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दर्द की चर्चाएं बहुत हुईं, अब इंसाफ की बात होनी चाहिए

9 महीने पहलेलेखक: अरविंद चोटिया
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एसिड सर्वाइवर रेशमा कुरैशी न्यूयॉर्क फैशन वीक में रैंप वॉक करतीं।

छपाक!!! खूब सुन रहे होंगे इसके बारे में आप इन दिनों..! ‘छपाक’ सुनने और देखने से ज्यादा सहना दर्दनाक था रेशमा के लिए। रेशमा कुरैशी उन 1483 चेहरों में से एक चेहरा है, जिन्हें 2014 से 2018 के बीच बर्बाद करने की कोशिश हुई। जी हां! ये एसिड सर्वाइवर्स के आंकड़े हैं। भारत उन देशों में से एक है, जहां सबसे ज्यादा एसिड अटैक होते हैं। रेशमा कोई 17 साल की रही होगी, जब उसके जीजा ने उस पर तेजाब उड़ेल दिया। शायद उसने सोचा होगा कि मैं इसे बर्बाद कर दूंगा…पर उसे इसका अंदाज़ा नहीं होगा कि वो रेशम सी मुलायम रेशमा को फौलाद का बना देगा। तेजाब ने उसके चेहरे को जरूर जलाया, पर उसके सपनों पर कोई आंच नहीं आई। खुशनुमा भविष्य के सपने देखती दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची के लिए इससे बड़ा सदमा और क्या हो सकता था। पर तेजाबी साजिशें नाकाम हुईं। रेशमा ने खुद को छिपाने से इनकार कर दिया। फिर उठ खड़ी हुई। फैशन की दुनिया में पहुंच गई।  क्या कोई भी सोच सकता था कि जिस चेहरे ने तेजाब झेला हो, वो कभी न्यूयॉर्क फैशन वीक में सितारों के साथ रैंप पर चमकता दिखेगा। पर रेशमा होना आसान नहीं है। लक्ष्मी अग्रवाल होना भी आसान नहीं है। इनका संघर्ष अथाह है। जीवनभर चलने वाला। पर ये दुनिया की उन सभी सताई हुई लड़कियों के लिए प्रेरणा का पुंज हैं, जो ऐसे हादसों के बाद जीते जी खुद को मार लेती हैं।   रेशमा की तस्वीरें देखेंगे तो उसकी एक आंख पर बालों की लट गिरी दिखाई देगी। यह उसकी अदा नहीं है। दरअसल, इस लट से उसने तेजाब से खत्म हो चुकी अपनी आंख को छिपाया है। पर रेशमा ने कभी खुद को दुनिया से नहीं छिपाया। रेशमा का यह संघर्ष उस पर लिखी एक किताब- ‘बीइंग रेशमा’ में तफसील से बताया गया है। वहीं लक्ष्मी की कहानी- छपाक में दिखाई गई है। चर्चा इन दोनों की हो रही है। चर्चा दीपिका पादूकोण की भी हो रही है। जेएनयू के साथ दिखाए गए उनके समर्थन और सोशल मीडिया पर चले उनके विरोध की भी हो रही है। लेकिन तेजाब फेंकने से जुड़े उन आंकड़ों और अपराधियों का क्या…जो लगातार बढ़ते जा रहे हैं। जेएनयू का समर्थन, छपाक और दीपिका का बाॅयकॉट…यह सब अस्थाई है। तात्कालिक ट्रेंड्स हैं। जो हफ्ते- दस दिन में बदल जाएंगे। स्थाई तो वह दर्द है जो रेशमा और लक्ष्मी के आंखों में बरसों से पसरा हुआ है। चर्चा उसी दर्द के इलाज की होनी चाहिए। तेजाबी दरिंदों को उनके अंज़ाम तक पहुंचाने की होनी चाहिए। जिस तरह दुष्कर्म के खिलाफ सख्त सजाएं हो रही हैं। उसी तरह तेजाब फेंकने के गुनहगारों का ट्रायल होना चाहिए।  न्याय की रफ्तार कितनी धीमी है, इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगा लीजिए- 2015 में ऐसे 734 केस में ट्रायल हुआ, पर 33 मामलों में ही सुनवाई पूरी हो पाई। यकीन मानिए…अगर न्याय तंत्र ने अपना काम बखूबी कर लिया तो ऐसी दर्दनाक कहानियों पर भी विराम लग जाएगा।

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