संदर्भ / इंटरनेट का नियमन 1885 के कानून से क्यों?

विराग गुप्ता

विराग गुप्ता

Dec 04, 2019, 12:49 AM IST

वाट्सएप के बाद अब गूगल के माध्यम से भी जासूसी के खुलासे से भारत में असुरक्षा की स्थिति बन रही है। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्रीकृष्णा ने कहा है कि इंटरनेट कंपनियों ने जॉर्ज ऑरवेल के बड़े भाई की तरह देश में निगरानी तंत्र बना लिया है।

जस्टिस श्रीकृष्णा की टिप्पणी का बहुत महत्व इसलिए है, क्योंकि उनकी रिपोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय के नौ जजों के फैसले के बावजूद केंद्र सरकार ने डाटा सुरक्षा के लिए प्रभावी कानून नहीं बनाया है। दस साल पहले भारत में वाट्सएप का किसी ने नाम भी नहीं सुना था और अब गांव से लेकर शहर तक यह हर जगह व्याप्त है। वाट्सएप न तो सरकार को कोई फीस देता है और न ही जनता से कोई पैसा लेता है। इसके बावजूद टेलीकॉम कंपनियों का नेटवर्क जहां नहीं पहुंचता, वहां पर वाट्सएप के माध्यम से लोग संपर्क कर लेते हैं। 


वाट्सएप को पांच साल पहले फेसबुक ने 19 अरब डॉलर में ख़रीदा था। निःशुल्क सेवा देने वाले वाट्सएप ने भारत में आम चुनावों के पहले पांच महीनों में सिर्फ विज्ञापनों पर ही लगभग 120 करोड़ से ज्यादा रकम खर्च की थी। लेकिन, वाट्सएप ने भारत में जो कंपनी बनाई है, उसका इस साल का मुनाफ़ा सिर्फ 57 लाख रुपए है। वाट्सएप और इंस्टाग्राम के स्वामित्व को हासिल करके फेसबुक ने भारत की आधी आबादी और सभी सरकारों के डाटा पर कब्ज़ा कर लिया है। भारत के डाटा को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में नीलाम करके फेसबुक ने भारतीयों को तांक-झांक और जासूसी की जलालत झेलने को मजबूर कर दिया। 


इंटरनेट देशों के भूगोल से भले ही परे हो, लेकिन अधिकांश इंटरनेट कंपनियों का नियंत्रण अमेरिका के पास है। इंटरनेट कंपनियों के माध्यम से विश्व व्यापार के साथ सूचना तंत्र पर नियंत्रण, अमेरिकी नवसाम्राज्यवाद का सबसे बड़ा एजेंडा है, जिसका सामरिक आयाम जासूसी है। अमेरिका में राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के पूर्व अधिकारी एडवर्ड स्नोडेन ने इंटरनेट कंपनियों और अमेरिकी खुफिया संगठनों की सांठगांठ से चल रहे ऑपरेशन ‘प्रिज्म’ का 6 साल पहले खुलासा किया था।

इन ताकतवर कंपनियों का तो कुछ भी नहीं बिगड़ा पर स्नोडेन निर्वासित होकर अब दर-दर की ठोकर खा रहे हैं। प्रिज्म के तहत भारत के निजी और सरकारी क्षेत्र की छह अरब से ज्यादा सूचनाओं को नौ इंटरनेट कंपनियों ने अमेरिका में साझा किया था। इसके बावजूद पूर्ववर्ती यूपीए सरकार और बाद में एनडीए सरकार ने इन कंपनियों के खिलाफ कोई भी आपराधिक कारवाई नहीं की।


भारत समेत विश्व के अनेक देशों में वाट्सएप के माध्यम से जासूसी के लिए इजराइल के पेगासस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल हुआ। शुरू में इक्का-दुक्का नामों का खुलासा होने के बाद भारत में जासूसी से पीड़ित लोगों की संख्या 121 से ज्यादा हो गई है। संसद में बहस के दौरान सरकार ने गोलमोल जवाब देते हुए, इस मामले से पल्ला झाड़ लिया है। कानून और आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पीड़ित लोगों को पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी है।

आईटी कानून के अनुसार ऐसे मामलों में दोषी लोगों को तीन साल तक की सजा और पांच लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। पीड़ितों द्वारा जासूसी के खिलाफ पुलिस में यदि शिकायत दर्ज भी कराई जाए, तो विदेशी कंपनियों को भारत में जांच के लिए कैसे बुलवाया जा सकेगा और दोषी लोगों को दंड देने के लिए सबूत कहां से आएंगे?

केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों पर बेहतर नियंत्रण के लिए नए कानून का मसौदा पिछले साल जारी किया था। फेक न्यूज़ और लिंचिंग की घटनाओं में बढ़ोतरी के बाद आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने वाट्सएप समेत सभी कंपनियों को भारत में कार्यालय खोलने और शिकायत अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश भी दिया था। वाट्सएप ने न तो भारत में अपना प्रभावी ऑफिस बनाया और न ही शिकायत अधिकारी नियुक्त किया। केंद्र सरकार ने गूगल और कैंब्रिज एनॉलिटिका मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए थे तो अब वाट्सएप को सिर्फ माफ़ीनामे से क्यों बरी किया जा रहा है?


भारत में टेलीग्राम की व्यवस्था बहुत पहले खत्म हो गई है, लेकिन इंटरनेट कंपनियों का नियमन और संचालन अभी भी सन 1885 के टेलीग्राफ कानून से हो रहा है। जब संविधान बना, उस समय इंटरनेट और कम्प्यूटर नहीं थे, इसलिए इस बारे में राज्यों के पास कोई भी अधिकार नहीं होना संघीय ढांचे के लिए भी चिंताजनक है। राज्यों में स्थानीय प्रशासन धारा 144 के तहत इंटरनेट भले ही बंद कर दे, परंतु इंटरनेट कंपनियों और एप्स पर नियमन और कार्रवाई के लिए सिर्फ केंद्र सरकार के पास ही अधिकार हैं।

मोबाइल फोन के पहले परंपरागत टेलीफोन व्यवस्था में जासूसी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1996 में पीयूसीएल मामले में ऐतिहासिक फैसला दिया था। ई-मेल, मोबाइल और इंटरनेट की नई दुनिया में जासूसी रोकने के पुराने कानून और न्यायिक व्यवस्था अब अर्थहीन हो गई है। भारत में परंपरागत अपराधों से निपटने के लिए पुलिस के पास बल और संसाधन नहीं है और अदालतों में तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमों की भरमार है। विधि का सबसे बड़ा सिद्धांत यह है कि ‘जो करे सो भरे’। विदेशी इंटरनेट कंपनियां भारत में घास खाकर अमेरिका और आयरलैंड में दूध दे रही हैं।

डिजिटल इंडिया के प्रसार के साथ अब इंटरनेट कंपनियों पर लगाम के लिए बड़े जुर्माने और कठोर सजा की व्यवस्था बने तो ऐसे मामलों पर रोक लग सकेगी। संविधान की 70वीं जयंती पर आम जनता को संवैधानिक कर्तव्यों का बोध कराने के लिए सरकार बड़े अभियान चला रही है। इंटरनेट कंपनियों की जासूसी से जनता के जीवन और निजता की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानूनी तंत्र बनाने की जिम्मेदारी भी तो सरकार और संसद की है। जासूसी कांड से जल्द सबक लेकर इंटरनेट कंपनियों की व्यवस्था को भारत में जवाबदेह बनाना ही होगा। 
(यह लेखक के अपने विचार हैं) 

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