भास्कर 360 डिग्री / आर्थिक आरक्षण की जद में आएगी 18* फीसदी सवर्ण आबादी

Dainik Bhaskar

Jan 13, 2019, 01:36 AM IST



18% of the population will come in  reservation.
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18% of the population will come in  reservation.
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  • अब देश की कुल 95 फीसदी आबादी के लिए है 60% कोटा
  • मंडल कमीशन तथा जनगणना 2011 के आंकड़ों के आधार पर देश में ओबीसी 52 फीसदी हैं, एससी 16.6% व एसटी 8.6% हैं
  • रोक के बावजूद कुछ राज्यों में पहले से दे रहे हैं 50% से ज्यादा कोटा 

सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का बिल संसद के दोनों सदनों में पास हो चुका है। राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है। नोटिफिकेशन जारी होने के बाद यह लागू हो जाएगा। इस तरह अब देश के सरकारी शैक्षणिक संस्थानों तथा सरकारी नौकरियों में 10 फीसदी सीटें व पद गरीब सवर्णों के लिए आरक्षित होंगे।

 

इस आरक्षण के लागू होने के बाद देश में कोटा 49.5 प्रतिशत से बढ़कर 59.5 फीसदी तक हो जाएगा। मगर हैरत की बात यह है कि इस तकरीबन 60 फीसदी कोटे के दायरे में अब देश की 95 फीसदी (अनुमानित) आबादी होगी। 95 प्रतिशत का सीधा गणित इस तरह समझ सकते हैं।

 

मंडल कमीशन तथा 2011 की जनगणना के अनुसार  देश में एससी, एसटी व ओबीसी की कुल आबादी 77.2 फीसदी है। तो बचे 22.8 फीसदी सवर्ण। ताजा बिल की शर्तों के अाधार पर इन 22.8 फीसदी में से आरक्षण के दायरे में लगभग 18 फीसदी सवर्ण ही आते दिख रहे हैं। इसका मतलब है कि सिर्फ 5 फीसदी ही सवर्ण ऐसे हैं जो किसी आरक्षण के दायरे में नहीं आते हैं।

 

पहले किसे, कितना मिल रहा था आरक्षण 

 

जाति आबादी में हिस्सेदारी   आरक्षण
अनुसूचित जाति    16.6%   15%
अनुसूचित जनजाति 8.6%  7.5%
अन्य पिछड़ा वर्ग 52%   27%
कुल  77.2%  49.5%

 

यहां एससी-एसटी के आंकड़े 2011 की जनगणना के अनुसार हैं। वहीं ओबीसी के आंकड़े 1980 की मंडल कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर हैं।

 

वैसे मंडल कमीशन की रिपोर्ट से अलग नेशनल सेम्पल सर्वे अॉर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) के मुताबिक देश में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग (ओबीसी) 41 फीसदी हैं। इस 41 फीसदी में एससी-एसटी की 25.2 फीसदी आबादी जोड़ दें तो 66.2 फीसदी होता है।

 

मतलब इस लिहाज से 49.5 फीसदी कोटे के दायरे में देश की 66.2 फीसदी आबादी ही है। वैसे इस दायरे से बाहर जाकर मैरिट में आने वाला प्रतिस्पर्धी अनारक्षित सीट व पद हासिल कर सकता है। हाल ही में कुछ मामलों में बैकवर्ड को अनारक्षित सीट न देने पर विवाद जरूर हुआ है।    

 

95% का अनुमान इस आधार पर

 

इसे अारक्षण बिल की शर्तों के लिहाज से एेसे समझें...

 

  • पहली शर्तः आरक्षण के हकदार परिवार की आय 8 लाख रुपए सालाना से कम होना है। आयकर विभाग के अनुसार 2016-17 में सिर्फ 2.3 करोड़ लोगों ने ही 4 लाख रुपए से अधिक आय होने की घोषणा की है। माना जाए कि एेसे दो लोग एक ही परिवार में हैं तो भी 1.15 करोड़ परिवारों की आय ही 8 लाख रुपए से ज्यादा होगी। देश की आबादी के लिहाज से एेसे परिवारों की संख्या पांच फीसदी भी नहीं है। यानी जो लोग नौकरी पेशा हैं, व्यापार कारोबार करते हैं, उनमें से 95 फीसदी लोग आयकर के रिकॉर्ड के मुताबिक आरक्षण का लाभ ले सकते हैं।
  • दूसरी शर्तः परिवार के पास 2 हेक्टेयर से कम कृषि भूमि होना है। 2015-16 की कृषि जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि देश में 13.8 फीसदी परिवार एेसे हैं, जिनके पास इससे ज्यादा जमीन है। इन भूमि मालिकों को देशभर की जनसंख्या के साथ देखें तो ये कुछ फीसदी भी नहीं हैं। वैसे भी इनमें से कई भूमि मालिक तो पहले भी सामाजिक आधार पर दिए गए कोटे के दायरे में हैं ही।
  • तीसरी शर्तः घर का आकार 1 हजार स्क्वायर फीट से कम होना है। नेशनल सेम्पल सर्वे की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार अमीर मानी जाने वाली 20% आबादी के घर 500 स्कवायर फीट से छोटे हैंै। अनुमान है कि इनमें 1 हजार फीट से ज्यादा बड़े घर में रहने वाले 10% ही होंगे। शेष 90 फीसदी आबादी यहां इस शर्त के बाद भी आरक्षण का लाभ ले सकती है। हालांकि जिनके पास बड़े घर हैं, वे भी कुल आबादी के लिहाज से बेहद कम ही हैं। 
  • चौथी शर्तः आवेदक के पास म्युनिसिपैलिटी क्षेत्र में 100 गज से बड़ा प्लाट नहीं होना चाहिए। फिलहाल इसका कोई डेटा एकसाथ उपलब्ध नहीं है।
  • पांचवीं शर्तः नॉन नोटिफाइड म्युनिसिपैलिटी क्षेत्र में 200 गज से बड़ा प्लॉट नहीं होना चाहिए। इसका डेटा एकसाथ उपलब्ध नहीं है।  
  • इसके अलावा पहले से मौजूद सामाजिक आरक्षण है। इसलिए मोटे तौर पर देखा जाए तो देश की लगभग 95 फीसदी आबादी, आय, घर और खेती की जमीन जैसी शर्तों के बावजूद अब आरक्षण की हकदार है। 

