संदर्भ / अब मध्यवर्ग की कीमत पर होगा गरीबों का भला?

sandarbh article on Budget and middle class
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  • दशकों तक धर्मनिरपेक्ष दलों ने मुस्लिमों के साथ जो किया वही अब भाजपा मध्यवर्ग के साथ कर रही है

शेखर गुप्ता

शेखर गुप्ता

Jul 21, 2019, 06:51 AM IST

नरेन्द्र मोदी सरकार के ताजा बजट में 2 करोड़ रुपए सालाना से ज्यादा कमा रहे अमीर लोगों पर लगने वाले टैक्स की शीर्ष दर को बढ़ाया गया है। 5 करोड़ रुपए सालाना से ज्यादा कमाने वालों के लिए तो यह वृद्धि और भी ज्यादा है। सर्वोच्च दर अब 42.3 फीसदी हो गई है। हमारे जैसे लोग इसे इंदिरा गांधी की ‘अमीरों को चूसो’ शैली की राजनीति का उदाहरण कहेंगे।

 

कई इसे इस बात का उदाहरण बताकर स्वागत करेंगे कि मोदी ने इमरजेंसी बाद के संविधान की प्रस्तावना में बताए अनुसार समाजवाद के आदर्शों को पूरी तरह अपना लिया है। फिर चाहे वे दक्षिणपंथ की सबसे स्थिर सरकार के दूसरे कार्यकाल का नेतृत्व ही क्यों न कर रहे हों। दोनों गलत हैं, क्यों मोदी सरकार वास्तव में धनी वर्ग को नहीं मध्य वर्ग को लूट रही है, जो उसका सबसे वफादार वोट बैंक भी है। सवाल है कि क्या उनकी असंदिग्ध वफादारी के कारण ही सरकार को उनसे ऐसे व्यवहार की सहूलियत मिलती है?


पिछले पांच साल में मोदी सरकार ने शायद सर्वाधिक कुशलता से राष्ट्रीय संपदा का गरीबों के पक्ष में पुनर्वितरण किया है। एकदम सटीक आंकड़े का अनुमान तो कठिन है पर आवास, टॉयलेट, रसोई गैस और मुद्रा लोन के माध्यम से 9 से 11 लाख करोड़ रुपए गरीबों में बंटे हैं। माना गया है कि इसमें न्यूनतम लीकेज हुआ और जाति व धर्म का भेदभाव नहीं हुआ। इससे मोदी को दूसरी बार बड़ा जनादेश हासिल करने में मदद मिली।

 

लेकिन, यह पैसा आया कहा से? तत्काल हमारे दिमाग में यही आएगा कि यह अमीरों से आया होगा। लेकिन ऐसा है नहीं। कच्चे तेल की कीमत गिरने के बाद भी सरकार ईंधन पर टैक्स बढ़ाती रही और मुनाफा अपने जेब में डालती रही। यह ज्यादातर अपने वाहनों का उपयोग करने वाले मध्य वर्ग से आया। आप निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि गरीबों को संपदा का हस्तांतरण हुआ, लेकिन यह पैसा धनी वर्ग से नहीं, सभी स्तरों के मध्यवर्ग से आया। एहसानमंद गरीबों से इतने वोट भी मिले कि शानदार जीत हो गई।


एक्ज़िट पोल के आंकड़े बताते हैं कि बड़े महानगरों से लेकर शहरीकरण से गुजरते राज्यों में मध्यवर्ग ने भाजपा के पक्ष में जबर्दस्त मतदान किया। तीव्र शहरीकरण से गुजरता देश का सबसे धनी राज्य हरियाणा इसका उदाहरण है, जहां अत्यधिक गरीब लोग बहुत थोड़े हैं। भाजपा वहां 2014 तक हाशिये पर थी। अब उसे वहां 58 फीसदी वोट मिले हैं। मोदी ने जिस तरह अपनी अर्थव्यवस्था चलाई, यह उसका सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। उन्होंने मध्यवर्ग से लेकर सबसे निचले वर्ग को दिया और दोनों एक जैसे उत्साह से उसे वोट दे रहे हैं। मध्य वर्ग उनके सबसे मजबूत वोट बैंक के रूप में उभरा है। वह खुशी से इसकी कीमत भी चुका रहा है।

 

