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कड़वी यादों के दिन लौटने का अहसास

एक वर्ष पहलेलेखक: शेखर गुप्ता
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प्रतीकात्मक फोटो। - Dainik Bhaskar
प्रतीकात्मक फोटो।

लगातार बिगड़ते आर्थिक सूचकांकों के बीच स्पष्ट दिखता है कि आज बेरोजगारी 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। यह स्थिति 1974 जैसी है, जब इंदिरा गांधी लोकप्रिय तो थीं, लेकिन उनका असर धीरे-धीरे कम हो रहा था। इसके बावजूद मतदाताओं को लगता था कि विकल्प ही नहीं है। सभी आर्थिक सूचकांक गिरे हुए थे, मुद्रास्फीति भी 35 फीसदी पर थी पर राष्ट्रवाद चरम पर था। यह सब जाना-पहचाना लग रहा है? महंगाई को छोड़ दें तो आज बाकी सब कुछ 1974 जैसा ही है। समर्पित कार्यकर्ताओं वाली पार्टी का जबरदस्त लोकप्रियता वाला नेता, बिखरा विपक्ष, चरम राष्ट्रवाद और ढहती अर्थव्यवस्था व बढ़ती बेरोजगारी। 1971 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस के दो फाड़ और विपक्षी दलों के एकजुट होने के बाद भी चुनाव जीता। साल बीतते-बीतते वह पाकिस्तान को हटाकर और दो टुकड़ों में बांटकर ‘मां दुर्गा’ जैसी प्रसिद्धि पा चुकी थीं। लेकिन समाजवाद और राष्ट्रवाद के दाे इंजनों वाली लोकप्रियता भारत के विद्रूप यथार्थ को ढंक रही थी। राष्ट्रीयकरण की सनक से अर्थव्यवस्था चरमरा रही थी, उद्यमी लाइसेंस व कोटा राज के तले कराह रहे थे, कराधान की बेहद ऊंची दर (97.5%) ने काली यानी समांतर अर्थव्यवस्था तैयार कर दी थी। जंग पर हुए खर्च ने हालत और बुरी कर दी थी। 1971 में ही गुलजार ने अपनी पहली फिल्म ‘मेरे अपने’ बनाई थी। फिल्म मीना कुमारी के इर्द-गिर्द थी, जो शहर में गरीब और बेसहारा वृद्धा के तौर पर आई और युवाओं के एक झुंड ने उन्हें सहारा दिया। इन युवाओं के पास डिग्रियां थीं, सपने थे, लेकिन नौकरी नहीं थी। मगर वे खुद पर हंस सकते थे और गुलजार ने उनके लिए हताशाभरे उन दिनों का गीत भी लिखा था: ‘हाल चाल ठीक ठाक है...’ इसे चलाइए, पंक्तियां सुनिए। हर पंक्ति पर आप रुकेंगे, सोचेंगे कि मैं उन दिनों की बात क्यों कर रहा हूं। गुलजार 2019 में भी इसे फिर से पेश कर सकते हैं और कह सकते हैं कि अभी लिखा है। आपको पता नहीं चलेगा। 2014 के आशावाद से हम इस हालत तक कैसे पहुंच गए, इस पर बात करने से पहले देखना चाहिए कि इंदिरा का 1974 जैसा हश्र क्यों हुआ। मार्च 1971 की अभूतपूर्व जीत और विपक्ष की दुर्गति का ऐसा नशा चढ़ा कि इंदिरा और उनके वाम विचारधारा वाले सलाहकार समाजवाद के जहर में डूबते चले गए। जब अर्थव्यवस्था नाजुक दौर में थी, तब दोहरी चोट लगी। पहला योम किपर युद्घ (अक्टूबर 1973) के कारण लगा तेल का झटका था, जिसे वह काबू नहीं कर सकीं। दूसरा, गेहूं के थोक व्यापार का राष्ट्रीयकरण था। उनके सलाहकारों ने कहा था कि अगर यह सोवियत संघ में कारगर रहा तो यहां भी होगा। लेकिन यह कारगर नहीं रहा। इसके बाद गेहूं के दाम बढ़ गए, किसान आक्रोशित हो गए और कारोबारी व निजी ग्रामीण बिचौलिये बेरोजगार हो गए। इंदिरा ने जब फैसला वापस लिया, तब तक देर हो चुकी थी। 