पेचीदगी / उम्र या फिर क्षमता पर भी केंद्रित हो कानून?



प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

  •  जटिल सामाजिक-आर्थिक परिवेश में बाल विवाह से जुड़े कानून को लड़कियों के नजरिये से भी देखें
     

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2019, 12:34 AM IST

मधु मेहरा. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय कम उम्र में हुई सभी शादियों को शून्य घोषित करने पर विचार कर रहा है। इसके साथ ही लड़कों के लिए शादी की कानूनी उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष करने की भी योजना है। एक समय बाल विवाह को केवल सामाजिक कुरीति की नजर से देखा जाता था, पर आज बाल विवाह की लड़ाई लैंगिक समानता, मौलिक अधिकार और विकास का मुद्दा है। यह मुद्दा किशोर-किशोरियों के मानव अधिकारों पर आधारित है।

 

बड़ा सवाल यह नहीं है कि कितनी जल्दी और सख्ती से कम उम्र के विवाह रद्द किए जाएं। सवाल यह है कि लड़कियों को ऐसे अवसर और माहौल उपलब्ध हो सकें जिससे उन्हें केवल विवाह के लिए तैयार न किया जाए। हर बाल संरक्षण कानून युवक और युवतियों के हित, क्षमताओं के साथ उनके निजी निर्णय लेने की शक्ति का आदर करे। केवल बाल विवाह के आंकड़े कम करने से लड़कियों के लिए नए और प्रगतिशील अवसर नहीं पैदा होते। चौथे नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक 18 साल से पहले हुई शादियों की संख्या में काफी  गिरावट आई है।

 

आज भारत में ज़्यादा संख्या में लड़कियों के शिक्षा प्राप्त करने और विवाह की उम्र में बढ़ोतरी के बावजूद, शादी लड़कियों के लिए आर्थिक ज़रूरत और सामाजिक स्वीकृति व प्रतिष्ठा के लिए अनिवार्य है। बढ़ती शिक्षा के बावजूद, रोजगार में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ने की जगह घटी है। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की भागीदारी मज़दूरी में घटी है। इसी के चलते शादी लड़कियों के लिए आर्थिक जरूरत बन जाती है। लेकिन, लड़कियों का समय काफी छोटी उम्र से माता-पिता के घर और फिर ससुराल में घरेलू काम और देखभाल में कमर तोड़ मेहनत करते बीतता है, जिसकी कोई गिनती या कमाई नहीं। इन जिम्मेदारियों के चलते गरीब तबके की लड़कियों को कई बार पढ़ाई बीच में छोड़ना पड़ती है। इन परिस्थितियों में शादी को जल्द वयस्क होने के पहलू बतौर देखा जा सकता है। 


इस जटिल सामाजिक-आर्थिक परिवेश के बीच बाल विवाह और बाल संरक्षण कानूनों से जुड़े कुछ सवालों पर चर्चा की ज़रूरत है। क्या बाल विवाह को शून्य घोषित करना और शादी करवाने वाले परिवारों को सजा देने के प्रावधान लड़कियों के हित में होंगे? इसे समझने के लिए, कानून क्या कहता है, उसका इस्तेमाल कौन और किस कारण होता है, जानना होगा। बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006, शादी की न्यूनतम आयु निर्धारित करता है, इसके अलावा यह बाल विवाह निषेध अधिकारी नियुक्त करता है जिसका काम कम उम्र की शादियां रुकवाना और रद्द करना होता है।

 

वर्तमान में शादी की न्यूनतम आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष है। पार्टनर फॉर लॉ इन डेवलपमेंट के बाल विवाह निषेध अधिनियम से जुड़ी रिसर्च के मुताबिक यह कानून ज्यादातर माता-पिता द्वारा बेटियों की खुद की पसंद से की गई शादियों के खिलाफ केस दर्ज करवाने में इस्तेमाल होता है। जिसमें लड़की के पति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी होती है। रिसर्च में शामिल 83 केस में से 65% माता-पिता ने बेटी की मनपसंद शादी के खिलाफ दर्ज करवाए थे, जबकि केवल 35% केस ही माता-पिता द्वारा जबरन शादी करवाने को लेकर थे। नाममात्र के मामले बाल विवाह निषेध अधिकारी की पहल पर दर्ज हुए थे। इसमें विशेष रूप से लड़की के माता-पिता ने उसके पति के खिलाफ अपहरण, दुष्कर्म और बाल शोषण के आरोप लगाए थे, जिसमें पॉक्सो का हवाला भी दिया गया था। 


