भास्कर संपादकीय / ताकि व्यर्थ न जाए गंगा के लिए एक ऋषि का बलिदान

Dainik Bhaskar

Oct 13, 2018, 12:04 AM IST



Bhaskar editorial on sage professor GD Agarwal
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  • प्रोफेसर जीडी अग्रवाल चाहते थे- सरकार गंगा को बचाने के लिए संसद से गंगा संरक्षण प्रबंधन अधिनियम पास कराए
  • अगर यह संभव न हो सके तो गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए अध्यादेश जारी करे

गंगा को निर्मल और अविरल बनाने के लिए सही अर्थों में भारतीय ऋषि प्रोफेसर जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद ने 111 दिनों तक आमरण अनशन करके जान दे दी। वे चाहते थे कि सरकार गंगा को बचाने के लिए संसद से गंगा संरक्षण प्रबंधन अधिनियम पास कराए और अगर वह न हो सके तो अध्यादेश जारी करे। जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने उन्नाव तक गंगा में पर्यावरणीय बहाव सुनिश्चित करने की मांग स्वीकार की थी लेकिन, प्रोफेसर अग्रवाल का कहना था कि यह पूरी गंगा को संरक्षित करने की योजना नहीं है। इससे इनलैंड जलमार्गों की सुरक्षा होगी, जिनका व्यावसायिक उद्‌देश्य है।

 

अग्रवाल के इस प्राणोत्सर्ग ने पूरे भारतीय समाज की आत्मा को झकझोर दिया है। हालांकि, स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर दुख जताया है लेकिन प्रोफेसर अग्रवाल ने 22 जून को उन्हें जो पत्र लिखा था वह काफी कड़ा था। उस पत्र में उन्होंने यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी से ज्यादा संवेदनशील बताया था। उनका कहना था कि डॉ. सिंह ने उनके अनशन पर गौर करते हुए लोहारी नागपाला की 90 प्रतिशत पूरी हो चुकी परियोजना को बंद करवा दिया था, जबकि मोदी की सरकार ने गंगा के प्रति चार वर्षों में कोई कायदे का काम नहीं किया। आईआईटी के प्रोफेसर रहे और देश के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सचिव रहे प्रोफेसर अग्रवाल का वह पत्र देश और दुनिया के पर्यावरण आंदोलन और विशेषकर गंगा बचाओ अभियान का घोषणा-पत्र बन सकता है।

 

वह पत्र दर्शाता है कि किस तरह व्यावसायिक हितों और पर्यावरणीय जीवन के बीच जंग छिड़ी हुई है और सरकारें व्यावसायिक हितों के साथ खड़ी हुई हैं। अगर गंगा पर बनने वाली जल विद्युत परियोजनाएं बंद की जाती हैं तो आधुनिक सभ्यता को बिजली कहां से मिलेगी और अगर वे परियोजनाएं बनती रहेंगी तो गंगा कैसे बचेगी। एक वैज्ञानिक और आधुनिक ज्ञान से संपन्न ऋषि प्रोफेसर अग्रवाल इस दुनिया से ऊपर उठ गए थे और इसीलिए उन्होंने औद्योगिक सभ्यता से गंगा को बचाने के लिए जान दे दी। जो लोग आधुनिकता और पर्यावरण दोनों की चिंता में फंसे हुए हैं वे ऐसे ही गंगा के साथ और उनके लिए कभी स्वामी निगमानंद तो कभी स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद को जान देते हुए देख रहे हैं। आशा है उन लोगों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।

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