जीने की राह / एक-दूसरे को दुखी करना भी हिंसा है



To make one another sad is also violence
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To make one another sad is also violence

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पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Apr 16, 2019, 11:54 PM IST

हम दुनियाभर की चीजें ढूंढते हैं, टटोलते हैं और हमारे अनुकूल नहीं मिलने पर कभी-कभी निराश भी हो जाते हैं। भगवान महावीर ने कहीं कहा था कभी शांति से बैठकर अपनी एक ऐसी योग्यता को भी टटोलिए जिसका कोई विकल्प दूसरों को न मिले।

 

अपने भीतर की कुछ प्रतिभा ऐसी उजागर करें कि लोग कहें ये गजब के इन्सान हैं। अपने भीतर की ऐसी योग्यता को कैसे टटोलने के लिए उन्होंने संस्कार पर जोर दिया है। सामान्य शब्दों में संस्कार का मतलब है किसी भी वस्तु, परिस्थिति या व्यक्ति को परिष्कार करने की शैली। महावीर स्वामीजी ने संस्कारों की बड़ी अच्छी परिभाषा देते हुए कहा है जो बातें जीवन में ऊपर उठा दें, आपकी प्रतिभा को परिष्कृत कर अत्यधिक योग्य बना दें, वो ही संस्कार है।

 

गहराई में उतरकर महावीरजी को समझने का प्रयास किया जाए तो पाएंगे, उन्होंने सर्वाधिक जोर अहिंसा पर दिया है और इसीलिए ‘अहिंसा परमोधर्म:’ जैन धर्म का सूत्र वाक्य बन गया। सामान्य रूप से हिंसा का मतलब लोग ‘जीव हत्या नहीं’ से लेते हैं, परंतु महावीरजी का दर्शन कहता है प्राणिमात्र को किसी भी प्रकार का कष्ट या यातना देना, यहां तक कि परिवार में आपस में प्रेमपूर्ण नहीं रहना, एक-दूसरे को दुखी करना भी हिंसा ही है। महावीरजी से प्रेरणा लेकर एक संकल्प जरूर लेना चाहिए कि ‘अहिंसा परमो धर्म:’ के मार्ग पर चलते हुए परिवार, समाज, राष्ट्र और संपूर्ण मानवता के प्रति अहिंसा और परहित में निजहित भाव का पालन करेंगे...।

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