मैं अयोध्या हूं / कभी सरयू तट पर बैठिए तो सही, मेरी आपबीती सुनाती है यह नदी



article on ayodhya by Dr. Dhananjay Chopra
X
article on ayodhya by Dr. Dhananjay Chopra

  • पुराण काल से अब तक कई धर्मों की धाराएं पूरी आभा के साथ बहती हुई मिल जाती हैं
  • पौराणिक धर्मग्रंथों को खंगाल डालिए, मेरी सुंदरता और सहजता के कई प्रमाण आपको मिल जाएंगे

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2019, 04:31 AM IST

मैं अयोध्या हूं। भगवान विष्णु के चक्र पर बसी अयोध्या। सूर्य वंश की गाथा समेटे अयोध्या। तीर्थों में सबसे पहले स्मरण की जाने वाली अयोध्या। सरयू तट पर गुन-गुन करती राम नाम में मस्त अयोध्या। हम सब के लिए आदर्श जीवन और सामाजिक समरसता का संदेश देती अयोध्या। सच तो मैं ही वह अयोध्या हूं, जिसमें पुराण काल से अब तक कई धर्मों की धाराएं पूरी आभा के साथ बहती हुई मिल जाती हैं।


कहते हैं कि जब अयोध्या को बनाने के लिए विष्णु ने देव शिल्पी विश्वकर्मा को भेजा था, तभी यह तय हो गया था कि यह नगरी पूरी दुनिया के लिए आकर्षण का केंद्र बनेगी। मैंने देखा है कि किस तरह मेरे आंगन में इक्ष्वाकु वंशबेल कैसे पनपी और आगे बढ़ी। कितने राजा, कितने ऋषि और कितने संत यहीं हुए और पूरी दुनिया को सहज जीवन का पाठ समझाने में सफल रहे। मैंने देखा है कि किस तरह सामाजिक समरसता राज्य की नैतिक जिम्मेदारी बनती है। मैं ही हूं जो बता सकती हूं कि राम राज्य के क्या मायने होते हैं।

 

पौराणिक धर्मग्रंथों को खंगाल डालिए, मेरी सुंदरता और सहजता के कई प्रमाण आपको मिल जाएंगे। स्वयं संत वाल्मीकि ने मेरी सड़कों, तोरण द्वार, परकोटों की साज-सज्जा और सफाई का उल्लेख किया है। इतिहास गवाह है कि मेरे पास जो भी आया है वह मेरा होकर ही गया है, भले ही वह मुझे पिकोसिया कहने वाला चीनी यात्री ह्वेन सांग ही क्यों न हो। मेरा आंगन ही इतना सुंदर नहीं था, बल्कि मुझमें बसने वाले भी इतने ही सुंदर मन-मस्तिष्क वाले थे। और, होते भी क्यों नहीं, पूरी दुनिया को आदर्श जीवन का पाठ पढ़ाने वाली कृति रामायण, मुझपर ही तो आधारित है।

 

मैं सप्त पुरियों में से एक हूं। अथर्ववेद में ईश्वर की नगरी बताया गया है मुझे और मेरी तुलना स्वर्ग से की गई है। यह यूं ही नहीं था कि राम ने अपने जन्म और अंतरध्यान होने के लिए मुझे ही चुना। मैं पहले ही बता चुकी हूं कि मैं जैन धर्म के पहले तीर्थंकर सहित 4 अन्य तार्थंकर की जन्मस्थली हूं। यह भी अहम है कि मेरे आंगन में भगवान बुद्ध ने भी सोलह बरस बिताए हैं। किन-किन का नाम गिनाऊं मैं। कई-कई धर्म, कई-कई सम्प्रदाय मुझमें शामिल हैं।

 

मैं मोक्ष प्रदान करने वाले नगरियों में से एक हूं। कभी सरयू के तट पर आकर बैठिए तो सही। पल-पल में आवाज देती है सरयू। मेरी आप बीती सुनाती है यह नदी। यह केवल नदी नहीं है। जीवन के विविध आयामों को सहजता से कह देने वाली एक किताब है। वह कहती आ रही है हजारों बरसों से यही सत्य कि मैं अयोध्या हूं। कभी न जीती जा सकने वाली अयोध्या। सच, मैं हार-जीत से परे हूं। मैं अयोध्या हूं।

 

- डॉ. धनंजय चोपड़ा (प्रभारी, सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज, इलाहाबाद विश्वविद्यालय)

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना