सुर्खियों से आगे / चांद के बहाने ही सही... तोड़ दें मिथ्या अवधारणाएं



surkhiyon se aage column by Arvind Chotia
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surkhiyon se aage column by Arvind Chotia

Dainik Bhaskar

Sep 24, 2019, 12:23 AM IST

सुर्खियां कहती हैं कि इन दिनों चांद हमारी मुट्ठी में आते-आते रह गया। हम खुश भी हो लेते हैं कि इस बार नहीं, तो अगली बार सही- लेकिन चांद को मुट्‌ठी में कैद कर ही लेंगे हम…। हम नहीं सोचते कि चांद को मुट्ठी में कैद करने के लिए केवल हम ही बेसब्र नहीं हैं। दुनिया में ऐसे देश हैं, जो अपने उपकरण छोड़ चुके हैं चांद पर…। आखिर हमारी संवेदना का केंद्र, हमारी चिंता का विषय यह क्यों नहीं होता कि चांद तक पहुंचने के लिए, उसे छूने के लिए हम बच्चों को थालियों में चांद सजाकर दे रहे हैं या नहीं..? हमारी संवेदना के केंद्र यह क्यों नहीं हैं कि चांद आज बड़े हो रहे बच्चों का मामा है कि नहीं..? हमें देखना चाहिए कि बच्चों का मामा, चाचा, सब कुछ मोबाइल ही क्यों होकर रह गया है..? 


हम यह भी देखें कि करवा चौथ पर देश की करोड़ों छतों पर प्रेम से पगे जो चांद उगते हैं, उन पर प्रगतिशीलता के नाम पर फड़फड़ा रहे कुछ लोग ग्रहण का संकट क्यों खड़ा कर देते हैं..! एक कविता पढ़ी थी कभी ‘करवा चौथ’, जिसमें कवि कहता है – ‘सारे दिन भूखी-प्यासी रहकर / इस बार भी महकती आंखों से / चांद देखा था उसने मुझमें... / और मैं भी हमेशा की तरह / अपनी भूख और प्यास से घिरकर / पड़ोस की छतों पर दमकते चांद देखता रहा! हमारी संवेदना का केंद्र वे हजारों रसिक कवि-शायर क्यों नहीं हैं, जो सदियों से अपने महबूब में चांद तलाशते-तलाशते प्रेम को भावनाओं का अधिष्ठान दे गए। असल में सुर्खियां हमारे जीवन का हिस्सा हैं। कौन नासमझ इससे इनकार करेगा कि हमारा देश दुनिया के नक्शे पर एक भरे-पूरे चंद्रमा के समान देदीप्यमान हो। लेकिन संवेदना की गहराई से जुड़ा एक और प्रश्न यहां उठना चाहिए कि हमारे शरीर रूपी नक्शों में जो चांद समाहित हैं, बताइए कि वे खंडित हैं कि नहीं..? एक ही घर में, एक ही कमरे में, एक ही बिछौने पर बैठे पति-पत्नी अपने-अपने स्मार्टफोन में खोए एक-दूसरे से अनजाने बनकर रहने लगे हैं। हेलमेट न लगाने और बेल्ट न बांधने के लिए चौराहों पर ट्रैफिक व्यवस्था के कर्मचारियों से उलझते बच्चे क्यों नहीं जानते कि वे अपने-अपने घरों के चांद हैं..? बच्चों का क्या दोष, जब हम ही उनके करीब नहीं जा रहे..! बच्चे हमारे घरों के चांद हैं और हम उन्हें पढ़ाई की मशीनें बनाकर किशोर होने से पहले ही ‘कुछ’ बनने के लिए घरों से बाहर भेज देते हैं..!


हमें अपनी संवेदनाओं को रिश्तों की ठण्डी पड़ चुकी राख के ढ़ेर के नीचे से पुन: निकालना होगा, ताकि इंसान और इंसान के बीच के रिश्तों की मधुरता को हवा दी जा सके। घर-घर के चांद अगर यह सीख जाएं, तो क्या बुरा है कि वे एक सांस्कृतिक देश, एक उजले विश्व के नागरिक हैं - जिनके लिए पबजी का आत्मघातक खेल कोई जरूरी नहीं है। उनके लिए यह भी जरूरी नहीं है कि वे यह सोचकर पागल हों कि कोचिंग की कक्षाओं से निकलने के बाद बाजार में चीजों को बेचने के तरीके ढूंढ़ने पर उन्हें कितना बड़ा पैकेज मिलेगा..? गलती से हमने बाजार को भी एक चांद समझ लिया है, जिसे अपनी बुद्धि की तलवार से हर कोई थोड़ा-बहुत काट लेना चाहता है। 


चांद के बहाने ही सही, समाज में खड़ी हो चुकी कुछ मिथ्या अवधारणाओं को तोड़ने की जरूरत है..! क्यों न हम सुर्खियों से थोड़ा आगे निकलें..? क्यों न हम अपनी संवेदनाओं को जगाकर स्वयं को चांद जैसा मासूम बनाने की खूबसूरत पहल करें..?
 

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