अभियान / चाइल्ड पोर्नोग्राफी के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की जरूरत

प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

दैनिक भास्कर

Feb 14, 2020, 12:56 AM IST

कैलाश सत्यार्थी, नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित बाल अधिकार कार्यकर्ता. हाल ही में देहरादून में घटी यह एक शर्मनाक घटना है। घर में अकेला पाकर एक भाई ने अपने चार दोस्तों के साथ मिलकर अपनी ही आठ साल की बहन का बलात्कार कर दिया। पांचों बच्चों की उम्र 9 से 14 साल के बीच थी। पुलिस जांच में पता चला कि घटना को अंजाम देने से पहले इन बच्चों ने मोबाइल फोन पर पोर्न फिल्म देखी थी।

स्मार्ट फोन की सुलभता और इंटरनेट की आसान पहुंच ने पोर्न फिल्मों को लोगों की जेब में पहुंचा दिया है। देहरादून की घटना इसके खतरनाक परिणामों का संकेत है। सोशल मीडिया के माध्यम से बच्चों को पोर्नोंग्राफी के जाल में फंसाया जा रहा है और ऑनलाइन चाइल्ड सेक्स ट्रैफिकिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसका सबसे खतरनाक पहलू यह है कि बच्चों की अश्लील फिल्में देखकर लोग बच्चों को शिकार बना रहे हैं।


आज दुनिया के करीब 4.5 अरब लोगों की इंटरनेट तक पहुंच है। हर तीन इंटरनेट उपभोक्ता में से एक 18 वर्ष से कम उम्र का बच्चा है। दुनियाभर में 10 लाख से अधिक बच्चे जबरिया यौन शोषण के शिकार हैं। जिस तरह से चाइल्ड सेक्स ट्रैफिकिंग के लिए तेजी से डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित हो रहे हैं, वह दुनिया को भयावह अपराध की गिरफ़्त में ले जा रहा है। ट्रैफिकर सोशल मीडिया के माध्यम से आसानी से बच्चों से संपर्क करते हैं।

वैसे वे बच्चे ट्रैफिकरों के सबसे ज्यादा शिकार होते हैं, जो अकेलेपन, चिंता, तनाव या पारिवारिक समस्याओं से घिरे होते हैं। ट्रैफिकर एक साथ कई बच्चों को ‘ई-मीट’ कराते हैं और उन्हें झूठे वादों के साथ फुसलाते हैं। बच्चों को लुभाने के लिए कुछ ट्रैफिकर उनके मोबाइल के बिल का भुगतान करते हैं या ई-कॉमर्स साइट के जरिये उन्हें उपहार भेजते हैं। इस तरह एक बार बच्चा जब इनके चंगुल में फंस जाता है तो फिर वह इस दलदल से नहीं निकल पाता।


ऑनलाइन चाइल्ड सेक्स कारोबार से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए कारगर कानूनी, राजनीतिक, सामाजिक और तकनीकी उपायों की आवश्यकता है। सभी देशों को ऑनलाइन चाइल्ड सेक्स ट्रैफिकिंग के अपराध को परिभाषित करने और इसे अपने राष्ट्रीय दंड संहिता में शामिल करना चाहिए। इस मुद्दे के प्रति वैश्विक स्तर पर जन जागरूकता बढ़ाने की भी जरूरत है। विशेष रूप से विकासशील देशों में, जहां अशिक्षा, गरीबी और स्कूलों में उम्र के हिसाब से सेक्स शिक्षा का अभाव बच्चों को इस धंधे में घसीटने के लिए जिम्मेदार होते हैं।

स्वयंसेवी संस्थाएं बच्चों, किशोरों और अभिभावकों में ऑनलाइन बाल यौन शोषण के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। भारत में हमने लोगों को बाल यौन शोषण के खिलाफ जागरूक करने के लिए देशव्यापी ‘भारत यात्रा’ का आयोजन किया था। 22 राज्यों से गुजरते हुए 12 हजार किलोमीटर की दूरी तय करने वाली इस 35 दिनी यात्रा में करीब 12 लाख लोगों ने सीधे सड़क पर उतरकर मार्च किया था। कानूनी बदलाव के रूप में इसके कई सुखद परिणाम भी रहे।

हाल में चाइल्ड पोर्नोग्राफी पर गठित राज्यसभा की समिति ने जो सुझाव दिए हैं, उस पर अमल करने से भी भारत में बच्चों के यौन शोषण को रोकने में मदद मिलेगी। बच्चों को ऑनलाइन चाइल्ड सेक्स ट्रैफिकिंग से बचानें में इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर और आईटी कंपनियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसी कंपनियों को जिम्मेदार और जवाबदेह बनाने की जरूरत है। इसी तरह से सोशल-नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म को भी 18 साल से कम उम्र के किसी भी बच्चे को निजी चैट रूम में प्रवेश करने से रोकना चाहिए। उन्हें बाल यौन शोषण वाली ऑनलाइन सामग्री को हटाने के लिए सर्च इंजन में अपने तकनीकी कौशल का इस्तेमाल करना चाहिए।

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