खुली बात / शहरी प्राथमिक हेल्थ सेवा को संजीवनी की जरूरत

फाइल। फाइल।
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शुगर व बीपी जैसी बीमारियों की वजह से लोगों की जरूरत बन रहे ‘मोहल्ला क्लीनिक’ 

Dainik Bhaskar

Dec 04, 2019, 01:16 AM IST

डॉ चंद्रकांत लहारिया (नेशनल प्रोफेशनल ऑफिसर, डब्लूएचओ). पिछले दिनों मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य के शहरी क्षेत्रों में ‘संजीवनी क्लीनिक’ शुरू करने की घोषणा की। राज्य सरकार ने कहा है कि ये क्लीनिक दिल्ली के बहुचर्चित मोहल्ला क्लीनिक से प्रेरित हैं।

मध्य प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ने घोषणा की है कि शुरुआत में संभागीय मुख्यालयों इंदौर, भोपाल, जबलपुर एवं ग्वालियर में कुल 88 ‘संजीवनी क्लीनिक’ खोले जाएंगे। 50 से 60 हज़ार की आबादी पर एक क्लीनिक होगा। यह घोषणा एक अच्छी शुरुआत मानी जा सकती है।

जुलाई 2015 में दिल्ली में ‘मोहल्ला क्लीनिक’ की शुरुआत के बाद इसकी तर्ज पर कई राज्यों ने क्लीनिक शुरू करने कि घोषणा की। इनमें से मुख्य हैं: तेलंगाना में ‘बस्ती दवाखाना’, झारखंड में ‘अटल क्लीनिक’, राजस्थान में ‘जनता क्लीनिक’, मुंबई में ‘आपला क्लीनिक’ तथा केरल में ‘फैमिली एंड हेल्थ सेंटर’।

इसके अलावा जम्मू और कश्मीर, पंजाब, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ एवं कुछ अन्य राज्यों ने भी शहरी क्षेत्रों में आम जनता को स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान के लिए इस तरह के क्लीनिक शुरू करने की घोषणा की। नवंबर के अंतिम सप्ताह तक दिल्ली में करीब 311 मोहल्ला क्लीनिक और हैदराबाद में करीब 115 बस्ती दवाखाना हैं। 


भारत की लगभग एक तिहाई जनसंख्या यानी करीब 40 करोड़ से अधिक लोग शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। अधिकतर सरकारी अस्पताल शहरों में होते हैं, लेकिन लोगों की सामान्य स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों के लिए अस्पताल की बजाय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की जरूरत होती है।

देश के शहरी इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों की कमी है। ऊपर से शुगर एवं ब्लड प्रेशर की बीमारियों ने इस जरूरत को और बढ़ा दिया है। भारत के 71वें राष्ट्रीय सैंपल सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि जिन लोगों को स्वास्थ्य संबंधी सलाह की जरूरत थी, उनमें से केवल 3.5 प्रतिशत लोग ही किसी सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र गए थे।

इस जरूरत को पहचाना गया और 2013 में राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन की शुरुआत की गई और हर 50 हजार की आबादी के लिए एक शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का प्रावधान किया गया। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का प्रावधान हर 20 से 38 हज़ार की आबादी पर है। तब से अब तक कई नए शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोले तो गए, लेकिन ज्यादातर राज्यों में लोग इन केंद्रो पर नहीं आते हैं। कारण अलग-अलग होते हैं, जैसे कि डॉक्टर और दवाइयों की अनुपलब्धता, सेवाएं मुख्यतः जच्चा-बच्चा के लिए होना या इनकी दूरी।


दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिक में एक डॉक्टर, एक नर्स कम फॉर्मासिस्ट और एक सहायक होता है और एक क्लीनिक हर 10 हज़ार की आबादी पर खोले जाने का प्रस्ताव है। यानी मोहल्ला क्लीनिक में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता वर्तमान प्रावधान से 5 गुना अधिक है।

मोहल्ला क्लीनिक वास्तव में ऐसी जगह पर खोले गए हैं, जहां पहले कोई अन्य स्वास्थ्य केंद्र नहीं है, जैसे कि झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनी, ऐसी बस्तियां, जहां बाहर से आए लोग रहते हैं। क्लीनिक की जगह का चुनाव भी लोगों के साथ मिलकर किया गया है। यही सब इनकी लोकप्रियता एवं सफलता के कारण हैं। 


अब तक मोहल्ला क्लीनिक का सबसे सफल अनुकरण तेलंगाना में बस्ती दवाखाना के रूप में किया है, बल्कि कुछ मामलों में हैदराबाद के क्लीनिक दिल्ली से कुछ कदम आगे हैं। हैदराबाद में बस्ती दवाखाना वहां के नगर निगम की पहल पर शुरू किए गए और राज्य सरकार इसमें पूरी भागीदारी निभा रही है।

इस नजर से हैदराबाद के बस्ती दवाखाने अपने आप में एक बड़ी पहल एवं शुरुआत हैं। मोहल्ला क्लीनिक मुख्य रूप से बीमारियों से जुड़ी हुई चिकित्सा सेवा प्रदान करते हैं, जबकि बस्ती दवाखाना जनस्वास्थ्य (बीमारियों की रोकथाम एवं स्वास्थ्य संवर्धन) सेवाएं भी प्रदान करते हैं। एमपी सरकार की संजीवनी क्लीनिक की घोषणा एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन इसे हर 10 से 20 हजार की आबादी में स्थापित किया जाना चाहिए।

मप्र के पास एक और सुनहरा मौका है, राज्य में स्वास्थ्य के अधिकार पर भी चर्चा चल रही है, इसलिए ‘संजीवनी क्लीनिक’, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने का एक पूरक कदम होगा। यह उत्तर भारत के अन्य राज्यों के लिए भी एक प्रेरणा साबित हो सकता है, लेकिन यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले महीनों में राज्य में कितने ‘संजीवनी क्लिनिक’ बनाए जाते हैं।

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