सूचना और निजता, दो अधिकारों की गाथा

2 वर्ष पहले
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प्रतीकात्मक फोटो। - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक फोटो।
  • सूचना का अधिकार नागरिकों के हाथ में सत्ता के खिलाफ आक्रामक हथियार, तो निजता रक्षात्मक हथियार

पूर्व न्यायाधीश गोगोई के खिलाफ दायर यौन उत्पीड़न का मामला कोर्ट ने इन-हाउस समिति बनाई, जिसकी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई। क्या आप चाहते हैं कि वह रिपोर्ट सार्वजनिक हो? उसे प्राप्त करने में सूचना का अधिकार नागरिकों का हथियार है। उससे जुड़ा दूसरा सवाल भी अहम है- यदि उस केस में आप आरटीआई के तहत उस रिपोर्ट की प्रति मांगते हैं, तो क्या आप चाहते हैं कि आपकी पहचान सबके सामने हो? यह सवाल लोकतंत्र में सूचना के अधिकार या आरटीआई और निजता के अधिकार की अहमियत को उजागर करते हैं, साथ ही इन दो अधिकारों के बीच के तनाव को भी। कुछ दिनों पहले, सुप्रीम कोर्ट में, अप्रैल से रिज़र्व किया गया आरटीआई से सम्बंधित निर्णय आया। मांग यह थी कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का दफ्तर भी सूचना के अधिकार के दायरे में हो। दस साल पहले, 2009 में, दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस भट्ट ने निर्णय दिया था कि चीफ जस्टिस का दफ्तर अन्य जजों की निजी संपत्ति की जानकारी को शेयर करने से इनकार नहीं कर सकता। उस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल ने चुनौती दी और मामला दिल्ली हाईकोर्ट के तीन न्यायाधीशों के सामने आया। तीनों ने जनवरी 2010 में जस्टिस भट्ट के निर्णय को सही करार दिया। जब जस्टिस भट्ट ने निर्णय दिया तब उन्होंने अहम टिप्पणी की- हर तरह की सत्ता (न्यायिक, राजनीतिक) की संविधान के प्रति जवाबदेही बनती है। तीन जजों की पीठ ने भी माना कि अदालती निष्पक्षता उनका विशेषाधिकार नहीं, बल्कि न्यायिक फर्ज है। फिर मामला सर्वोच्च न्यायालय पहंुचा जहां दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय को चुनौती दी गई। कहा गया कि यदि न्यायाधीशों की निजी जानकारी सूचना के अधिकार के अधीन आ गई तो न्यायिक निष्पक्षता कमजोर होगी। 13 नवंबर को पांच जजों की पीठ ने इस दस साल पुरानी बहस पर निर्णय देते हुए कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय सही थे। जजों की निजी संपत्ति की जानकारी और कॉलेजियम की कार्यप्रणाली अब सूचना के अधिकार के अधीन हैं।  निर्णय में जज की निजी जिंदगी/पद और मुख्य न्यायाधीश के दफ्तर के बीच का अंतर बेहद अहम है। इस निर्णय में जस्टिस चंद्रचूड़ ने माना कि निजता का अधिकार असीम नहीं होता, चूंकि जज संवैधानिक पद पर हैं, इसलिए उनकी निजी संपत्ति की जानकारी को बताने से उनकी निष्पक्षता पर बुरा असर नहीं पड़ेगा। मुख्य न्यायाधीश को आरटीआई के अधीन लाने से एक अहम तनाव उजागर होता है। सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच का तनाव। एक (आरटीआई) कानूनी हक़ है और दूसरा (निजता का) संवैधानिक हक है। दोनों ही मज़बूत लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं। आरटीआई से सरकार नागरिक के प्रति पारदर्शी होती है, जिससे आम नागरिक सत्ता को कुछ हद तक अपने काबू में रख सकते हैं। 