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सत्ता की शीर्ष जोड़ियाें व माेदी-शाह में है अंतर

6 महीने पहलेलेखक: शेखर गुप्ता
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह (फाइल फोटो)।
  • नेहरू-पटेल व अटल-आडवाणी की तुलना में दोनों की भूमिकाआें व काम का है स्पष्ट बंटवारा
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अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष का कार्यभार छोड़ने के बाद अब हम नरेंद्र मोदी-अमित शाह की भाजपा सरकार के बारे में क्या कहेंगे? उन्होंने कुछ हफ्ते पहले ही यह पद जे.पी. नड्‌डा को सौंप दिया था। हालांकि, दिल्ली चुनाव उनके एजेंडे में बाकी था। अब आगे की राह क्या होगी? हम आजादी से लेकर अब तक केंद्र में सता के समीकरणों को कई तरह से वर्गीकृत कर सकते हैं। इसमें एक वो हैं, जहां पर सत्ता के शीर्ष पर लगभग बराबरी के दो नेता रहे, दूसरे वे जहां पर सिर्फ एक ही नेता रहा या फिर अल्प समय वाली सरकारें, जिनमें कोई नेता ही नहीं था। चरण सिंह से इंद्र कुमार गुजराल और वीपी सिंह से चंद्रशेखर और देवेगौड़ा के शासन को सबसे रोचक माना जाता है, क्योंकि उस दौर में लड़ाइयां हुईं, जानकारियां लीक हुईं और बहुत जल्द इसका अंत हो गया। इंदिरा गांधी या राजीव गांधी जैसी एक नेताओं वाली सरकारों में प्राय: ये किस्से सुनने को मिलते रहे कि कौन अंदर या बाहर हो रहा है, पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व वाली ऐसी पहली सरकार के किस्से 75 वर्ष बाद आज भी सुर्खियों में रहते हैं। यह कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच सत्ता की साझीदारी आपसी विश्वास पर आधारित थी। परंतु अंतर यह है कि उस सरकार में प्रधानमंत्री समकक्षों में प्रथम नहीं थे। यूपीए की दूसरी सरकार में तो मनमोहन की हैसियत राहुल गांधी के बाद तीसरे व्यक्ति की रह गई थी। इसके बाद हमारे पास अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा/राजग की दो सरकारें रह जाती हैं। दोनों सरकारें दो ताकतवर लोगों ने मिलकर चलाईं। पहली सरकार वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने मिलकर चलाई और दूसरी नरेंद्र मोदी और अमित शाह मिलकर चला रहे हैं, परंतु यहां अंतर है। वाजपेयी और आडवाणी बहुत करीबी व्यक्तिगत मित्र, पुराने सहयोगी और हमउम्र थे। उन्हें हमेशा समकक्ष माना गया। एक अधिक लोकप्रिय, स्वीकार्य और नरम था, जबकि दूसरा कठोर, राजनीतिक और वैचारिक। नेहरू व पटेल भी समकक्ष थे, पर उनके कई मतभेद सार्वजनिक थे। वाजपेयी और आडवाणी के रिश्ते अलग थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि नई भाजपा का निर्माण आडवाणी ने किया, उन्होंने नए हिंदुत्व की जगह बनाई और उसे स्थापित किया। उन्होंने पार्टी पर नियंत्रण कायम किया। वाजपेयी की छवि एक सार्वजनिक वक्ता और रूमानी व्यक्ति की थी। अपनी राजनीति के दौरान ज्यादातर उन्होंने आडवाणी का अनुसरण किया, भले ही कई बार वह उनके तरीकों से आहत भी होते और किनारा भी करते थे जैसा कि उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस के वक्त किया। परंतु वह कभी आडवाणी की अवज्ञा नहीं करते थे। जब पार्टी को सत्ता मिलने की बारी आई तो आडवाणी ने व्यवहार कुशलता दिखाई। उन्हें पता था कि उनके नेतृत्व में गैर