अब ताजा बजट की बात करें। फिर एक बार अमीरों से लेने का दिखावा भर किया गया है लेकिन, क्या इससे अमीरों को चिंता होनी चाहिए? सीबीडीटी का डेटा बताता है कि पिछले वित्तीय वर्ष में केवल 6,351 लोगों ने 5 करोड़ रुपए से अधिक की आय दर्शाई, जिसमें औसत आय 13 करोड़ रुपए रही। इससे कितना अतिरिक्त राजस्व मिलेगा? करीब 5,000 करोड़ रुपए। आईपीएल के सालाना टर्नओवर से बहुत ज्यादा नहीं। गरीब रोमांचित होंगे कि अमीरों से वसूली हो रही है। वास्तव में जो धनी हैं वे फुसफुसाकर शिकायत करेंगे पर बेनामी चुनावी बांड खरीदकर उन्हें एक लेटर बॉक्स में डालते रहेंगे- आप समझ सकते हैं कौन-सा बॉक्स। क्योंकि वे ऐसा नहीं करेंगे तो कर अधिकारी उन तक पहुंच जाएंगे।


ऐसे सस्ते रोमांच व मनोरंजन से गरीबों को आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है लेकिन, असली मजाक तो मध्यवर्ग से हुआ है, क्योंकि 2014-19 की तरह वे ही गरीबों को संपदा के हस्तांतरण में योगदान देंगे। वित्तमंत्री ने उन्हें पेट्रोल व डीज़ल पर अतिरिक्त टैक्स का तोहफा दिया है वह भी कच्चे तेल की कीमत में गिरावट की ‘भरपाई’ के लिए। इसके बाद बहुत सारी नीतियां ऐसी हैं, जिसे अमीरों को नहीं, ‘मध्यवर्ग को चूसो’ कहा जा सकता है।

 

मोदी शासन में इक्विटी पर दीर्घावधि कैपिटल गैन्स टैक्स लाया गया, लाभांश वितरण टैक्स लगाया गया, लाभांश से होने वाली 10 लाख रुपए सालाना से ज्यादा आय पर अतिरिक्त कर लगाया गया, 50 लाख और एक करोड़ रु. के बीच की आय पर सरचार्ज बढ़ाया गया (बशर्ते आप उन्हें आज के अत्यधिक धनी वर्गों में न गिने), रसोई गैस सहित विभिन्न सब्सिडी घटाई गई और वापस ली गई। फालतू की सब्सिडी को हटाने का स्वागत है लेकिन, याद रहे कि कीमत कौन चुका रहा है।


उभरते और फैलते मध्यवर्ग के साथ मोदी और भाजपा का ऐसा व्यवहार जारी रहना यह बताता है कि उन्होंने इस वर्ग को अच्छी तरह अपने पक्ष में कर लिया है। उसकी वफादारी आर्थिक पक्ष से नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद के हिंदू व बाहुबली रूप से है, जो वे लेकर आए हैं। इसमें मुस्लिमों के लिए नापसंद और जोड़ दें। उनमें से कई लोगों को लिंचिंग वीभत्स लगती है पर मुस्लिमों को सत्ता के ढांचे से पूरी तरह बाहर देखकर खुश हैं- कैबिनेट, शीर्ष सरकारी पद और संसद में अत्यंत अल्प संख्या।


मेरे सहयोगी और राजनीतिक संपादक डीके सिंह ने भाजपा के वित्त मंत्रियों द्वारा अपने बजट भाषणों में मध्यवर्ग के किए उल्लेख के आंकड़े निकाले हैं। आमतौर पर औसत 5 है। पीयूष गोयल के अंतरिम बजट में अचानक यह आंकड़ा 13 तक पहुंच गया। यह चुनाव का वक्त जो था। अब निर्मला सीतारमण के भाषण में यह 3 तक गिर गया। वे फरवरी में गोयल द्वारा किए सारे वादे भूल गईं : स्टैंडर्ड डिडक्शन में बढ़ोतरी, टीडीएस की सीमा तय करने, टैक्स स्लैब में रियायतें आदि।

 

हमारे प्रति प्रेम के वशीभूत होकर आप हमें वोट देंगे ही तो हम चिंता क्यों करे, जबकि गरीब हमें एहसानमंद होकर वोट देंगे? दशकों तक धर्मनिरपेक्ष दलों ने मुस्लिमों का ऐसा ही इस्तेमाल किया। उन्हें मालूम था कि आरएसएस/भाजपा से घबराकर मुस्लिम उन्हें वोट देंगे ही। यह वोट संरक्षण के लिए फिरौती जैसा था। उन्हें मुस्लिमों के लिए कुछ करने की जरूरत नहीं महसूस हुई। अब इसी तरह भाजपा को लगता है कि बहुसंख्यक मध्यवर्गीय उसे वोट देने को बुनियादी रूप से मजबूर हैं। इसलिए हम उन्हें मोदी के ‘मुस्लिम’ कहते हैं।


(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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