2005 में जब सूचना का अधिकार पारित हुआ, कुछ समय बाद मेरा बड़वानी (मध्य प्रदेश) जाना हुआ। वहां, एक साधारण ग्रामीण ने मुझे बताया की किस तरह, पहले जानकारी प्राप्त करने के लिए उन्हें पंचायत सचिव के पीछे-पीछे भागना पड़ता था। आरटीआई के तहत आवेदन करने के बाद पंचायत सचिव उनके पीछे-पीछे भाग रहे हैं। जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आरटीआई एक बड़ा हथियार है। इसके उपयोग से नीति के स्तर पर कई बड़े खुलासे हुए हैं। उदाहरण के तौर पर 2008 में हमें आरटीआई के तहत मिली जानकारी से पता चला कि कुछ निजी कंपनी वाले सांसदों के स्कूलों में गरम मध्यान्ह भोजन की जगह बिस्कुट देने के प्रस्ताव का प्रचार कर रहे थे। साथ ही कई निजी मामलों में भी जानकारी प्राप्त करने में मदद मिली है, जैसे कहीं किसी का दाखिला क्यों नहीं हुआ, या नौकरी से इनकार क्यों किया गया?  हालांकि पिछले कुछ सालों से आरटीआई को भी अलग-अलग तरीकों से कमज़ोर किया गया है। जो जानकारी सरकार को कानून की धारा 4 के तहत वेबसाइट पर उपलब्ध करवानी होती है, उसे नहीं डाला जाता। आरटीआई के तहत मांगने पर भी नहीं मिलती, पहली अपील के बाद (यदि आप भाग्यशाली हैं तो) उपलब्ध करवाई जाती है। इस सब के बीच सुप्रीम कोर्ट का फैसला फिर से उम्मीद कायम करता है। दूसरी तरफ, निजता का अधिकार है, जिससे आम नागरिक अपने आपको सरकार द्वारा अपने निजी जीवन में बेधड़क तांक-झांक से बचाता है। निजता को 2017 में नौ जजों की पीठ ने संवैधानिक हक माना। इस दशक के सबसे बड़े मुकदमों में से एक निजता के अधिकार का केस था। निजी और सार्वजनिक जीवन में इसकी अहमियत उजागर करना कुछ हद तक मुश्किल भी है। कुछ लोगों का मानना है कि उनका जीवन खुली किताब की तरह है और इसमें किसी भी तरह की, किसी के द्वारा (सरकारी तंत्र समेत) तांक-झांक से कोई हानि नहीं होगी। यदि किसी को तांक-झांक से आपत्ति है तो जरूर वे व्यक्ति कुछ गलत कर रहे हैं। यह समझना कि यह क्यों गलत है, मुश्किल नहीं। यदि आप कपड़े बदल रहे हैं तो क्या आप चाहेंगे कि कोई आपको देखे? आप कुछ गलत नहीं कर रहे, फिर भी आपने एक सीमा तय की है जिसके अंदर आप किसी और को नहीं आने देना चाहते। यदि निजता का हनन होता है, तो वह हमारी स्वतंत्रता का हनन है। निजता के कई पहलू हैं- शारीरिक निजता और वैचारिक निजता जो और भी ज़रूरी है और इसे संविधान में भी मौलिक अधिकार के रूप में माना है। खुले मन से, बिना रोक-टोक के, सोचने पर, सवाल उठाने पर देखरेख होने से ह्यूमन रेस की प्रगति पर रोक लग जाएगी।  दोनों हक लोकतंत्र को मज़बूत करते हैं, आरटीआई और निजता का अधिकार। यदि आप आरटीआई के तहत अर्जी लगाते हैं, तो क्या चाहेंगे कि आपसे आधार या पैन नंबर मांगे? इन्हें आपके जीवन के अन्य पहलुओं से जोड़ा गया है, जिससे आप सवाल पूछने में संकोच करेंगे। निजता का अधिकार हमारे सूचना के अधिकार को सशक्त करता है। दोनों का दायरा तय करना कोई आसान सवाल नहीं। जरूरत है कि दोनों की अहमियत को समझें और इस जाल में न फंस जाएं कि एक हक़ दूसरे से ऊपर है। सूचना का अधिकार नागरिक के हाथ में सत्ता के खिलाफ आक्रामक हथियार है, तो निजता का हथियार हमारे हाथ में रक्षात्मक हथियार है।

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