कांग्रेसियों का गठजोड़ मुश्किल है। वाजपेयी एक स्वीकार्य चेहरा थे, वे प्रधानमंत्री बने, लेकिन पार्टी और सरकार में असली ताकत आडवाणी के पास रही। इसका पहला प्रमाण तब दिखा जब वाजपेयी को अपने विश्वसनीय मित्र और सहयोगी जसवंत सिंह को कैबिनेट में शामिल नहीं करने दिया गया। सामरिक विषयों पर भी अंतिम फैसला आडवाणी का ही होता था। यह दस्तावेजों में है कि जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ आगरा शिखर बैठक का विचार आडवाणी का ही था और उसे रद्द करने व संयुक्त घोषणा-पत्र पर चर्चा का भी। उन दिनों भी चाटुकार और कानाफूसी करने वाले यही कहते कि दोनों नेता राम-लक्ष्मण की तरह साथ रहते हैं। ऐसा तब तक चला, जब तक कि आडवाणी का धैर्य चुक नहीं गया। मैंने 2009 में लिखा था कि उनके आसपास के लोगों ने उन्हें भड़काया और उसके बाद कुछ नाटकीय घटनाएं हुईं। वाजपेयी के कार्यकाल के आखिरी साल में ऐसी अफवाहें फैलाई गईं कि वह थक गए हैं और रिटायर हो सकते हैं। इसने वाजपेयी को चुप्पी तोड़ने पर विवश किया और उन्होंने अपने एक भाषण में व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि ‘वह न तो थके हैं और न ही रिटायर हो रहे हैं।’ मामला तब और जटिल हो गया जब 2003 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जीत से उत्साहित आडवाणी ने वाजपेयी पर दबाव बनाया कि आम चुनाव जल्दी करा लिए जाएं। प्रचार के दौरान वाजपेयी के थके और बुजुर्ग होने की खबरें दोबारा आने लगीं। कहा जाने लगा कि अगला कार्यकाल वह आडवाणी को सौंपेंगे। वाजपेयी ने अपनी नाराजगी छिपाई नहीं। राजग के चुनाव हारने के बाद उन्होंने लोगों से यह नहीं छिपाया कि किसके लालच और पाप के कारण यह हश्र हुआ।  नेहरू-पटेल अौर वाजपेयी-आडवाणी से मोदी-शाह की व्यवस्था कई मायनों में अलग है। तीन अहम बातों का जिक्र करें तो पहली बात वे दो दशक से साथी हैं। एक जननेता हैं और दूसरा शानदार पार्टी संचालक। भूमिकाएं अलग हैं और उनका बंटवारा स्पष्ट है। एक वोट लाता है और दूसरा पार्टी और चुनावी व्यवस्था से उन्हें संग्रहीत करता है। यहां तक कि यह रिश्ता नंबर एक और नंबर दो का है। हालांकि, शाह ने इस सप्ताह एक कार्यक्रम में कहा कि उन्हें तुलनाएं पसंद नहीं, लेकिन आप चाहें तो चंद्रगुप्त मौर्य और कौटिल्य से भी तुलना कर सकते हैं। दूसरा, सार्वजनिक जीवन को लेकर दोनों का दृष्टिकोण अलग है। एक मुखर सार्वजनिक व्यक्तित्व है, जिसे वैश्विक स्तर पर प्रशंसा मिलती है तो दूसरा परदे के पीछे से सत्ता संचालित करता है। एक भीड़ जुटाता है तो दूसरा पार्टी के वफादारों को प्रोत्साहित करता है। तीसरी बात, इस मामले में नंबर दो की उम्र नंबर एक से 14 साल कम है। यानी उसके लिए नंबर एक के बाद भी राजनीतिक भविष्य है। दिल्ली चुनाव के साथ शाह की पार्टी प्रमुख की पारी समाप्त हो गई। शायद वह इसे अलग तरह से समाप्त करते, लेकिन हरियाणा से झारखंड और दिल्ली तक तथा कुछ हद तक महाराष्ट्र में मतदाताओं ने उनके सामने यह कड़वा सच रख दिया कि मोदी के लिए मतदान का मतलब भाजपा के लिए मतदान नहीं है। शाह अब इस हकीकत के साथ ही अपने राजनीतिक कॅरियर के दिलचस्प और अपरिचित दौर में प्रवेश कर रहे हैं। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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