खुली बात / सीडीएस को प्रभावी बनाना वास्तविक चुनौती

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत।
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चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत।चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत।

  • सेनाओं के संयुक्त कमान की नई व्यवस्था लागू होने के बाद अब काम व अधिकारों पर बहस

दैनिक भास्कर

Jan 09, 2020, 12:01 AM IST

(लेफ्टि. जनरल एसए हसनैन, कश्मीर में 15वीं कोर के पूर्व कमांडर). मौजूदा दौर में युद्ध कौशल की नई जरूरतों को देखते हुए दुनिया के अनेक देशों ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) मॉडल को अपनाया है। जिसके तहत एक वरिष्ठ अधिकारी वास्तविक रूप से सभी सेनाओं का प्रमुख होता है। थल सेनाध्यक्ष रहे जनरल बिपिन रावत देश के पहले सीडीएस नियुक्त हुए हैं। आज यह माना जाने लगा है कि सिर्फ एक सेना कोई युद्ध नहीं लड़ सकती।

भारतीय सेनाएं भी लंबे समय से सभी सेनाओं के बेहतर एकीकरण की जरूरत महसूस कर रही थीं। दुर्भाग्य से कई कारणों की वजह से इसे लागू करने में देरी हुई। 2001 में कारगिल युद्ध के बाद बनी मंत्रियों की समिति की सिफारिश के 18 साल बाद यह लागू हो सका। यहां पर यह बताना जरूरी है कि तीनांे सेनाओं के लिए यह बहुत ही चुनौतीपूर्ण समय है, वे 2001 में बनी इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (आईडीएस) की तदर्थ व्यवस्था से आगे जा रहे हैं।


हाल ही में रक्षा मामलों के विभाग (डीएमए) के गठन की घोषणा भी की गई है। नवगठित सीडीएस एक चार सितारा ऑफिसर का पद है और वह रक्षा खरीद परिषद का सदस्य होने के साथ ही हाल में गठित रक्षा प्लानिंग ग्रुप का भी सदस्य होगा। डीएमए के प्रमुख के तौर पर सीडीएस के पास सचिव के स्तर की वित्तीय शक्तियां होंगी और उसका दर्जा कैबिनेट सचिव के समान होगा। तीनों सेना प्रमुखों का भी यही स्तर होता है।

उनकी शक्तियां और वेतन रक्षा सचिव से अधिक होता है, जबकि उनकी फाइल रक्षा सचिव के माध्यम से ही जाती है। सीडीएस के अधीन रक्षा मंत्रालय में एक पूरा विभाग बनने से अब रक्षा मंत्री के पास कोई भी फाइल उसके दस्तखत से ही सीधे जाएगी न कि किसी सचिव के जरिये। इन्हीं दायित्वों की वजह से सीडीएस तीनों ही सेनाध्यक्षाें से वरिष्ठ होना चाहिए, लेकिन अभी ऐसा नहीं है। उसे पांच सितारा दर्जा नहीं दिया गया है।


अभी इस बात पर चर्चा जारी है कि भारत में सीडीएस असल में काम कैसे करेगा, उसके क्या दायित्व होंगे और वरिष्ठता क्रम क्या होगा? हालांकि यह स्पष्ट दिख रहा है कि चार सितारा रैंक होने की वजह से उसको तीनांे सेनाओं पर अलग-अलग कमांड का अधिकार तो नहीं होगा पर वह समान लोगों में पहला होगा। सीडीएस सिस्टम के अमेरिकी मॉडल को आदर्श माना जाता है। इसमें सेना प्रमुखों की कोई भी ऑपरेशनल जिम्मेदारी नहीं होती है। वे भर्ती, सिद्धांत, ट्रेनिंग, साजोसामान और अपनी सेनाओं को सुसज्जित करने के प्रति जिम्मेदार होते हैं।

वहां पर चेयरमैन ऑफ ज्वाइंट स्टाफ ही सीडीए के समतुल्य होता है और वह अमेरिकी राष्ट्रपति, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद और रक्षा मंत्री का प्रमुख सैन्य सलाहकार होता है। वहां पर कमांड का चैनल राष्ट्रपति से रक्षा मंत्री के जरिये सीधे युद्धक कमांड या थियेटर तक पहुंचता है। अमेरिका का यह जटिल मॉडल दुनिया में उसकी सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से ठीक है, लेकिन हमारे वातावरण के हिसाब से हमें इसे अपनाने की जरूरत नहीं है।

अभी हमारे तीनोें सेनाध्यक्ष अपनी-अपनी सेनाओं पर नियंत्रण बनाए रखेंगे और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए काम करते रहेंगे। स्पेशल फोर्स, सायबर और अंतरिक्ष से संबंधित तीन नई एजेंसियां सीडीएस के अधीन आएंगी। इसके अलावा देश की एकमात्र संयुक्त कमांड व खास युद्धक भूमिका वाली अंडमान और निकोबार कमांड भी सीडीएस के अधीन होगी।

अपने नाभिकीय संसाधनाें की वजह से यह एक रणनीतिक फोर्स कमांड (एसएफसी) है और यह चुनौती रहेगी। अभी यह देखा जाना है कि रणनीतिक संसाधनों को देखने के वरिष्ठताक्रम में सीडीएस की क्या भूमिका होगी। यद्यपि, एसएफसी उनके कमांड में होगी और वह प्रधानमंत्री के नाभिकीय मामलों के सलाहकार होंगे। तीनों सेनाध्यक्षों के साथ ही सीडीएस भी रक्षा मामलों पर कैबिनेट की कमेटी (सीसीएस) के भी सदस्य होंगे। 


सेनाओं के संयुक्त नियमीकरण, प्रशिक्षण, सिद्धांत और खरीद का प्रमुख जिम्मा होने की वजह से सीडीएस वित्तीय संसाधनों के आवंटन में अपने विशेषाधिकार और प्राथमिकता का इस्तेमाल कर सकेगा। संभवत: यह सबसे प्रमुख चुनौती साबित होगी। सीमित खरीद बजट होने की वजह से हर सेना अधिक से अधिक पाने के लिए कोशिश करती रहती है, ऐसे में सीडीएस को किसी भी तरह की संकुचित निष्ठा से ऊपर उठना होगा। एक पांच सितारा अधिकारी इस चुनौती से बेहतर तरीके से निपट सकता था।

डीएमए का गठन रक्षा मंत्रालय में वर्दीधारी अधिकारियों के प्रवेश का पहला कदम माना जा रहा है। अंत में जब इतना बड़ा फैसला लागू हो रहा है तो कुछ गड़बड़ियों की उम्मीद तो की ही जानी चाहिए। अच्छा होगा कि एक संयुक्त स्थायी समिति का गठन किया जाए, जो नियमित रूप से अंतरराष्ट्रीय मॉडलों का अध्ययन करे और उनसे अच्छी चीजों को निकाल कर हमारे सिस्टम में शामिल करे। 

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