संदर्भ / बजट महिलाओं की उम्मीदों पर कितना खरा?



sandarbh article: Budget and expectations of women
X
sandarbh article: Budget and expectations of women

  • महिला वित्तमंत्री के ‘नारी तू नारायणी’ बजट में महिला श्रमशक्ति की भागीदारी पर बात तक नहीं

यामिनी अय्यर

यामिनी अय्यर

Jul 12, 2019, 11:49 PM IST

भारत की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश किया इसलिए उम्मीदें काफी ज्यादा थीं। यह बजट दो कारणों से महत्वपूर्ण था। पहला यह कि नरेंद्र मोदी सरकार को शानदार जनादेश मिला और दोबारा चुने जाने के बाद यह पहला बड़ा नीतिगत कार्य था।

 

इस जनादेश ने सरकार को भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए कुछ सुधार करने का अभूतपूर्व अवसर दिया।  दूसरा, यह बजट बहुत कठिन परिस्थितियों में प्रस्तुत किया गया था- अर्थव्यवस्था काफी धीमी, बेरोजगारी की दर काफी अधिक, भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, विशेष रूप से कृषि आय में संकुचन हो रहा है और इसके साथ ही पेयजल समस्या भी एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरी है।


ये सभी मुद्दे महिलाओं को प्रभावित करते हैं। बढ़ती बेरोजगारी से देश की महिलाएं काफी प्रभावित हुई हैं। हाल ही के कुछ बरसो में लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी तेजी से घटी है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि लेबर फोर्स में केवल 18% महिलाएं हैं जबकि 2011-12 में 25% थीं। विश्व बैंक की एक हालिया रिपोर्ट में महिला श्रम शक्ति भागीदारी दर में भारत 131 देशों में से 121 वें स्थान पर है।

 

साथ ही कई पड़ोसी देशों की तुलना में हमारी लेबर फोर्स में महिलाओं की भागीदारी सबसे कम है। भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में संकट का इसमें महत्वपूर्ण योगदान है, क्योंकि यहां काम करने वाली महिलाओं की संख्या ज्यादा रही है। इसके अलावा, जल संकट का महिलाओं पर काफी असर पड़ता है।

 

भारत के मानव विकास सर्वेक्षण के मुताबिक जिन घरों में पानी का कोई स्रोत नहीं है या नल से पानी नहीं पहुंचता, वहां महिलाएं और लड़कियां प्रतिदिन अपने 52 मिनट पानी इकट्ठा करने में खर्च करती हैं, जबकि पुरुष सिर्फ 28 मिनट प्रति दिन। जिस तरह से जल स्रोत सूख रहे हैं इससे भविष्य में महिलाओं को अपना और अधिक समय पानी इकट्ठा करने के लिए देना होगा।


सवाल यह है कि बजट में महिलाओं को क्या मिला? यह इसलिए भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि महिला मतदाता भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण वोटबैंक है। इसलिए राजनीतिक रूप से भी यह उम्मीद की जा रही थी कि बजट महिलाओं पर केंद्रित होगा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ‘नारी तू नारायणी’ शीर्षक के साथ महिला कल्याण के लिए अपने बजट भाषण का एक हिस्सा समर्पित किया। जिसमें स्वामी विवेकानंद द्वारा स्वामी रामकृष्णानंद को भेजे गए एक पत्र का उद्धरण दिया कि महिलाओं की स्थिति में सुधार किए बिना दुनिया में कल्याण की गुंजाइश नहीं है। लेकिन बजट सिर्फ राजनीतिक भाषण नहीं होता।

 

इसमें आवंटन और व्यय का विवरण भी शामिल होता है। अंतरिम बजट में पहले ही विभिन्न योजनाओं के लिए आवंटन कर दिया गया था और अर्थव्यवस्था की ओवरऑल हेल्थ को देखते हुए आवंटित करने के लिए बहुत कम पैसा था। मौजूदा योजनाओं को प्राथमिकता देने पर ध्यान केंद्रित किया गया था, जिनमें से कई को 2018-19 के बजट की तुलना में थोड़ा बढ़ावा मिला, लेकिन कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। जैसे महिला और बाल विकास मंत्रालय के आवंटन में 17% की वृद्धि करते हुए इसे 29,164.90 करोड़ रुपए कर दिया गया।

