सुर्खियों से आगे / सशक्त विपक्ष की जरूरत के वक्त में कांग्रेस का द्वंद्व दुर्भाग्यपूर्ण



surkhiyon se aage column by arun chauhan
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surkhiyon se aage column by arun chauhan

Dainik Bhaskar

Aug 14, 2019, 12:34 AM IST

कांग्रेस को फिर से मजबूत बनाने का जिम्मा 72 साल की सोनिया गांधी के कंधों पर डालना, पार्टी की मजबूरी का ऐसा चेहरा नुमायां करता है, जिससे उबारने के लिए पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा लगातार अपनी पार्टी के अंदर ही जूझ रहे थे। संकुचित दायरे, दमघोंटू औपनिवेशिक औपचारिकताओं और लाट साहब की संस्कृति के मद में चूर रही पार्टी को नए सांचे में ढालने का संघर्ष उनके सहयाेगियों ने ही बेमानी कर दिया। धरातल से कट रही कांग्रेस को जमीन पर लाने की राहुल और प्रियंका की कोशिशें अपना एक चक्र पूरा कर जैसे िफर वहीं खड़ी होकर उनका उपहास ही कर रही हों।

 

हकीकत से भागने की इस बदहवासी में कांग्रेसियों को लोकसभा चुनाव में देश भर में पार्टी को मिले करीब 12 करोड़ वोट और इन मतदाताओं के विश्वास पर भी भरोसा नहीं रहा, जो पार्टी में हो रहे बदलावों के साथ भी खड़े थे। जिस दौर में देश में सशक्त विपक्ष की जरूरत सर्वाधिक हो, तब देश की सबसे पुरानी पार्टी का यह द्वंद्व दुर्भाग्यपूर्ण ही है। सियासत में संतुलन और फैसलों से नाइत्तेफाकी के मौकों पर विपक्ष की आवाज अप्रासंगिक होने का खतरा, न सिर्फ देश की जनतांत्रिक सेहत के लिए बल्कि स्वयं सरकार के लिए भी शुभ नहीं है।  


इसमें संदेह नहीं, कि सोनिया गांधी ने दो दशक पहले पार्टी को मुश्किल दौर में संभाला और सत्ता भी दिलाई थी। चुनौती आज भी ‘भावना बनाम जमीनी मुदृदे’ ही है, लेकिन सियासत में स्वैग की एंट्री, स्कूल आॅफ पॉलिटिकल वॉरफेयर में सामरिक प्रबंधन के अध्याय और शक्तिमान कैडर जैसी स्थापनाएं नई हैं। इस नव गुरुत्वाकर्षण शक्ति से मुकाबले के लिए जो तड़प राहुल और प्रियंका दिखा रहे थे, गांधी टैग से पार्टी को आजाद करने का जो इरादा वे बार-बार दोहरा रहे थे, उसका यह अंजाम कांग्रेस को ईंधन देगा या भाजपा को?     


दरअसल, भाजपा, कांग्रेस या अन्य दलों की रीति-नीति में सैद्धांतिक फर्क भले ही रहा हो, लेकिन जनता के दिलों में जगह हासिल करने के राजमार्ग का बुनियादी शास्त्र हर दल के लिए हर कालखंड में समान रहा है। जनमानस को मथ रहे विषयों पर राजनीतिक दलों का स्टैंड, भविष्य के भारत के निर्माण की उनकी कूवत, नागरिकों में देश की व्यवस्थाओं के प्रति विश्वास फूंकने और जनता में सेंस आॅफ प्राइड का संचार करने वाले नेता और दल लोक-स्वीकार्य रहे हैं। इस मार्ग की धूल, शूल और फूल को शिरोधार्य किए बिना राजनीति में राजतिलक तो दूर, अपनी प्रासंगिकता की अपेक्षा भी रखना बेमानी रहा है। तिस पर, नए जमाने की चुनौतियां राजनीति से लेकर समाज के प्रत्येक पारंपरिक स्वरूप का डायनमिक्स बदल रही हैं। मिलेनियल आबादी की मुखरता, सोशल मीडिया के बढ़ते जाल के बीच जन-धारणा बनने की रफ्तार हवाओं पर सवार है।

 

इस बहुआयामी सैलाब से पार पाने के लिए कांग्रेस की नाव को वजन की दरकार है। हालांकि पार्टी को परिवार का ही परजीवी बनाए रखने का कृत्य विशिष्ट गांधी परिवार की ही देन है। लेकिन वैचारिक बिखराव, जनता की नब्ज से दूरी और इन सभी मर्ज से बेपरवाह होकर पार्टी को असाध्य रोग की गति तक धकेलने के जवाबदेह वे सिपहसालार भी हैं, जो बरसों तक कांग्रेसी सत्ता के नाभिकीय केंद्र की परिक्रमा करते रहे। अनुच्छेद 370 के सवाल पर जिस तरह कांग्रेस का वैचारिक विभाजन जाहिर हुआ है, ऐसे हालात में सोनिया की छाया कांग्रेस को कितना बचा पाएगी और पार्टी जनता का कितना साथ हासिल कर पाएगी, यह चुनौती बड़ी है। कांग्रेस में युवा नेतृत्व के हिमायती कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे अन्य जमीनी आधार वाले कांग्रेसी इस समय चिंतित जरूर होंगे। इसकी पहली परीक्षा महाराष्ट्र, हरियाणा अौर झारखंड विधानसभा के अागामी चुनाव में होगी। (अरुण चौहान- एडिटर, स्पेशल प्रोजेक्ट)

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