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पोर्न साइट्स पर बैन को अदालतों में क्यों उलझाया जा रहा है?

5 महीने पहलेलेखक: विराग गुप्ता
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प्रतीकात्मक फोटो।
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पोर्नोग्राफी की महामारी के तीन पहलू हैं। पहला महिलाओं और बच्चों के खिलाफ बढ़ते यौन अपराध, दूसरा इस संगठित और अवैध बाजार से कंपनियों की भारी कमाई, तीसरा सरकार और अदालतों की नाकामी। तीसरे पहलू यानी कानून, पुलिस, अदालत और सरकार की लाचारी को सिलसिलेवार तरीके से समझा जाए तो इस महामारी का सटीक इलाज हो। पोर्नोग्राफी से समाज का विक्षिप्त होना वीभत्स है। इस संगठित बाजार के सामने व्यवस्था का नतमस्तक होना, भारत की सार्वभौमिकता के लिए त्रासद है। आठ साल पुराने वाकये से शुरुआत करें, जब बिग बॉस से सॉफ्ट पोर्नोग्राफी के प्रसार के खिलाफ शिकायतों को तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने दरकिनार कर दिया था। उसके बाद बढ़े हौसले से पोर्नोग्राफी को कानूनी दर्जा देने के लिए संसद मार्ग में पोर्नोग्राफी की ब्रांड एंबेसडर सनी लियोनी के आतिथ्य में जलसे की योजना बनाई गई। भारत में आईटी एक्ट और आईपीसी के तहत पोर्नोग्राफी का निर्माण, प्रचार और प्रसार सभी अपराध हैं। दिल्ली पुलिस को लीगल नोटिस देकर मैंने इस गैरकानूनी आयोजन के लिए प्रदान की गई अनुमति को निरस्त करने की मांग की। त्वरित कार्रवाई से पोर्नोग्राफी का रोड शो नाकाम हो गया। लेकिन, इंटरनेट के पिछले दरवाजे से घुसपैठ करके सनी लियोनी भारत में सबसे ज्यादा गूगल सर्च होने वाली सेलिब्रिटी बन गईं। फेसबुक और गूगल के माध्यम से ऑनलाइन ड्रग्स, रेव पार्टियों, वेश्यावृत्ति और पोर्नोग्राफी और बच्चों के लिए बढ़ रहे खतरे के खिलाफ जून 2012 में के.एन. गोविंदाचार्य ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की। तत्कालीन कांग्रेस और फिर भाजपा सरकार समेत फेसबुक और गूगल ने भी इसे रोकने पर सहमति जताई। यूरोप और अमेरिका के देशों में बच्चों की पोर्नोग्राफी पर कई प्रतिबंध हैं। जबकि, भारत में बच्चों और वयस्क सभी प्रकार की पोर्नोग्राफी निर्माण और वितरण गैरकानूनी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में पोर्नोग्राफिक वेबसाइट या सोशल मीडिया से पोर्नोग्राफिक कंटेंट को अलग करना कुछ सेकंड का काम है, तो फिर इसके लिए जनता से शिकायतों की क्या जरूरत है? असल में पोर्नोग्राफी को फेक न्यूज़ के साथ जोड़ने से उसे कानूनी रक्षा का बड़ा कवच मिल रहा है। देश के अनेक राज्यों में धारा 144 के क़ानून से जबरिया इंटरनेट बंद कर दिया जा रहा है, लेकिन आईटी एक्ट के तहत इंटरनेट के कंटेंट या वेबसाइट्स पर रोक लगाने का हक़ सिर्फ केंद्र सरकार को ही है। धारा 370 के प्रावधानों को रद्द करने बाद जम्मू-कश्मीर में भारत के सभी कानून लागू हो रहे हैं। वहां चुनिंदा वेबसाइट्स के परिचालन की अनुमति देकर सरकार ने कई कानूनी वेबसाइट्स भी बैन कर दी है तो अब अवैध पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स को बंद करने के लिए अदालती प्रक्रिया के नाम पर मामले को क्यों उलझाया जा रहा है? अनेक मंत्रालय, संसदीय समिति, बाल आयोग, पुलिस, सीबीआई की कार्रवाई के स्वांग से कन्फ्यूजन बढ़ने का लाभ इन कंपनियों को मिलना दुर्भाग्यपूर्ण है।  निर्भया के दोषियों को फांसी देने के लिए केंद्र ने पिछले कुछ महीनों में बहुत चुस्ती दिखाई है। पोर्नोग्राफी में लिप्त बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर नियमों के अनुपालन का डंडा चले तो इंटरनेट की स्वतंत्रता बाधित किए बगैर भारत में पोर्नोग्राफी का खेल खत्म हो सकता है।

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