संदर्भ / जायरा का फिल्मी दुनिया छोड़ना क्या दर्शाता है?



sandarbh article on Zaira Wasim decision to leave bollywood
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sandarbh article on Zaira Wasim decision to leave bollywood

  • महिलाओं के सपने देखने व आज़ादी पर लगाम और देश के उदारवादी तबके की आश्चर्यजनक चुप्पी

Dainik Bhaskar

Jul 09, 2019, 10:58 PM IST

फिल्मों से जायरा वसीम का नाता अब तक सफल ही रहा है। पहली फिल्म ‘दंगल’ बेहतरीन थी और दूसरी सीक्रेट ‘सुपरस्टार’ ने भी कई अवॉर्ड जीते। ‘मैं आई, मैंने देखा और मैंने जीत लिया’ वाले रवैये के साथ जायरा ने फिल्म के हर सीन पर कब्जा जमाया और कम समय में दर्शकों का दिल जीत लिया। लेकिन, जायरा ने हाल ही में चौंकाते हुए फिल्मी दुनिया को अलविदा कहने की घोषणा कर डाली।

 

कारण यह बताया कि फिल्मों में एक्टिंग करना उसके धर्म और ईमान को नुकसान पहुंचा रहा है। कुरान की आयतों से भरी अपनी फेसबुक पोस्ट में उसने लिखा कि वह धर्म के रास्ते पर लौट रही है। क्या जरूरत है किसी धर्म के लिए किसी प्रोफेशन को छोड़ने की? हैरानी की बात तो यही है। दुनिया भर में काम करने वाले करोड़ों प्रोफेशनल अपनी धार्मिक जिम्मेदारियों को बखूबी आसानी से निभा रहे हैं।


जितना कुछ मैंने जायरा के बारे में सुना और देखा है- वह जो कपड़े पहनती है, जिस तरह से पेश आती है, जो कुछ कहती है- हर चीज में वह हमेशा ही एक स्मार्ट यंग गर्ल लगी है। फिर अपने खूबसूरत और सुनहरे कॅरिअर को बरबाद करने की क्या जरूरत थी? क्यों उसने एक्टिंग छोड़ने का फैसला किया? क्या यह वह अपनी मर्जी से कर रही है?

 

क्या सचमुच उसने कुरान इतनी अच्छी तरह पढ़ और सीख ली है, जिसके चलते उसने अपनी फेसबुक पोस्ट में बार-बार आयतों का जिक्र किया? मुझे लगता है कि जो जायरा ने लिखा वे उसके शब्द नहीं हैं। किसी और ने उसके लिए लिखे हैं। उसने जो इस्लामी कट्‌टरपंथी है। उसने जो किसी भी वक्त आतंकवादी में बदल सकता है। 


संभवत: जायरा को फिल्मी दुनिया छोड़ने के लिए मजबूर किया गया है। ठीक वैसे जैसे कुछ साल पहले ऑल फीमेल कश्मीरी रॉक बैंड प्रगाश को म्यूजिक छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। तब जामिया मस्जिद के मुफ्ती ने बैंड की लकड़ियों के खिलाफ फतवा जारी किया था। उन्हें जान से मारने की इतनी धमकियां मिलीं कि आखिरकार उन्होंने अपना बैंड ही बंद कर दिया। कश्मीर में लड़कों के भी बैंड हैं, लेकिन उनके खिलाफ कभी फतवे जारी नहीं होते। कश्मीरी मर्द फिल्मों में काम करते हैं, उनपर कभी एक्टिंग छोड़ने का दबाव नहीं डाला गया। 


जायरा फिल्मों के ऑफर ठुकराकर चुपचाप इंडस्ट्री छोड़कर जा सकती थी। लेकिन, इसकी बजाय उसने सार्वजनिक तौर कहा कि एक्टिंग से किसी के ईमान, चरित्र को नुकसान पहुंचता है। एक्टिंग करना अल्लाह को नाराज करना है और धर्म की बेइज्जती भी। उसकी घोषणा खतरनाक थी, क्योंकि वह राजनीतिक थी। यह इस्लाम नहीं हो सकता, यह राजनीतिक इस्लाम है। यह इस्लाम का वह प्रकार है जो दुनिया में आतंकवाद के लिए जिम्मेदार है।

 

