सशक्तिकरण / बहादुरी का जेंडर से क्या लेना-देना?

प्रतीकात्मक फोटो। प्रतीकात्मक फोटो।
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प्रतीकात्मक फोटो।प्रतीकात्मक फोटो।

 महिला अफसरों को सेना में कमांडेंट न बनाना बस पुरुष अफसरों की बिरादरी का पूर्वाग्रह और डर है

दैनिक भास्कर

Feb 08, 2020, 05:04 AM IST

(मीनाक्षी लेखी, भाजपा सांसद, वकील सुप्रीम कोर्ट में यह केस लड़ रहीं हैं). सॉलिसिटर जनरल द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिया गया यह तर्क कि भारतीय सेना की महिला ऑफिसर को कमांडेंट इसलिए नहीं बना सकते क्योंकि पुरुष सैनिक उनके आदेशों का पालन नहीं करेंगे, दरअसल यह तर्कहीन है। 1992 में पहली बार महिलाओं को आर्म्ड फोर्सेस में शॉर्ट सर्विस कमिशन के जरिए शामिल किया गया था। यह सर्विस 10 साल की होती है जिसे बढ़ाकर 14 साल तक किया जा सकता है।

वे ओटीए चेन्नई में ट्रेनिंग लेकर अपने पुरुष समकक्षों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर सेना में काम करती हैं। उनकी पोस्टिंग कठिन और खतरनाक इलाकों में होती है फिर चाहे वह कश्मीर की सीमाएं हों या बतौर यूएन पीसकीपर लीबिया और कांगो। पाकिस्तान से सटी सीमा और नॉर्थ ईस्ट के इलाकों में जहां बमुश्किल 4-5 अधिकारी और कई बार अकेली महिला अधिकारी और उसके पुरुष सिपाही भी रहते हैं।

सवाल यह है कि जब 800 से ज्यादा लड़कियों की एनसीसी बटालियन का प्रमुख पुरुष कमांडेंट हो सकता है तो क्यों महिला उस बटालियन की कमांडेंट नहीं हो सकती? यह तर्क कि महिलाओं में जो शारीरिक अंतर है वह उन्हें सेना के लिए कम सक्षम बनाता है, फिजूल है। बात चाहे फाइटर की जूनियर लेवल पर हो या सीनियर पोजीशन पर।

कहीं भी ज्यादा या कम मासपेशियों की शक्ति की जरूरत नहीं होती। सीनियर स्तर पर जॉब प्रोफाइल सुपरविजन, स्ट्रैटजी बनाने और फैसले लेना होता है। रक्षा मंत्रालय द्वारा 25 फरवरी 2019 को जारी एक ऑर्डर सेना में महिलाओं को आदेश की तारीख से स्थायी कमिशन देने की बात कहता है। लेकिन यह उन महिलाओं की मांगों को रूखा छोड़ देता है जो 24-25 साल देश की सेवा कर चुकी हैं और जिनमें से ज्यादातर 40 की उम्र पार कर चुकी हैं।

जरूरत है कि सरकार की नीतियां उनके बारे में सोचें जो वर्तमान में सेना में अधिकारी हैं और सिर्फ भविष्य की सोचकर न बनाई जाएं। अब जब समय आ गया है कि इन उच्च पदस्थ महिला अधिकारियों को उच्च पदों पर सेवा का उनका अधिकार दिया जाए, तो अपीलकर्ता को यह संदेह है कि चुनिंदा 332 महिला अधिकारी जो पूरी क्षमता की बस 4% हैं, सेना में उच्च स्तर पर खाली पद खा जाएंगी। यह कुछ नहीं बस पुरुष अफसरों की बिरादरी का पूर्वाग्रह और डर है।


सेना, महिला ऑफिसर को 14 साल की सर्विस तक निचले स्तर के पदों के लिए प्रभावी वर्कफोर्स मानती है और कमांडेंट स्तर के लिए उन्हें अक्षम और अयोग्य समझती है, ये पाखंड की पराकाष्ठा है। लोग तर्क देते हैं कि महिला ऑफिसर के इस केस को लड़कर मैं सरकार के खिलाफ लड़ रही हूं। लेकिन उन्हें समझना होगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह साफ किया है कि ब्यूरोक्रेसी और सरकार के सभी वरिष्ठ पदों के लिए महिलाओं को लिया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री के शब्द राजनीतिक इच्छाशक्ति हैं।

