खुली बात / डबल इंजन की सरकारों में एक इंजन उल्टा क्यों?

एन के सिंह

एन के सिंह

Dec 05, 2019, 12:51 AM IST

एनएसएस के एक और सर्वे ने फिर भारत सरकार के आंकड़ों को गलत करार दिया है। तीन हफ्ते में यह तीसरी सर्वे रिपोर्ट है, जिसने सरकार की कलाई खोली है। इस ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार 83 प्रतिशत टीकाकरण के सरकारी आंकड़ों के मुकाबले सर्वे में केवल 60 प्रतिशत बच्चों (पांच साल से कम) का टीकाकरण पाया गया और वह भी तब जब 90 प्रतिशत डिलीवरी अस्पतालों में हो रही है।

इसके पहले इसी संस्था ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि ग्रामीण भारत में 25 प्रतिशत लोग अब भी शौचालय की सुविधा से वंचित हैं, जबकि भारत सरकार ने देश को ‘खुले में शौच से मुक्त’ घोषित कर दिया है। उधर, सीएजी की एक सप्ताह पूर्व की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश में बाल मृत्यु के सरकारी आंकड़े पिछले पांच साल से कम करके बताए जा रहे हैं।


ये दोनों संस्थाएं काफी अहम और कुछ हद तक स्वायत्त मानी जाती हैं। लिहाज़ा अब किरकिरी होने पर सरकार के अधिकारियों ने यह आरोप लगना शुरू किया है कि एनएनएस का सैंपल साइज़ छोटा है और लोगों ने ज्यादा मदद के लालच में झूठ बोलना शुरू किया है। लेकिन, मैंने स्वयं एक गांव में दो दिन पहले जाकर पाया कि कुछ लाभार्थियों ने सरकारी अमले से मिलकर एक बने-बनाए शौचालय के पास खड़े होकर फोटो खिंचवाया और पैसे ले लिए। ऐसे हैं सरकारी आंकड़ों में दर्ज नए शौचालय। 


दुनिया के 180 देशों में भ्रष्टाचार में भारत 78वें स्थान पर है और हर दूसरे भारतीय ने 2019 में अपना काम कराने के लिए घूस दी है। जहां राजस्थान में हर दस में से सात लोगों ने घूस दी, वहीं केरल में केवल एक व्यक्ति ने। सकारात्मक भाव से देखें तो पिछले एक साल में विश्व पटल पर इस रैंकिंग में तीन स्थान ऊपर आना एक उपलब्धि मानी जा सकती है।

कुछ उसी तरह जैसे 2.83 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) के साथ हम छठे स्थान पर हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दावों पर भरोसा करें तो अगले चार साल में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ हम शायद तीसरे स्थान पर होंगे। लेकिन, यह सकारात्मक भाव उस समय तिरोहित हो जाता है जब यह रिपोर्ट आती है कि विश्व भूख सूचकांक में 117 देशों में भारत 103वें स्थान पर है और वह भी पांच साल में दस स्थानों की गिरावट के साथ।

इन तथ्यों के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी की जन-स्वीकार्यता घटी नहीं, बढ़ी है। इस बात की पुष्टि एक अन्य ताज़ा सर्वेक्षण से होती है। दुनिया में जानी-मानी संस्था डालबर्ग के एक ताज़ा अध्ययन के अनुसार 97 प्रतिशत भारतीयों का यह मानना है कि आधार की वजह से सरकार की ओर से चलाई जाने वाली योजनाओं में भुगतान काफी हद तक तेज और भ्रष्टाचार-शून्य हो गया है और वे इससे संतुष्ट हैं।

जिन लोगों को आधार से कोई भी सुविधा नहीं मिली, उनमें से दो-तिहाई यह मानते हैं कि आधार एक अच्छी कोशिश है। ये निष्कर्ष सरकार के प्रति लोगों के बढ़ते विश्वास का सूचक है। आमजन आधार को सीधे मोदी से और उसके लाभ को केंद्र की सरकार से जोड़कर देखता है। 


इसका दूसरा पक्ष देखें- मोदी की भारतीय जनता पार्टी का दो साल पहले तक अपनी राज्य सरकारों के जरिये 72 प्रतिशत आबादी पर शासन था जो आज मात्र 41 प्रतिशत रह गया है। इस अवधि में पार्टी ने कई बड़े राज्यों में सरकारें खो दीं। इसके विपरीत छह माह पहले हुए लोकसभा चुनाव में पहले से अधिक मत प्रतिशत और ज्यादा सीटों के साथ जनता ने दोबारा मोदी सरकार को चुना।

यह विरोधाभास इस बात के संकेत हैं कि मोदी को तो केंद्र की सत्ता में जनता आज भी देखना चाहती है, लेकिन राज्यों की भाजपा सरकारों से उसकी नाराजगी बढ़ी है। चूंकि राज्य सरकारों के पास पुलिस, क्षेत्रीय सड़कें, स्कूल और अस्पताल होते हैं, पानी -बिजली का जिम्मा है, लिहाज़ा नाकारा सरकारों के प्रति नाराजगी स्वाभाविक है।

राज्यों में भाजपा सरकारों के प्रति नाराजगी का एक और कारण है मुख्यमंत्रियों को सीधे तौर पर खराब परफार्मेंस के लिए जिम्मेदार न ठहराना। अगर कोई मुख्यमंत्री सरयू के तट पर पांच लाख दिए जलाकर प्रदेश को विकसित बताए, जबकि अपराध के आंकड़े कुछ और कह रहे हों। ये कुछ कारण हैं जिनसे भाजपा शासित राज्यों के नेतृत्व के प्रति लोगों की नाराजगी चुनाव-दर-चुनाव जाहिर हो रही है। क्या पीएमओ को इन तथ्यों का संज्ञान लेकर राज्य के मुखिया से पूछना नहीं चाहिए कि ‘डबल इंजन’ में एक इंजन उल्टी दिशा में क्यों खींच रहा है? 

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