संदर्भ / चुनाव आयोग का पुराना रुतबा कब लौटेगा?

योगेंद्र यादव

योगेंद्र यादव

Apr 17, 2019, 10:40 PM IST



When will the old system of Election Commission return?
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When will the old system of Election Commission return?
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  • गुजरात दंगों के बाद मोदी तुरंत चुनाव चाहते थे लेकिन, तब चुनाव अायोग टस से मस भी नहीं हुअा था

मुझे याद अाता है शायद 15 साल पहले का वह दिन। मेरे दफ्तर में फोन आया की ब्रिटेन के चुनाव आयोग का एक प्रतिनिधिमंडल मुझसे मिलने आया है। मुलाकात हुई तो झेंपते हुए प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने बताया कि वहां अब तक कोई चुनाव आयोग था ही नहीं। जब उन्होंने मुझसे पूछा कि ब्रिटेन के चुनाव अायोग के प्रतिनिधि के बतौर भारत के चुनाव आयोग से वे क्या सीख सकते हैं। मैंने गर्व से हमारे चुनाव आयोग की स्वतंत्रता व स्वायत्तता के बारे में बताया। हमारे निर्वाचन अायोग का यही प्रताप था कि उन दिनों मैं देश और दुनिया में भाषण देता था कि हमने पश्चिम के लोकतंत्र की नकल नहीं की, अपना विशिष्ट लोकतंत्र बनाया है।


वो दिन था और आज का दिन है। सोचता हूं अच्छा हुआ जो प्रोफेसर का काम छोड़ दिया। नहीं तो व्याख्यान के लिए अामंत्रित करने पर दुनिया वाले आज हमारे चुनाव आयोग के बारे में पूछते और मैं झेंप के मारे मुंह छुपाता फिरता। मुझे याद है उन दिनों मुख्य चुनाव आयुक्त लिंगदोह से अपनी मुलाकात। उन दिनों गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी तत्काल चुनाव चाहते थे। लेकिन चुनाव आयोग ने तय कर रखा था कि स्थिति सामान्य होने तक चुनाव नहीं होंगे। मोदीजी ने एड़ी-चोटी का जोर लगा लिया, लेकिन चुनाव आयोग टस से मस नहीं हुआ। वह अपने फैसले पर कायम रहा। दबाव में नहीं अाया।


एक वे दिन थे और एक आज के दिन हैं। आजकल पत्रकारों में मजाक चलता है कि अगर जानना है कि चुनाव आयोग चुनाव की तारीख कब घोषित करेगा तो प्रधानमंत्री का प्रचार शेड्यूल देख लीजिए। जब उनकी घोषणाएं बंद हो जाएंगी तब जाकर चुनाव आयोग आचार संहिता लागू करेगा। मजाक यूं ही नहीं चल जाते। कोई अाधार होता है। पिछले साल तो प्रधानमंत्री के किसी उद्घाटन को एडजस्ट करने के लिए चुनाव आयोग ने अपनी पूर्व निर्धारित चुनाव घोषणा की पत्रकार वार्ता का समय बदल दिया था।


मुझे याद है वह जमाना जब 1994 में चुनाव आयोग में चुनाव अायुक्त टीएन शेषन ने आदेश जारी कर दिया था कि वोटों की गिनती का टेलीविजन प्रसारण नहीं होगा। यह उनका निहायत तुगलकी फरमान था, लेकिन चुनाव आयोग का हुक्म पत्थर पर लकीर होता था। इससे बचने के लिए दिवंगत पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह और मैं रूस में मास्को के करीब दुबना जाकर महाराष्ट्र के चुनाव के परिणाम का टेलीविजन प्रसारण करके आए थे!