जायरा के माध्यम से देश की मुस्लिम लड़कियों को संदेश दिया गया है। यह जरिया था उनसे यह कहने का कि उन्हें एक्टिंग छोड़ देनी चाहिए और उसे प्रोफेशन नहीं मानना चाहिए। इसी तरह म्यूजि़क, आर्ट, लिटरेचर या ऐसी कोई भी चीज जिसके लिए घर की चहारदीवारी से बाहर निकलना पड़े, उसमें कॅरियर नहीं बनाना चाहिए। औरत के लिए वह आज़ादी हराम है। महिलाएं घर में रहने और कुरान-हदीथ पढ़ने, रोजे रखने और इबादत करने के लिए बनी हैं। उन्हें घर से बाहर निकलने से पहले हमेशा बुरका पहनना चाहिए।

 

महिलाओं को घर में रहना चाहिए और अपने पति के घर की देखभाल करनी चाहिए। उसे खुश रखना चाहिए और बच्चे पैदा करना चाहिए, जिन्हें वह इस्लाम की शिक्षा दे सके। आईएसआईएस के आतंकी मानते हैं कि मुस्लिम महिलाओं की भूमिका मुस्लिम पुरुषों की गुलाम होने से ज्यादा कुछ नहीं है। उन्हें लगता है कि महिलाएं पुरुषों की जागीर हैं। और जागिरों की जिं़दगी नहीं होती। जिसने जायरा का पोस्ट लिखा है उसने एक्टिंग छोड़ने का दबाव डालकर यह साबित किया है कि वह अभी भी शक्तिशाली हैं। यही नहीं महिला आर्टिस्ट को जान से मारने की धमकियां भी दी गई हैं। 


ऐसे मोड़ पर सिर्फ बॉलीवुड नहीं बल्कि देश के हर प्रगतीशील व्यक्ति को जायरा जैसी उम्दा कलाकार का कॅरियर खत्म करने की नापाक साजिश का विरोध करना चाहिए। विरोध होना चाहिए धर्म के नाम पर उसे बुरके के गहरे काले अंधेरे में धकेलने का। पर दिक्कत तो यह है कि गिने-चुने लोगों के अलावा कोई इन इस्लामिक कट्‌टरपंथियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाता। कहां हैं वे महिलावादी, सेकुलर, मानवाधिकार के रक्षक, बुद्धिजीवी, लेखक और कलाकार? कब तक यूं महिलाओं की खूबियों और गुणों को इस्लाम के नाम पर मौत के घाट उतारा जाता रहेगा?


इस्लाम को शत प्रतिशत मानना किसी मुसलमान के लिए भी मुमकिन नहीं है। इसलिए उन्होंने कितना और क्या मानना है यह चुन लिया है। इस्लाम में कहा गया है कि चोर के हाथ काट देने चाहिए। क्या इससे मुसलमानों ने चोरी करना बंद दिया? मुस्लिम देश खासतौर पर भ्रष्टाचार में गहरे धंसे हैं। मर्द इस्लाम की कही सारी सीख नहीं मानते, लेकिन औरतों को मानने के लिए मजबूर करते हैं। सिर्फ इसलिए, क्योंकि ऐसा करना आसान है। हमारे समाज के पितृसत्तात्मक ढांचे ने लंबे समय तक महिलाओं को अपने कब्जे में रखा है।


कई मुस्लिम देशों जैसे बांग्लादेश, पाकिस्तान, ईरान, मिस्र, जॉर्डन में फिल्में बनती हैं। फिल्में बनाने वाले और उनमें काम करने वाले मुस्लिम हैं। आखिर कब से एक्टिंग किसी की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ हो गई है? जब वह उन हजारों कलाकारों के लिए दिक्कत नहीं तो जायरा के लिए क्यों? जायरा का यह फैसला उसका नहीं है लेकिन, अब उसके पास एक्टिंग छोड़ने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं।

 

ठीक उसी तरह जैसे मेरे पास अपना देश छोड़ने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था। ऐसे ही कई लड़कियों को म्यूजि़क, डांस, पेंटिंग, पढ़ाई, नौकरी सब छोड़ने को मजबूर किया जाएगा। लड़कियों के हिस्से सपने देखना या आज़ादी की उम्मीद करना नहीं आता। इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण आखिर क्या होगा? या तो इस्लामी परम्पराओं में सुधार हो या फिर महिलाएं ही उसे छोड़ दें। इसके अलावा कोई हल मुझे तो नज़र नहीं आता।


(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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