1992 में इंदिरा साहनी केस के बाद सुप्रीम कोर्ट यह साफ कर चुका है कि कोटा किसी भी स्थिति में 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होगा। मगर कुछ राज्य अपने खास समुदायों के लिए अलग से कोटे का प्रावधान कर चुके हैं। ये राज्य तमिलनाडु व महाराष्ट्र हैं।

 

फिलहाल किस राज्य में क्या स्थिति

 

आरक्षण


 

       आगे यह होगाः बदल सकती हैं शर्तें, फायदा कब-कैसे मिलेगा इस पर सवाल?

 

  • नोटिफिकेशन जारी होने का इंतजार: राष्ट्रपति से मंजूरी के बाद अब सरकार की कोशिश है कि जल्द नियम-कायदे तय कर नोटिफिकेशन जारी कर दिया जाए। ताकि अगले एक महीने में शुरू होने वाले शैक्षणिक सत्र में सवर्ण वर्ग के गरीब छात्रों को इसका लाभ मिल सके। 
  • शर्तों में हो सकता है बदलाव: केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा है कि सवर्ण आरक्षण के लिए आठ लाख रुपए से कम आय और पांच एकड़ जमीन होने संबंधी मानदंड अभी अंतिम नहीं है। इसमें थोड़ा बहुत फेरबदल हो सकता है। गहलोत ने यह बात ज्यादा आय तक के लोगों को आरक्षण दे दिए जाने के सवाल पर कही है। असल में इसी कारण इसे चुनावों से जोड़कर देखा जा रहा है।
  • लाख खाली पद भरने का मौका: जानकारों का कहना है कि इस बिल के पास होने के साथ सरकार के पास गरीब सवर्णों को 3 लाख नए रोजगार देने का मौका है। अनुमान है कि केंद्र व राज्य सरकारों के पास अलग-अलग विभागों में 29 लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। इनमें से 10 फीसदी इस आरक्षण के तहत भरे जा सकते हैं। हालांकि नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट्स के पूर्व चेयरमैन पीएल पुनिया कहते हैं कि केंद्र सरकार ने आरक्षण बिल पर गंभीरता से काम नहीं किया है। आरक्षण जरूरी था, वह दे तो दिया, लेकिन ज्यादातर भर्तियां तो संविदा व मस्टर जैसे पदों पर हो रही हैं। इनमें आरक्षण लागू ही नहीं होता। इतना ही नहीं, अार्थिक पिछड़े सवर्ण इसका लाभ ले सकें, इसके लिए कोई सर्वेक्षण भी सरकार ने नहीं करवाया है। जिन्हें जरूरत है, उनकी पहचान नहीं होगी, तब तक उन्हें लाभ भी नहीं दिया जा सकता है। 

कोर्ट में चुनौती

 

एनजीओ यूथ फॉर इक्वैलिटी ने इस आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इस पर जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार कहते हैं कि चुनौती रुकावटें भी डाल सकती है। इसलिए कि संविधान की धारा 16(4) में आरक्षण के लिए सामाजिक प्रतिनिधित्व की बात है। इंदिरा साहनी केस में कहा गया है कि पिछड़ापन आर्थिक आधार पर तय नहीं किया जा सकता।

 

फायदा/नुकसान

 

राजनीतिक व सामाजिक विश्लेषक एनके सिंह कहते हैं इसका असल लाभ तो शहरी क्षेत्र में रह रहे कम आय वाले 7-8 फीसदी सवर्णों को ही मिलेगा। क्योंकि इनमें से अधिकांश के पास पहले की तरह कृषि भूमि नहीं रही। भारत में पिछले 25 साल से हर दिन 2052 किसान खेती छोड़ रहे हैं, ये शहरी उन्हीं में से हैं। ग्रामीण व खेती-किसानी करने वाले सवर्णों को भी फायदा मिलेगा, लेकिन इतना नहीं।

    
             

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