जीने की राह / पति-पत्नी के रिश्ते में दुख से बचाता है योग

पं. विजयशंकर मेहता

पं. विजयशंकर मेहता

Nov 10, 2018, 12:01 AM IST



Yoga prevents sorrow from the relationship
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‘मैंने तो पहले ही कहा था’, यह छोटा-सा संवाद भारत के परिवारों में बहुत बोला जाता है। कोई गलती हो जाए तो बड़े सदस्य बच्चों से कहते हैं, कभी-कभी बच्चे भी पलटकर बड़ों को सुना देते हैं। ऐसा संवाद जब पति-पत्नी के बीच होता है तो फिर इस रिश्ते में दुख और कष्ट दोनों एक साथ चलने लगते हैं।

 

जिस दिन कोई स्त्री-पुरुष पति-पत्नी बनते हैं, उन्हें यह मानकर चलना होगा कि जिस सुख की अपेक्षा के साथ इस रिश्ते की शुरुआत की, वह सुख एक नए रूप में कष्ट और दुख के भाव से भी आने वाला है। कष्ट और दुख के फर्क को समझना पड़ेगा।

जीवन में अभावों की अत्यधिक अनुभूति को कष्ट कहते हैं। तो कष्ट का संबंध शरीर से है। इसीलिए पति-पत्नी एक-दूसरे को केवल दुख ही नहीं, कष्ट भी देते हैं। इसी प्रकार दुख का संबंध आत्मा से है। जब गर्मी लगती है तो हम पंखा चला लेते हैं, भूख लगे तो भोजन कर लेते है, ऐसे ही जब दुख आए तो आत्मा से जुड़ जाइए।

आत्मा से जुड़ने के लिए हर जोड़े को 24 घंटे में कुछ समय देह से भीतर उतरकर एक ऐसी यात्रा करनी पड़ेगी, जो आत्मा के गलियारों से गुजरती है और घूम-फिरकर आत्मा तक ही पहुंचती है। यह यात्रा बड़ी अद्‌भुत हो जाती है जब दो देह एक साथ पति-पत्नी के रूप में इसे करते हैं। बस, यहीं से कष्ट और दुख दोनों का निवारण समझ में आ जाता है। इस यात्रा को जिसे ऋषि-मुनियों ने योग कहा है, अपने भोग के साथ जोड़ना ही पड़ेगा। वरना पति-पत्नी का यह रिश्ता जीवनभर कष्ट और दुख में उलझा रहेगा।

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