1974 की आखिरी तिमाही तक मुद्रास्फीति दर 34.7% तक चढ़ गई। देशभर में विरोध, नवनिर्माण आंदोलन फूट पड़ा, जिसमें बेरोजगार युवक और गुस्साए छात्र शामिल थे। यह भी आजकल की ही बात लग रही है न? कोई रास्ता नहीं बचा तो इंदिरा ने ‘राष्ट्रवाद’ का अपना पुराना पत्ता फेंका। पहले पोकरण-1 परमाणु परीक्षण (मई 1974) हुआ। उसका खुमार कुछ हफ्ते ही रहा। उन्होंने आखिरी पासा मई 1975 में फेंका, जब सिक्किम का विलय किया गया। लेकिन, नाराज जनता पीछे हटने को तैयार नहीं थी। एक महीने बाद इसका अंत आपातकाल से हुआ। मैं यह नहीं कह रहा कि इस बार भी हम उसी हालत में पहुंच जाएंगे। मैं केवल इतना कह रहा हूं, यदि लोगों को लंबे समय तक बेरोजगारी और आर्थिक ठहराव झेलना पड़ता है तो राष्ट्रवाद से उनका गुस्सा शांत नहीं होता।  एक बार फिर फिल्मों का रुख करते हैं, क्योंकि फिल्मकार किसी भी विश्लेषक से पहले ही जनता की नब्ज पकड़ लेते हैं। ‘मेरे अपने’ के बाद ‘शोर’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’ गरीबी, शोषण व महंगाई (बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गई बड़ा हिट हुआ था) के इर्द-गिर्द बुनी गई तथा बेरोजगार नायकों वाली फिल्मों का दौर आ गया। यही आगे चलकर ‘एंग्री यंग मैन’ के दौर में बदल गया। आपको क्या लगता है? इतिहास ने खुद को दोहराना कब से शुरू किया? आप में से कुछ को हालिया आम चुनाव से इसकी शुरुआत लग सकती है, जिसमें मिली जीत ने मोदी सरकार को घमंडी बना दिया। अगर लोग अर्थव्यवस्था की बुरी गति के बाद भी हमें वोट देते हैं तो इसका मतलब है कि आपको सामाजिक-राष्ट्रवादी खुमार बनाए रखना है। अर्थव्यवस्था सुधारने में जुटने के बजाय अनुच्छेद 370 ले आओ, मंदिर की बात करो, नागरिकता संशोधन कानून ले आओ। आप नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के शुरुआती दिनों को याद करें, जब ‘सूट-बूट की सरकार’ के साथ ही भूमि अधिग्रहण कानून पर सरकार को मुंह की खानी पड़ी थी। इसे देखकर मोदी ज्यादा राष्ट्रवाद और सामाजिक जनवाद का रास्ता पकड़कर भ्रष्टाचार से लड़ने वाले बन गए थे। नोटबंदी के जरिये उन्होंने अपने पांव पर पहली कुल्हाड़ी मारी। सीएए-एनआरसी-एनपीआर का झमेला दूसरी गलती लग रहा है। दूसरा, इस पर दुनियाभर में सीधी आलोचना बेशक नहीं हुई हो, लेकिन निराशा तो जताई ही गई है। भारत के हित 1974 से काफी अलग हैं। तीसरा, इंदिरा के अच्छे दिनों के उलट अब भारत संघशासित है। आप मुख्यमंत्रियों को हुक्म नहीं दे सकते, न ही अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं। 1974 वाले इस अहसास से हम कहां जाएंगे? हमें पता है कि 1975 की गर्मियों तक इंदिरा हमें कहां ले गई थीं। फैसला मोदी के हाथ है। बेशक वह उस वक्त की इंदिरा से ज्यादा लोकप्रिय और ताकतवर हैं, लेकिन भारत आज 1975 से बहुत अलग है।

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