मैंने हमेशा माना है और आगे भी मानूंगी कि जीवन में किसी व्यक्ति का क्रम उसकी अच्छाइयों और खूबियों के अनुसार ही होना चाहिए। एक ओर हम कैप्टन तानिया शेरगिल को रिपब्लिक डे परेड की टुकड़ी की अागुवाई करने भेजते हैं और दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में यह तर्क देते हैैं कि सेना में वह कमाडेंट के पद के काबिल नहीं। यह सेना की अपने लोगों के प्रति दोहरी नीति को दर्शाता है। मेरी यह लड़ाई सरकार के खिलाफ नहीं बल्कि नौकरशाही की गलत धारणा और मानसिकता के खिलाफ है। 


25 सालों की नौकरी के दौरान हमारी महिला ऑफिसर्स ने भावनात्मक नुकसान झेला है। सामर्थ्य के बावजूद किनारे कर दिया जाना, कैडर की अस्पष्ट स्थिति के चलते जॉब सिक्योरिटी में कमी और 6 बैच जूनियर ऑफिसर के नीचे काम करना सर्विस के लिए 100 प्रतिशत देने के मनोबल को प्रभावित करता है। इन महिला ऑफिसर के पक्ष में जो तर्क दिया जा सकता है वह ये कि दुनिया में युद्ध की विधाएं बदल रही हैं। दुनिया साइबर हो रही है और युद्ध भी उससे पीछे नहीं छूटते। सिग्नल कम्युनिकेशन को लगातार बढ़ रहे विपरीत माहौल में काम करना है।

विध्वंस की नई तकनीकें और तरीके हर दिन तैयार हो रहे हैं। और उनसे निपटने के लिए शारीरिक क्षमता से ज्यादा जरूरत एनालिटिकल स्किल की है। डीआरडीओ में महिलाएं मिसाइलें और इसरो में चंद्रयान बना रही हैं फिर वह बटालियन कमांड क्यों नहीं कर सकतीं? हम सभी इन सवालों के जवाब जानते हैं। इस विचार नीतियों तक पहुंचने की जरूरत है।

पुरुष और महिलाएं सेना में एक ही बंकर में रहते हैं। एक बार महिला या पुरुष जब सेना ज्वाइन करता है तो वह सिर्फ लड़ाका होता है अपने जेंडर से इतर। सिर्फ योग्यता ही है जिसे सर्विस में उनकी पोजीशन का फैसला करना चाहिए। क्या सेना में महिलाओं को सिर्फ बतौर सजावटी टुकड़े रखा जाता है। ताकि सेना को मेन ओनली जोन न कहा जाने लगे।

और महिला पुरुष का अनुपात सिर्फ इसलिए कायम रखते हैं ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह डेटा दिखाया जा सके। बहादुरी का जेंडर से कैसा लेना देना? जब बतौर महिला, मैं दुनिया के सबसे खतरनाक इलाके श्रीनगर का चुनावी कैम्पेन संभाल सकती हूं, जबकि मैं तो सेना में नहीं हूं, फिर महिलाएं कमांडेंट का चार्ज क्यों नहीं संभाल सकतीं?

महिला सेकंड इन कमांड तो हो सकती है लेकिन कमांडेंट नहीं क्योंकि महिलाएं सेना में तभी तक परफॉर्म कर सकती हैं जब तक वह पुरुषों के अहम और अहंकार को चोट न पहुंचाएं। हालांकि जब हम सिक्के का दूसरा पहलू देखते हैं तो कुछ झूठे महिलावादी हैं जिन्होंने कॉल ऑफ ड्यूटी से इंकार करने के लिए पारिवारिक और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी का कार्ड इस्तेमाल किया है। एक केस था जब महिला ऑफिसर ने नागपुर जाकर कोर्ट मार्शल करने से मना कर दिया था क्योंकि उसे अपने नवजात की देखरेख करना थी। मैं ऐसे बहानों की निंदा करती हूं। 


यदि सुप्रीम कोर्ट और सरकार को लगता है कि महिलाएं कॉम्बैट या डिफेंस सर्विस के लिए सक्षम इसलिए नहीं हैं क्योंकि वह महिला हैं तो सर्विस में उनकी एंट्री पूरी तरह से रोक दी जानी चाहिए। पर पुनीता अरोरा, पद्मावति बंदोपाध्याय, मिताली मधुमिता, प्रिया झिंगन और तानिया शेरगिल उन सभी तर्कों को गलत साबित कर देती हैं। ऊंचे पद बतौर हक मांगे जा रहे हैं न कि दान में। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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