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अंडर-30 / सुनवाई में खुलेपन के बाद कोर्ट को आरटीआई के दायरे में लाएं



After open hearing, bring the court to the RTI
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After open hearing, bring the court to the RTI

  • भारतीय राजनीति की सार्वजनिक कल्पना में सुप्रीम कोर्ट संभवतः सबसे प्रमुख संस्था बन गई है

Dainik Bhaskar

Dec 07, 2018, 11:31 PM IST

2018 का वर्ष सुप्रीम कोर्ट के लिए कईं मायनों में अभूतपूर्व रहा। जहां एक ओर कईं संविधान पीठों ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाए, वहीं दूसरी ओर मुख्य न्यायाधीश के पद को लेकर पहली बार खुले तौर पर पक्षपात और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। मसला इस हद तक पहुंच गया कि चार वरिष्ठ न्यायाधीशों को भारत के इतिहास में पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलानी पड़ी।

 

भारतीय राजनीति की सार्वजनिक कल्पना में सुप्रीम कोर्ट संभवतः सबसे प्रमुख संस्था बन गई है। राम मंदिर और रफाल से लेकर पटाखा-बंदी और राष्ट्रगान तक, लगभग सारे राजनीतिक मसले किसी न किसी तरह से सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं। आए दिन अखबारों के पहले पन्ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों और टिप्पणियों से भरे होते हैं। संवैधानिक सिद्धांतों के मुताबिक़ देखा जाए तो लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों में न्यायालयों की सार्वजनिक भूमिका संसद और कार्यपालिका की तुलना में कम होनी चाहिए। वह इसलिए कि हमारे संवैधानिक ढांचे में न्यायाधीशों की जनता के प्रति कोई सीधी जवाबदेही नहीं बनती।


पिछले कुछ दशकों में विश्व के कईं जनतांत्रिक देशों में न्यायालयों का राजनीतिक और सामाजिक विषयों में हस्तक्षेप बढ़ा है लेकिन, भारतीय सुप्रीम कोर्ट इसमें बहुत आगे हैं। हाल ही में प्रकाशित इतिहासकार रोहित डे की किताब में बताया गया है कि कैसे आज़ादी के कुछ दशक के भीतर ही कईं आम लोगों- दलित और आदिवासियों से लेकर व्यापारियों तक ने अपने अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा सफलतापूर्वक  खटखटाया। तब से लेकर अब तक, आपातकाल का समय छोड़ दिया जाए तो, सुप्रीम कोर्ट ने आम नागरिक की निगाह में दृढ़ विश्वसनीयता कायम की है।

 

जहां आज़ादी के बाद लोक-कल्पना में देश की राजनीति भ्रष्ट और निष्क्रिय होती गई, सुप्रीम कोर्ट सक्रिय और विश्वसनीय। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का अति-सक्रिय होना हमारी राजनीतिक व्यवस्था की नाकामी दर्शाता है। जहां राजनीति को लेकर भावनाएं और जुनून हावी हों, वहां कानूनी तर्कसंगति आकर्षक लग सकती है। अल्पावधि में कोर्ट की सक्रियता को राजनीतिक निष्क्रियता की चादर से ढका जा सकता है, लेकिन दीर्घावधि में यह कोर्ट की विश्वसनीयता के लिए तकलीफ-दायक हो सकता है।


एक और जहां कोर्ट की सार्वजनिक भूमिका बढ़ती जा रही है, वही दूसरी और सुप्रीम कोर्ट के आतंरिक मामलों में लगभग पूरी तरह गोपनीयता बनाए रखी गई है, जो इस संस्था को आम आदमी के लिए रहस्यमय बना देती है। जिस तरह सुप्रीम कोर्ट की भूमिका बढ़ रही है, कोर्ट खुद को ज़्यादा समय तक पारदर्शिता के परे नहीं रख सकती। ऐसा करना कोर्ट की छवि को नुकसान पहुंचाने जैसा होगा। इसकी शुरुआत कोर्ट ने मुख्य मुकदमों की सुनवाई को वीडियो के जरिये दिखाने के ऑर्डर से कर दी है लेकिन, आगे चलकर आरटीआई कानून भी न्यायालयों पर लागू किया जाना चाहिए। कोर्ट सिर्फ व्यक्तिगत न्यायाधीशों के भरोसे नहीं चल सकती। इससे पहले कि देर हो जाए, अपनी विश्वसनीयता बचाने के लिए कोर्ट को संस्थागत परिवर्तन भी करने होंगे। लेखक - आराध्य सेठिया,23 एलएलएम, येल यूनिवर्सिटी, अमेरिका

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