सुर्खियों से आगे / चोरी का कुआं, खोदो तो मिले

नवनीत गुर्जर

नवनीत गुर्जर

Feb 13, 2020, 01:30 AM IST

महान लेखक शरद जोशी का एक व्यंग्य है। एक प्यासे गांव में सरकार कुआं खोदने की मंज़ूरी देती है। कुआं खोद भी लिया जाता है। लेकिन, सिर्फ कागजों पर। गांव या गांव की जमीन पर नहीं। प्यास जस की तस। गांव में एक चतुर व्यक्ति था। उसने लोगों को सलाह दी। कुआं चोरी होने की रपट लिखवाओ।

गांव वालों ने कलेक्टर को शिकायत की। पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई। चोरी हुए कुएं को तलाशने के आदेश हो गए। गांव में पुलिस आई। किसने चोरी किया कुआं? कहां छिपाया? चतुर व्यक्ति आगे आया। उसने यहां-वहां, कई जगहें बताईं। फिर गांव के बीचोबीच ले जाकर पुलिस को बताया- मैंने चोर को यहीं देखा था साहब! उसने यहीं गाड़ा होगा कुएं को! पुलिस ने वहीं खुदाई की। इतनी कि पानी निकल आया। मिल गया गांव को कुआं।


दिल्ली वाले अरविंद केजरीवाल ने भी गांव के उस चतुर व्यक्ति की तरह कांग्रेस और भाजपा द्वारा छिपाए हुए कुएं को खोज निकाला था। तीसरी जीत का अमृत उसी कुएं से निकला है। कांग्रेस और भाजपा विकास की बातें तो करती थीं लेकिन सड़क, पुलिया, ब्रिज, ओवर ब्रिज तक सीमित। लोगों की इच्छा का मर्म कहीं दबा ही रह जाता था। यकीनन, सड़क, पुलिया, ब्रिज सब विकास ही हैं और यह दिखता भी है।

साफ-साफ। लेकिन जिस विकास का लोगों के मन पर सीधा असर होता है, वह कुछ और था। किसी कुएं में दबा हुआ। किसी खोह में छिपा हुआ। केजरीवाल ने उसे ढूंढ़ निकाला। बिजली बिल, अस्पताल और स्कूल। दिल्ली के स्कूल ज्यादा ली हुई फीस पैरेंट्स को वापस करें! अस्पताल जाकर आपको लगे ही नहीं कि यह सरकारी है!

असर तो पड़ता ही है। पड़ा भी। इससे भी बड़ी बात यह कि इन कामों के अलावा दो साल पहले से केजरीवाल ने केंद्र सरकार का व मोदी का विरोध करना छोड़ दिया। अपने काम से काम। भाजपा ने कहा- जय श्री राम। केजरीवाल ने कहा - जय श्री काम । बस, हो गया काम!


दिल्ली के इस बार के चुनावों ने एक सबसे बड़ा संदेश यह दिया कि बिना किसी जातिवाद, धार्मिक मुद्दे या आपराधिक गतिविधियों में संलग्न लोगों को टिकट देने, दूसरों पर दोष मढ़ने, आरोप लगाने से पूरी तरह परहेज़ करके भी चुनाव जीते जा सकते हैं। जीत भी मामूली नहीं, प्रचंड। वह भी लगातार तीसरी बार। कोई एंटी इन्कम्बेंसी नहीं। विरोध का कोई वोट नहीं। यही सबसे गजब बात है केजरीवाल की जीत में। वाकई ‘आप’ ने गजब कर दिया। 


भाजपा की मुश्किल यह है कि उसके पास मोदी के अलावा कोई चेहरा नहीं है। राज्यों में लगातार उसकी पराजय का यही कारण है। महाराष्ट्र, झारखण्ड, की पराजय सबको याद है। हरियाणा में भी बहुमत नहीं मिल पाया और दिल्ली तो दूर हो ही गई। दरअसल, लोकसभा चुनाव में मोदी खूब चलते हैं लेकिन राज्यों के चुनावों में आम आदमी को एक लोकल चेहरा चाहिए होता है जो भाजपा खोती जा रही है। राज्यों में केंद्रीय नेताओं के धुंआधार प्रचार से आम आदमी को लगता है ये कोई अंग्रेज आ गए दूसरे मुल्क से...! इसीलिए वे लोकल पार्टी या उसके नेता में भरोसा पक्का कर लेते हैं।

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