वाभाविक निकटता का यह भी एक कारण है। दूसरा कारण, ईरान के कट्टर विरोधी सुन्नी बाहुल्य सऊदी अरब का पाकिस्तान के निकट होना रहा है। इस वजह से हिंदुस्तान के साथ अच्छे रिश्ते बनाए रखना ईरान की कूटनीतिक प्राथमिकता है। दो बरस पहले भारत ने ईरान से 239 करोड़ टन तेल आयात किया था। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद यह अब 17 करोड़ टन रह गया है अर्थात न के बराबर। क्या हम मध्य-पूर्व के इस पुराने साझीदार की अर्थव्यवस्था को डुबोने की अमेरिकी साजिश में शामिल नहीं हो गए हैं? भारत ने जिस तरह हालिया वर्षों में अमेरिका के दबाव में अपनी नीतियों और प्राथमिकता में बदलाव किया है, वह बेहद जोख़िम भरा है। अमेरिका आज भी पाकिस्तान के प्रति परंपरागत रुख को नहीं छोड़ पाया है। इस महाद्वीप में अमेरिका हमारे हितों पर हमला करता रहे और हम उसके इशारे पर अपने दोस्तों को छोड़ते जाएं। यानी हम उसके हित तो देखें, लेकिन वह हमारे लिए नुक़सानदेह बना रहे। इसमें कौन सी दोस्ती का उदाहरण भारतीय विदेशमंत्री पेश कर रहे हैं।
दरअसल दोस्ती का मूल्यांकन किसी देश की लंबे समय तक भूमिका के आधार पर होता है न कि किसी एक घटना पर उसके बयान के आधार पर। वैसे भी ईरान के सुप्रीमो खुमैनी की प्रतिक्रिया एक समझाइश जैसी है। जब वे कहते हैं कि भारत को इस्लामी देशों के उन प्रयासों को गंभीरता से लेना चाहिए, जो हिंदुस्तान को अलग-थलग करने का प्रयास कर रहे हैं। भारत को समझना होगा कि किसी देश की अर्थव्यवस्था चौपट करने के बाद आप उससे फूल झरने वाले बयान की आशा नहीं कर सकते। इस उपमहाद्वीप में पाकिस्तान, चीन, नेपाल, बांग्लादेश और ईरान को एक साथ नाराज करके भारत-अमेरिकी दोस्ती का राग नहीं अलाप सकता। अमेरिका की भूमिका कभी भी भारत समर्थक नहीं रही है।
भारतीय उपमहाद्वीप में स्थायी सैनिक अड्डा बनाने की उसकी पुरानी ख़्वाहिश है। भारत जैसे बड़े राष्ट्र में उसकी यह मंशा कभी पूरी नहीं होगी। देरसबेर यह पाकिस्तान ही पूरी कर सकता है। ऐसे में भारत कैसी दोस्ती की मिसाल पेश कर रहा है। इसके उलट यह भी देखना होगा कि मुसीबत में काम आने वाले रूस से अभी तक कोई बड़ा झटका भारत को नहीं मिला है। इसके बाद भी उसके साथ कुछ साल से रिश्ते सर्द कोठरी में बंद हैं। क्या अमेरिका के इशारे पर? दिल्ली में दंगे जैसे हालात के बाद मामला जब सरहदों के पार गया तो हमने अपनी कूटनीति के घुड़सवार नहीं दौड़ाए, जिस तरह इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश युद्ध से पहले दौड़ाए थे। मौजूदा दौर भारतीय कूटनीति की एक तरह से नाकामी की दास्तान है।
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