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  • Why Give Trump The Right To Interfere In The Indo Pak Dispute?

ट्रम्प को क्यों दें भारत-पाक विवाद में दखल का हक?

5 महीने पहले
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अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प।
  • नोबेल पुरस्कार पाने की चाहत में ही अमेरिकी राष्ट्रपति कर रहे हैं लगातार शांति समझौते
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(हामिद मीर, पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार, tweets @HamidMirPAK). बराक ओबामा आज सत्ता में नहीं हैं, लेकिन दुनिया का सबसे शक्तिशाली आदमी बराक ओबामा बनना चाहता है। जी हां, डोनाल्ड ट्रम्प ओबामा बनना चाहते हैं। 2009 में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले अश्वेत अमेरिकी राष्ट्रपति थे ओबामा। अब ट्रम्प हर कीमत पर नवंबर 2020 में होने वाले चुनाव से पहले इसे पाना चाहते हैं। वह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में शांति को बेचने की कोशिश कर रहे हैं। वह शांति के नाम पर अपना व्यापार कर रहे हैं।


उन्होंने कुछ हफ्ते पहले मध्य-पूर्व में एकतरफा शांति समझौते की घोषणा की, लेकिन फलस्तीनियाें ने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया। इसके बाद उन्होंने अफगान तालिबान के साथ शांति समझौते के लिए पाकिस्तान का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया। 29 फरवरी को इस समझौते की घोषणा कर दी जाएगी। वह कश्मीर विवाद के समाधान के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच भी मध्यस्थता करना चाहते हैं। वह सोचते हैं कि अफगानिस्तान और कश्मीर में शांति कायम करके वह नोबेल पुरस्कार पाने के हकदार हो जाएंगे। वह नोबेल के मजबूत दावेदार बनने के लिए कई तरह के काम कर रहे हैं।

ट्रम्प ने अपनी हाल की भारत यात्रा के दौरान पाकिस्तान को सराहा। इससे भारत में काफी लोग नाराज भी हुए। पाकिस्तान में कुछ लोग बहुत खुश हुए। लेकिन, सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान ट्रम्प पर भरोसा कर सकता है? ट्रम्प वही व्यक्ति हैं, जिन्होंने सितंबर 2019 में अफगान शांति वार्ता सिर्फ इसलिए निलंबित कर दी थी, क्योंकि तालिबान ने शांति समझौते पर दस्तखत के लिए कैंप डेविड आने से इनकार कर दिया था। यह न केवल पाकिस्तान के लिए, बल्कि शांति प्रक्रिया का हिस्सा रहे सऊदी अरब, यूएई, कतर, चीन, रूस, जर्मनी और कुछ अन्य देशों के लिए अत्यंत अपमानजनक था।

ट्रम्प को तत्काल अहसास हो गया कि उन्हांेने बहुत बड़ी गलती कर दी है, क्योंकि तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान में अपने हमले तेज कर दिए थे। इसके बाद उनके प्रतिनिधि जाल्मे खलीलजाद ने पाकिस्तान से तालिबान के साथ फिर वार्ता शुरू करने की भीख मांगी। पाकिस्तान के लिए अफगान तालिबान को दोबारा शांति वार्ता के लिए मनाना बहुत कठिन था। अंत में पाकिस्तान ने कतर की मदद से तालिबान को राजी कर लिया। जो लोग सोचते हैं कि तालिबान और अमेरिका का समझौते पर दस्तखत करना शांति के लिए काफी होगा तो वे गलत हैं।


शांति की मंजिल बहुत दूर है। तालिबान अशरफ गनी को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। वे एक अंतरिम सरकार चाहते हैं, जो संविधान में बदलाव कर सके। सत्ता की साझेदारी के फॉर्मूले पर अभी फैसला होना है। यह सब नवंबर 2020 से पहले नहीं हो सकेगा, लेकिन ट्रम्प को जल्दी है। वह अफगानिस्तान के साथ ही कश्मीर में भी शांति चाहते हैं, जो संभव नहीं है। अगर वह मध्यस्थ बनना चाहते हैं ताे यह सभी पक्षों को मंजूर होना चाहिए। उनका दावा है कि उनके नरेंद्र मोदी और इमरान खान दोनों से ही अच्छे रिश्ते हैं, इसलिए वह भारत व पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता कर सकते हैं।


हकीकत यह है कि इमरान तो ट्रम्प पर भरोसा कर सकते हैं, लेकिन अधिकांश पाकिस्तानी उन पर भरोसा नहीं करते। वह भारत गए, लेकिन कभी पाकिस्तान नहीं आए। पाकिस्तानी कैसे भराेसा कर सकते हैं कि वह सच्चे दोस्त हैं? पाकिस्तान में अनेक लोगों का कहना है कि ट्रम्प ने भारत में पाकिस्तान की तारीफ सिर्फ इसलिए की कि वह चाहते हैं कि 29 फरवरी को अफगान-तालिबान से समझौता हो जाए। उनकी प्रशंसा तो एक धोखा है, हकीकत में तो उन्होंने पाकिस्तान को नजरअंदाज किया है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इमरान खान ने एक से अधिक बार ट्रम्प से भारत व पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता के लिए कहा है। वह ऐसा क्यों कर रहे हैं?

इमरान अपने देशवासियों को आर्थिक राहत देने में नाकाम रहे हैं। अब वे ट्रम्प का इस्तेमाल करके कश्मीर पर बड़ी सफलता चाहते हैं। यदि मान भी लिया जाए कि भारत, पाकिस्तान के साथ बातचीत को राजी हो जाता है, तो भी इमरान को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को ट्रम्प को मध्यस्थता के लिए स्वीकार कराना बहुत कठिन होगा। अनेक विपक्षी नेता तो ट्रम्प के बार-बार मध्यस्थता का राग अलापने पर सवाल भी उठा चुके हैं। उनका कहना है कि क्या पाकिस्तान की संसद को ट्रम्प और इमरान के बीच हुई किसी गुप्त समझौते की जानकारी नहीं है?


मैं नहीं जानता की भारतीय ट्रम्प को स्वीकार करेंगे या नहीं पर पाकिस्तान में तो बहुत लोग ऐसा नहीं चाहते। पाकिस्तान और भारत पड़ोसी हैं। कल या उसके अगले दिन दोनों को एक-दूसरे से बात करनी ही पड़ेगी। बेहतर हो कि वे खुद ही बातचीत शुरू करें। ट्रम्प को बार-बार हमारे विवादों में दखल की इजाजत नहीं देनी चाहिए। ट्रम्प पर भरोसा न करें। वह शांति नहीं केवल नोबेल शांति पुरस्कार चाहते हैं।

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