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मजबूत नेता की अर्थनीति मजबूत हो जरूरी नहीं

4 महीने पहलेलेखक: शेखर गुप्ता
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी- फाइल फोटो।
  • प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चरम पर वापस ले लिया था भूमि अधिग्रहण जैसा सुधार
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अब समय आ गया है कि भारतीय राजनीति के हम जैसे विश्लेषक दो बातें स्वीकार करें। पहली, हम पिछले कुछ समय से गलत सवाल पर बहस कर रहे हैं। दूसरी यह कि हम गलत जवाब को आगे बढ़ा रहे थे। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से ही यह सवाल बना रहा है कि क्या अच्छी अर्थनीति ही अच्छी राजनीति है? दूसरे शब्दों में क्या आप आर्थिक सुधार करके, सरकार और अफसरशाही का आकार घटाकर, कुछ ताकत बाजार को देकर, विकास दर को बढ़ाकर दोबारा चुनाव जीत सकते हैं? अगर नहीं तो इसके लिए क्या करना चाहिए? इसका उत्तर है कि एक मजबूत नेता चुनें जो राजनीतिक जोखिम उठाने से डरता नहीं हो। केवल ऐसा करके ही अच्छी अर्थव्यवस्था हासिल की जा सकती है। हाल के राजनीतिक इतिहास की वास्तविकता यह है कि हम दोनों ही मोर्चों पर गलत रहे। इंदिरा गांधी के बाद हम सबसे मजबूत नेतृत्व के छठे वर्ष में हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि मोदी उनसे भी मजबूत हैं। आखिर उन्होंने ऐसे जोखिम उठाए और निर्णय लिए जो इंदिरा अपने शिखर दिनों में भी नहीं कर पाईं। जैसे जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करना। परंतु कुछ सवाल बाकी हैं। पहला तो यही कि यदि देश का सबसे मजबूत और साहसी नेता अभी भी अच्छी राजनीति कर रहा है तो क्या इससे अच्छी अर्थव्यवस्था का रास्ता बना है? हम यह नहीं कह रहे हैं कि आपने जिसे चुना है उस निर्णय पर आप पछताएं। आपके वोट देने के पीछे सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि कई कारण होते हैं। सवाल यही है कि क्या मजबूत नेता का मतलब मजबूत अर्थव्यवस्था भी होता है? 2019 में मोदी दोबारा और बड़े बहुमत से चुनकर आए तो दो बातें साबित हुईं। पहली, उन्होंने अच्छी राजनीति की और दूसरा वृद्धि में ठहराव, बढ़ते घाटे और बेरोजगारी के बावजूद मतदाताओं ने उन्हें वोट दिया। यही वजह है कि इन तमाम वर्षों में हमारा पहला प्रश्न ही गलत था कि क्या अच्छी अर्थनीति अच्छी राजनीति को जन्म देती है? सवाल यह होना चाहिए था कि क्या अच्छी और सफल राजनीति को अर्थव्यवस्था की परवाह करने की जरूरत है? उत्तर स्पष्ट है कि यदि आप अपनी राजनीति को समझते हैं, सही भावनात्मक पहलुओं को स्पर्श कर सकते हैं, पर्याप्त तादाद में लोगों को लाभ पहुंचा सकते हैं तो वे बेरोजगारी, रुकी विकास दर और कृषि आय में ठहराव जैसी बातों की अनदेखी कर देंगे। परंतु आज कोई आंकड़ा हमें राहत नहीं प्रदान करता। तमाम आर्थिक संकेतक नकारात्मक हैं। तो क्या मजबूत नेतृत्व अच्छी और साहसी अर्थव्यवस्था की गारंटी नहीं है? किसी वैचारिक विश्लेषण को आंकड़ों के माध्यम से साबित करना अत्यंत कठिन है। बहरहाल, क्वार्ट्जडॉटकॉम की रिपोर्टर एनालिसा मेरेली ने स्टेफनी रिजियो और अहमद सकाली द्वारा रॉयल मेलबर्न इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलांजी व विक्टोरिया यूनिवर्सिटी के लिए किए गए अध्ययन की रिपोर्ट के रूप में हमें यह अनमोल चीज दी है।    इन शोधकर्ताओं ने 133 देशों के 1858 से 2010 (152 वर्ष) के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि मजबूत नेता अपनी अर्थव्यवस्थाओं के लिए नुकसानदेह रहे या बेमानी। अध्ययन कहता है कि ऐसे ताकतवर नेताओं में संयोग से कुछ अच्छे भी निकलते हैं, लेकिन मोटे तौर पर तो उनका अपने देश की अर्थव्यवस्थाओं पर नकारात्मक असर ही पड़ता है। मेरेली अपने अध्ययन में कहती हैं कि ‘अधिकतकर शक्तिशाली नेताओं ने अपने देश की अर्थव्यवस्थाओं को उससे भी बुरी हालत में छोड़ा, जिस हालत में वह उन्हें मिली थी। या फिर उन्होंने उस आर्थिक लहर की सवारी की जिसे आना ही था।’ ये सारे नेता तानाशाह नहीं थे। प्रश्न यह है कि मतदाताओं ने उन्हें दंडित क्यों नहीं किया? मतदाता ऐसे नेताओं की तुलना में कमजोर नेताओं को जल्दी दंडित क्यों करते हैं? भारतीय संदर्भ में बात करें तो आपातकाल के कारण इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर करने के बाद मतदाता तीन वर्ष से भी कम समय में उन्हें वापस सत्ता में ले आए। मजबूत नेता के प्रति यह कैसा खिंचाव है? उपरोक्त शोध इस बारे में वानरों के दृष्टांत का सहारा लेते हुए कहता है कि कठिन समय में वे सबसे मजबूत नर वानर का नेतृत्व स्वीकारते हैं। यानी यह सही नहीं है कि मजबूत नेता आर्थिक मोर्चे पर भी बेहतर होगा। जरा मोदी के कार्यकाल पर नजर डालिए। मेरी नजर में उनका सबसे साहसी और सुधारवादी कदम नया भूमि अधिग्रहण विधेयक था और यही एकमात्र ऐसा कदम है, जिससे वह पीछे हटे। अपनी सत्ता और लोकप्रियता के शिखर पर वह यह जोखिम लेने से पीछे हट गए। छह साल में ऐसा केवल एक बार हुआ। इसके विपरीत सबसे खराब और बिना सोचे समझे लिए गए नोटबंदी के निर्णय पर वह टिके रहे। इससे उन्हें राजनीतिक लाभ भी मिला। कम से कम उत्तर प्रदेश के चुनाव में, जो नोटबंदी के ठीक बाद हुए थे। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे उनकी निर्णायक नेता की छवि और मजबूत हुई थी। (ये लेखक के अपने विचार हैं)  

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