2012 में पॉक्सो के अधिनियमन के साथ यौन सहमति की आयु 16 साल से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई, जिससे यह विवाह की कानूनी उम्र के बराबर हो गई। नतीजन 18 साल से थोड़ी ही कम उम्र की अवयस्क लड़की के साथ हमउम्र पति के सहमति से बनाए गए संबंध भी दुष्कर्म हो गए। यह एक्ट शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और भावनाओं के स्तर पर छोटे बच्चे और किशोरों में फर्क नहीं देखता है। नतीजा बाल विवाह और पॉक्सो कानून युवा प्रेमियों पर दबाव और दमन के लिए इस्तेमाल होते हैं। बाल विवाह के उल्लंघन के लिए 2 साल की सजा का प्रावधान है जो पॉक्सो के सााथ बढ़कर कम से कम 10 साल हो जाती है।

 

कानूनी उम्र से कम में हुए विवाहों में परिवार द्वारा तय या जबरन विवाह ही सबसे ज्यादा होते हैं। पर अफसोस, कानून होते हुए भी, इन पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती। लड़कियां, बाल विवाह निषेध अधिनियम का इस्तेमाल जबरन करवाई शादी से छुटकारा लेने को भी नहीं कर पाती हैं। वहीं दोनों कानून माता-पिता के नियंत्रण और नैतिक पुलिसिंग के लिए इस्तेमाल होते हैं। कानून ज्यादा से ज़्यादा शादी रोकने या टालने और दंड देने में मदद कर सकता है। वह लड़की को सुरक्षित माहौल, व्यवसाय और साधिकार संपूर्ण भविष्य नहीं दे सकता। शिकायत दर्ज करने पर लड़की के माता पिता की गिरफ्तारी अनिवार्य है।

 

लड़की को शेल्टर होम भेजा जाता है। परिवार बिखर जाता है और बाकी बच्चे बिना देखरेख के छोड़ दिए जाते हंै। जिससे लड़की को प्रतिघात या परिवार की सामाजिक अस्थिरता परेशान करती है। शिकायत दर्ज करना मुश्किल है और उसमें जोखिम भी है। विवाह रद्द करने से सामजिक, आर्थिक और कानूनी असलियत बदल नहीं सकती। संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार संधि के तहत 18 से कम उम्र का व्यक्ति बच्चा तो है, लेकिन इनके अधिकार ’सर्वोत्तम हित’ और ‘बढ़ती क्षमताओ’ से तय होने चाहिए। अपने फैसले खुद लेने के लिए क्षमता और अधिकारों की सुरक्षा देना सरकार और समाज का जिम्मा है।

 

बढ़ती उम्र के साथ बच्चों और किशोरों को यौन शिक्षा और प्रजनन की सही और पूरी जानकारी बिना किसी पूर्वाग्रह के उपलब्ध कराई जानी चाहिए। वहीं हमारे वर्तमान कानून के महत्त्वपूर्ण प्रावधान के तहत शून्यीकरण का विकल्प लड़की व लड़के दोनों को प्रक्रियागत उपलब्ध होना चाहिए। बाल विवाह का सन्दर्भ पेचीदा और जटिल है। इससे जुड़े कानून को बदलना ज़रूरी है। पर ये बदलाव केवल उम्र आधारित विवाह पर दंडनीय नजरिया नहीं ला सकता। युवाओं के हित का कानून उनके मानवाधिकारों और क्षमताओं पर केंद्रित होना चाहिए, जो खासकर गरीब तबके की लड़कियों और लड़कों को अपने जीवन और भविष्य पर नियंत्रण दिला सके।

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