मैनेजमेंट फंडा / सच्चे प्रेम में हमेशा संबंधित व्यक्ति के लिए फिक्र होती है



True love is always concerned about the person concerned
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True love is always concerned about the person concerned

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एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Feb 14, 2019, 03:44 AM IST

आज की गैजेट-दीवानी पीढ़ी के एक प्रतिनिधि से मैंने पूछा कि तुम्हारे लिए वेलेंटाइन डे क्या मायने रखता है? अपने मोबाइल में व्यस्त उस युवा ने बिना सिर उठाए कहा, ‘बहुत मायने रखता है।’ मैंने कहा, ‘तुमने मेरी ओर देखने के लिए सिर तक नहीं उठाया और तुम कह रहे हो कि प्रेम (Love) तुम्हारे लिए बहुत मायने रखता है?’

 

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उसने बिना हिले, बायीं आंख मेरी ओर घुमाई और मोबाइल देखते-देखते मेरी उम्र की तफ्तीश करने लगा और फिर बोला ‘क्या आप जानते हैं इंटरनेट पर सबसे पहले लिखा गया शब्द ‘love’ था, यह बहुत मायने रखने वाला शब्द है और हमारी टेक जनरेशन की बातें आप जैसे टेक्नोलॉजी-अनफ्रेंडली लोग नहीं समझ पाएंगे!’ अगर आप भी इस गैजेट-दीवानी पीढ़ी से हैं तो यकीनन आपको लगेगा कि उस युवा ने बिल्कुल सही कहा था। ऐसा है तो आपको जानकारी ठीक कर लेनी चाहिए। 29 अक्टूबर 1969 को रात के 10:30 बजे इंटरनेट पर पहला मैसेज चार्ली क्लाइन नामक छात्र ने भेजा था और उस संदेश में सिर्फ दो अक्षर ‘lo’ थे।

 

वैलेंटाइन डे पर उस युवा जैसे ‘रोमांटिक’ लोग बहस कर सकते हैं कि वह शब्द ‘love’ था, पर कुछ पुख्ता रिकॉर्ड बताते हैं कि चार्ली वास्तव में ‘love’ नहीं  ‘login’ टाइप कर रहा था, लेकिन उसके दो अक्षर लिखने के बाद सिस्टम क्रैश हो गया था! अगर आप आईफोन के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दिमाग ‘सिरी’ से पूछें कि ‘क्या तुम मुझे प्यार करती हो’, तो उसका रटा-रटाया जवाब होगा, ‘मेरी ऑन्टोलॉजी में प्यार जैसा कुछ नहीं है।’ ऑन्टोलॉजी यानी किसी विषय विशेष में अवधारणाओं व श्रेणियों का एेसा सेट जो उनकी विशेषताएं और अापसी संबंध बताए। इसलिए नई पीढ़ी के साथ बहस में मेरा तर्क है कि सिर्फ लाइक, रिस्पॉन्स, और वॉट्सऐप मैसेज की संख्याओं से अपना मूल्य आंकने की बजाय, यह समझें कि प्रेम आपकी पांचों इंद्रियों से ज्यादा जुड़ा होता है और ये किसी के साथ भी हो सकता है। हमेशा विपरीत लिंग वाले व्यक्ति से हो, ऐसा भी जरूरी नहीं।


जरा, पुणे इलाके के ज्वाइंट चैरिटी कमिश्नर दिलीप देशमुख का ही उदाहरण लें। शिक्षा के अधिकार के तहत गरीब बच्चों को उनके घर के आसपास के स्कूलों में प्रवेश दिलाने के उनकी हर संभव कोशिश के बावजूद, हर बच्चे को लाभ नहीं मिलता था। इसके पीछे स्कूलों की कमी समेत कई कारण थे। ऐसे में कई बच्चे स्कूल नहीं जाते और समाज के गरीब तबके तक शिक्षा की रोशनी पहुंचाने का प्राथमिक उद्‌देश्य अधूरा ही रहता था। इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए देशमुख ने ‘साइकल बैंक’ नामक प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसमें वे पुणे के आसपास के लम्बे रास्तों से स्कूल जाने वाले वंचित छात्रों को साइकल उपलब्ध कराते हैं।

 

पुणे से करीब 52 किमी दूरी पर भोर नामक गांव में आबासाहेब अत्रे स्कूल और आप्ति माध्यमिक विद्यालय है। दोनों स्कूलों के अधिकांश बच्चों को हर रोज करीब 10 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। देशमुख ने सोचा कि क्यों न इन बच्चों को मुफ्त साइकल उपलब्ध कराई जाए ताकि वे पहले अच्छी तरह पढ़ें और फिर साइकल लौटा दें। उन्होंने बच्चों के पालकों से यह भरोसा लिया कि वे उनकी पढ़ाई पूरी होने के बाद साइकल स्कूल को लौटा देंगे। देशमुख की फिक्रमंद नजर ऐसे गांवों पर है जो सूखे से जूझ रहे हैं।

 

उनके इस आइडिया ने कई अन्य परोपकारी लोगों को प्रेरित किया है। हाल ही में उनके ऑफिस में 500 साइकिलें पहुंची हैं। एक अच्छे उद्देश्य को लेकर चल रहे देशमुख जैसे लोग युवा पीढ़ी की तरह अपने स्मार्टफोन पर आने वाली सकारात्मक प्रतिक्रियाओं पर भी ध्यान देते हैं लेकिन, वे सिर्फ खुद को अच्छा महसूस कराने के लिए उन्हीं पर निर्भर नहीं रहते हैं। संवेदनशील लोग इस तरह के वर्चुअल फीडबैक को सिर्फ सुधार के लिए इस्तेमाल करते हैं।


फंडा यह है कि  सच्चा प्रेम अंतत: संबंधित व्यक्ति की फिक्र (care) व परवाह करने के साथ पनपता है और गहरा होता है। 

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