एक आयोग का वो इक़बाल था और एक आज के हाल है। चुनाव के बीच में प्रधानमंत्री मिसाइल लॉन्च करके राष्ट्र के नाम संबोधन करते हैं। चुनाव आयोग आंख मूंदकर बैठा रहता है। बिना अनुमति लिए नमो टीवी चैनल शुरू हो जाता है। हर कानून और आचार संहिता के हर कायदे की धज्जियां होती देखकर भी चुनाव आयोग कई दिनों तक असमंजस में बैठा रहता है, फिर बहुत बदनामी होने के बाद जाकर उसे बंद करता है। यह स्थिति वाकई चिंताजनक है मुझे याद है वह जमाना जब चुनाव आयोग के आदेश और डांट सुनकर अफसरों की नींद उड़ जाती थी, रातों रात बड़े बड़े अफसरों का तबादला हो जाता था। बाकी सारा समय नेताओं की जी हजूरी करने वाले अफसर भी चुनावी कुंभ में गंगा स्नान कर निष्पक्ष होने या दिखने कि कोशिश करते थे। उनकी मजाल नहीं थी कि वे किसी का पक्ष लेते नज़र अाए।


एक वह जमाना था और एक आज का जमाना है चुनाव के बीचो-बीच इनकम टैक्स डिपार्टमेंट धड़ल्ले से विपक्ष के नेताओं के घर पुराने मामलों पर छापे मारता है। चुनाव आयोग हल्की-सी शिकायत दर्ज करता है, इनकम टैक्स वाले उसे धता बता देते हैं। विपक्षी सरकारों के दागदार पुलिस अफसरों का तबादला बंगाल और आंध्र प्रदेश में तो तुरंत हो जाता है लेकिन, ठीक वैसे ही तमिलनाडु के पुलिस प्रमुख का तबादला नहीं होता। गुजरात में सीट खाली होते ही उपचुनाव घोषित कर दिए जाते हैं लेकिन, तमिलनाडु में दर्जनों सीट खाली होने के बावजूद चुनाव आयोग चुपचाप बैठा रहता है। एेसे फैसले चुनाव अायोग की कार्यप्रणाली के बारे में बहुत कुछ कहते हैं।


मुझे याद है वह जमाना जब चुनाव के दौरान कुछ सप्ताह के लिए कुर्सी से बड़ा संविधान होता था। बड़े से बड़े नेता चुनाव आयोग से माफी मांगते थे। अगर कोर्ट में आयोग के आदेश को चुनौती मिलती थी तो आयोग कहता था कि उसे संवैधानिक दायित्व के चलते सभी शक्तियां है, कोर्ट कभी कभार ही उसकी ताकत पर सीमा बांधता था। फैसले सही हो तो उन्हें मर्यादा में बांधने की जरूरत नहीं होती। 


एक वह चुनाव आयोग था और एक आज का चुनाव आयोग है। आज उलटा ही रिवाज हो गया है। आचार संहिता के दोषी नहीं बल्कि उसके शिकार कोर्ट जाते हैं। कोर्ट में चुनाव आयोग कहता है कि हमारे पास कोई ताकत नहीं है। कोर्ट को कहना पड़ता है कि अपनी संवैधानिक ताकत का इस्तेमाल क्यों नहीं करते। न्यायालय अायोग को उसकी शक्तियों की याद दिलाता है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भारतीय सेना को मोदी सेना बताते है, उसे अपने जवाब में सही बताते हैं, लेकिन चुनाव आयोग ‘अच्छे बच्चे ऐसी बात नहीं करते’ लिखकर इतिश्री कर लेता है। राजस्थान के राज्यपाल मोदी का प्रचार करते हैं, चुनाव आयोग एक और चिठ्ठी लिख देता है। कोई नहीं जानता उसका क्या हुआ। चिट्ठी का कोई असर हुआ अथवा राज्यपाल महोदय को कोई पश्चाताप हुअा। कोर्ट की फटकार पड़ने के बाद चुनाव आयोग को योगी आदित्यनाथ, मायावती और आजम खान के खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत होती है।


देश के प्रधानमंत्री खुल्लमखुल्ला विपक्षियों को हिन्दू विरोधी बताते हैं, पुलवामा के शहीदों के नाम वोट मांगते हैं। अमित शाह कहते हैं कि हिन्दू, सिख और बौद्ध लोगों के सिवा सभी अवैध आप्रवासियों को देश से निकाल दिया जाएगा। चुनाव आयोग जानता है कि यह आचार संहिता, कानून और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लघंन है। लेकिन आख बंद कर सोने का दिखावा करता रहता है।  सामने से सांड आ रहा है, चुनाव आयोग मक्खी मारने में व्यस्त है। एक वो चुनाव थे, एक यह चुनाव हरण है!
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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