 

इसमें से 19,834.37 करोड़ रुपए आंगनवाड़ी सेवाओं के लिए है। इसके पहले के वित्त वर्ष में मंत्रालय के लिए 24,758.62 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। राष्ट्रीय पोषण मिशन (पोषण अभियान) को 3400 करोड़ रुपए आवंटित किया गया है, जबकि 2018-19 में यह 2990 करोड़ था। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना को पिछले बार की तुलना में दोगुना यानी 2500 करोड़ रुपए से 1200 करोड़ कर दिया गया।


दिलचस्प बात यह है कि 2019 के चुनाव अभियान के दौरान भाजपा द्वारा संदर्भित योजना बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के आवंटन में कोई बदलाव नहीं किया गया और पिछली बार की तरह 280 करोड़ रुपए ही दिए गए। हालांकि सरकार को महिलाओं के लिए आवंटन में वृद्धि नहीं करने को नजरअंदाज किया जा सकता है, लेकिन सभी को नल से पानी उपलब्ध कराने के लक्ष्य के साथ जल शक्ति विजन शुरू करने के लिए तारीफ की जानी चाहिए। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए महिला श्रम शक्ति की भागीदारी की कठिन चुनौती से निपटने के लिए एक रोडमैप जैसी महत्वपूर्ण चीज इस बजट से गायब थी।

 

वास्तव में अधिक व्यापक रूप से नौकरियों और कृषि सुधारों के मुद्दे को बड़े पैमाने पर अनसुना कर दिया गया और यहीं पर बजट सबसे ज्यादा निराशाजनक रहा।  महिलाओं के लिए बनी उज्ज्वला योजना पर बहुत जोर दिया गया है। माना जाता है कि इसकी लोकप्रियता भाजपा की चुनावी सफलता का एक महत्वपूर्ण कारण थी। हालांकि, अध्ययन बताते हैं कि नए उपयोग को प्रोत्साहित करना एक कठिन काम है।  जलाऊ लकड़ी और गोबर के उपले काफी आसानी और सस्ते दाम में मिल जाते हैं, साथ ही पारंपरिक स्वाद को चूल्हों पर पके हुए भोजन से जोड़ा जाता है।

 

आरआईसीई संस्थान के एक अध्ययन में पाया गया कि ग्रामीण बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सर्वेक्षण में शामिल 85% उज्ज्वला योजना लाभार्थियों ने चूल्हों का उपयोग करना जारी रखा। यहां एलपीजी को उपयोग में लाने में कुछ बड़ी रुकावटें हैं जैसे इन्हें भराने के लिए पैसों की किल्लत, भारी सिलेंडर को खराब सड़कों पर एक जगह से दूसरी जगह तक ले जाने के लिए परिवहन की समस्या, सामाजिक-आर्थिक पहलू, जैसे कि महिलाएं ईंधन के लिए बायोमास इकट्ठा करती हैं और साथ ही घर के प्राथमिक निर्णय लेने का अधिकार उनके पास नहीं होता हैैं। अगर सरकार उज्ज्वला के निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करना चाहती है, तो वास्तविक उपयोग के लिए एलपीजी की डिलीवरी पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

 
वित्तमंत्री के बजट भाषण में इन बातों को शामिल नहीं किया गया था। महिलाओं के मुद्दों के दृष्टिकोण से, बजट 2019 एक मिश्रित बैग था। इसमें राजनीतिक संदेश महत्वपूर्ण था, महिलाओं से संबंधित योजनाएं प्राथमिकता रही, लेकिन महिला श्रम शक्ति की भागीदारी और एलपीजी सिलेंडरों के उपयोग से जुड़ी कठिन चुनौतियों पर कोई बात नहीं हुई। मेरे आकलन में यह एक औसत प्रदर्शन था!

COMMENT