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जिद्दी शिवसेना की उधेड़बुन आखिर कब खत्म होगी?

7 महीने पहलेलेखक: संजय आवटे
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शिवसेना अपनी जिद पर कायम रही! उद्धव ठाकरे ने कर दिखाया और महाराष्ट्र में सरकार भी बनाई। लेकिन, अब भी उनकी उधेड़बुन खत्म होती नहीं दिख रही है। पिछले पांच वर्ष शिवसेना उधेड़बुन में ही दिखाई दी। 2014 में एक समय नेता विपक्ष का पद लेने वाली शिवेसना बाद में सरकार में शामिल हो गई थी, सरकार में है या विरोध में, यह सेना कभी समझ ही नहीं सकी। उद्धव ठाकरे की जेब से इस्तीफे कभी बाहर आए ही नहीं। 2019 के चुनावों के बाद शिवसेना के ‘अच्छे दिन’ आ गए! भाजपा को पछाड़कर सेना ने सरकार बनाई। उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने। सरकार जिस तरह बनी, सभी चकित रह गए। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ सरकार बनाई। जो भी जरूरी था, वह सेना ने किया। पार्टी में नई ऊर्जा का संचार हुआ। ‘शेर आया रे शेर’ इस घोषणा से समूचा महाराष्ट्र गूंज उठा। लेकिन उधेड़बुन में रहना जैसे सेना का मूल स्वभाव ही बन गया है। भाजपा ने प्रचार शुरू किया कि कांग्रेस के साथ जाने से सेना का हिंदुत्व खत्म हो गया। इस ट्रैप में ठाकरे फंसे भी। जब राज ठाकरे ने हिंदुत्व के मुद्दे को हथियाने की कोशिश की तो उद्धव बिफर पड़े। बाला साहेब ठाकरे ने पहले ‘मराठी’ और फिर ‘हिंदुत्व’ के मुद्दे पर राजनीति की। बाला साहेब को यह जम गया, लेकिन शिवसेना की सीटों की संख्या सीमित ही रही।  अब अस्मिता से ज्यादा महत्व का मुद्दा अस्तित्व का है और उद्धव फसल बीमा, किसानों, रोजगार की बात कर रहे हैं। इसमें शिवसेना की परिपक्वता दिख रही है। वैलेंटाइन-डे का विरोध करने वाली आदित्य की शिवसेना अब मुंबई में नाइट लाइफ पर थिरक रही है। इसके विपरीत, युवावस्था में माइकल जैक्सन के साथ मोर्चा संभालने वाले राज ठाकरे पचास-पार होने पर बासी कढ़ी में उबाल ला रहे हैं। राज ने जब मनसे बनाई, तब वे 35 वर्ष के थे। अब राजनीति के केंद्र में नई पीढ़ी है। इसके मुद्दे बदल गए हैं। यह समझते हुए ही ‘सीएए के विरोध में मोर्चा निकालता हूं’ कहने वाले राज ने ‘यू-टर्न’ लेना उचित समझा। नई पीढ़ी से खुद को कैसे ‘कनेक्ट’ करना, यह उन्हें समझ नहीं आया। इसके विपरीत, शिवसेना अब चोला बदल रही है।  सरकार बनाते समय शिवसेना के लिए अस्मिता का मुद्दा कम महत्वपूर्ण था, ऐसा नहीं है। वह उपेक्षितों के आंगन तक सत्ता को लेकर गईं। दलित-ओबीसी समूह के लिए सत्ता के दरवाजे खोले। कांग्रेस की धनाढ्य राजनीति के विरोध में यह बगावत थी। ऐसा नहीं है कि शिवसेना की यह विचारधारा है। लेकिन इसका परिणाम ऐसा ही रहा। शिवसेना का हिंदुत्व उस समय भाजपा से अलग था। बदले संदर्भों में सेना आज विकास की भाषा बोल रही है और महाराष्ट्र को वह अच्छा भी लग रहा है।  उद्धव सभ्य और सुसंस्कृत हैं। राजनीति का साम-दाम उनके स्वभाव का हिस्सा नहीं है, लेकिन हर बार वे उधेड़बुन में दिखते हैं। एक ही समय में सबको खुश करने की कोशिश करते दिखते हैं। इस वजह से हिंदुत्व के मुद्दे को हाथ से खिसकते देखने को तैयार नहीं है। 7 मार्च को उद्धव अयोध्या जा रहे हैं। वे चाहते हैं कि सावरकर को ‘भारत रत्न’ दिया जाए। इसमें कुछ भी गलत नहीं। मुख्यमंत्री बनने पर श्री राम के दर्शन करने अयोध्या जाने की इच्छा होना स्वाभाविक है। लेकिन, इस संबंध में उन्होंने जो उधेड़बुन दिखानी शुरू की है, वह उन्हें परेशान करेगी। नए विचार को स्थापित करते हुए शिवसेना को स्थापित रखना उनके लिए चुनौती है।

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