अस्तित्व / ये पुरुष सिर्फ महिलाओं की देह और चरित्र पर ही क्यों बोलते हैं?



Why do these men speak only on the body and the body of women?
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Why do these men speak only on the body and the body of women?

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2019, 10:48 PM IST

सपा नेता आजम खान रविवार को रामपुर में एक चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे। अपने भाषण में बिना नाम लिए उन्होंने बीजेपी नेता जया प्रदा पर निशाना साधा और ऐसा साधा कि मर्यादा की सारी हदें लांघ गए। उन्होंने कहा, ‘जिसे उंगली पकड़कर हम रामपुर लाए, 10 साल जिससे आपने प्रतिनिधित्व कराया, उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लग गए। मैं तो 17 दिन में ही पहचान गया था कि उसका अंडरवियर खाकी रंग का है।’ एक महिला के संदर्भ में ऐसे शब्द का इस्तेमाल करते हुए न उनकी जबान लरजी, न उन्हें शर्म आई। हालांकि ये बेशर्मी नेताओं के लिए कोई नई बात नहीं है। शरद यादव ने वसुंधरा राजे को मोटी कहा, दिग्विजय सिंह ने मीनाक्षी नटराजन को सौ टका टंच माल। इन मर्दों ने कभी औरत को कहा पचास करोड़ की गर्लफ्रेंड तो कभी फिल्मों में ठुमका लगाने वाली। मुलायम सिंह ने तो रेपिस्ट लड़कों के लिए ये तक कह डाला कि लड़कों से गलती हो जाती है। गलती हो गई, साॅरी।

 

सवाल यह नहीं है कि ये मर्द क्या बोल रहे हैं, सवाल यह है कि क्यों बोल रहे हैं और कैसे। वे जब भी औरतों पर बोलते हैं तो उनकी देह और चरित्र पर ही क्यों बोलते हैं। उनके काम पर क्यों नहीं बोलते, दिमाग पर क्यों नहीं बोलते, उनकी राजनीति पर क्यों नहीं बोलते। सिर्फ कपड़ों और शरीर की बात क्यों करते हैं। और उनमें इतनी हिम्मत, इतना आत्मविश्वास कहां से आता है कि वे औरतों पर कुछ भी बोलकर निकल लेंगे और उनका बाल भी बांका नहीं होगा। और हुआ तो ये कि ये वे लोग हैं, बोलते-बोलते जिनकी जबान फिसल गई और पब्लिकली ऐसी बातें कर बैठे। वरना सच यह है कि जो बोल नहीं रहे, वे भी यही सोच रहे हैं। बस बाहर से गरिमा का आवरण ओढ़ रखा है। शायद इसी में छिपा है इस सवाल का जवाब, कि हिम्मत आती कहां से है? हिम्मत आती है उस सोच से, जो हजारों सालों से दिमाग में भरी गई है। साहित्य, सिनेमा, कला, समाज सबने सदियों से स्त्री को सिर्फ देह में रिड्यूस किया है।

 

जिस इंसान का सबसे बड़ा सरमाया ही उसकी देह हो, वो दिन-रात देह को छिपाने, देह को बचाने के जतन करे, देह ही सारी इज्जत हो, न बुद्धि हो, न ज्ञान, न बल तो उस पर होने वाले हमले भी उसकी देह पर ही होंगे। सिर्फ सियासत वाले ही नहीं, समाज और परिवारों में भी पुरुष औरतों को नीचा दिखाने के लिए उनके शरीर और चरित्र पर ही हमला करते हैं। वह स्त्री का वह सबसे कमजोर कोना है। वहीं औरत सबसे ज्यादा अपमानित महसूस करती है। स्त्री को मूर्ख कहा जाना इतना बुरा नहीं लगता, जितना कि चरित्रहीन, क्योंकि चरित्र ही उसका गहना है।

 

लेकिन यह सच नहीं है। और इसी झूठ को तो बदलने की जरूरत है। अपने लड़कों को बचपन से यह सिखाने की जरूरत कि लड़कियां माल नहीं होतीं, इंसान होती हैं। उनको देखो तो उनकी बुद्धि की चमक देखो, उनकी आंखों की रोशनी देखो। शरीर मत देखो। और देखो तो ऐसे, जैसे एक इंसान दूसरे इंसान को देखता है। और अपनी बेटियों को यह कहो कि बकवास सहना बंद करो। वे डराते हैं क्योंकि तुम डरती हो। तुम्हारी पूंजी तुम्हारा शरीर नहीं दिल और दिमाग है। अपने दिमाग की रोशनी में रोशन हो। सारा आसमान तुम्हारा है।

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