संपादकीय / ममता और समता के बीच लोकतंत्र बचाने की पुकार



Call to save democracy between Mamata and Samata
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Call to save democracy between Mamata and Samata

  • लोकतंत्र बचाओ सत्याग्रह में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के पहुंचने से विपक्षी एकता की कोशिशों में तेजी आएगी

Dainik Bhaskar

Feb 14, 2019, 01:28 AM IST

दिल्ली के जंतर मंतर पर बुधवार को लोकतंत्र बचाओ सत्याग्रह में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के पहुंचने से विपक्षी एकता की कोशिशों में तेजी आएगी। आम आदमी पार्टी का यह आयोजन 19 जनवरी की कोलकाता की महारैली से आगे का चरण है।

 

आसार तो है कि यह मामला सिर्फ भाषण और रैली तक ही सिमट कर नहीं रह जाएगा बल्कि कांग्रेस, सपा, बसपा, टीडीपी, जनता दल (एस), राजद और वामपंथी दलों समेत दूसरे समानधर्मा दलों के बीच मुकम्मल रणनीति बनेगी। कोलकाता में 15 दलों की रैली में पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने जो सुझाव दिए थे उन पर अमल होगा और प्रधानमंत्री के सवाल पर बना विभाजन दूर होगा।

 

हालांक यह आसान नहीं है। दलों के क्षेत्रीय अंतर्विरोध अभी भी कायम हैं। इसकी झलक तब मिली जब ममता के मंच पर आते ही वामपंथी नेता वहां से हट गए। हालांकि वे रैली से नहीं गए। इससे पहले माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने संघ और भाजपा को शकुनि और दुशासन बताते हुए उनसे लोकतंत्र को बचाने की अपील की और कहा कि इस मुद्‌दे पर हम साथ हैं।

 

ममता बनर्जी ने हाल में पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से सीबीआई पूछताछ के मसले पर धरने पर बैठकर अपनी ओर पूरे देश का ध्यान खींचा है। इस बीच आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने के लिए दिल्ली में अनशन करके विपक्षी एकता कायम करने की कोशिश की थी। दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी रफाल सौदे के मामले में केंद्र सरकार और सीधे प्रधानमंत्री पर आरोप लगाने में लगे हुए हैं।

 

कांग्रेस की नई महासचिव प्रियंका वाड्रा अगर  लखनऊ रोड शो के माध्यम से चर्चा में हैं तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को प्रयागराज जाने से रोककर उन्हें भी खबरों में ला दिया है। एक तरह से विपक्षी नेताओं के बीच पहले नंबर पर आने के लिए प्रतिस्पर्धा चल रही है तो दूसरी ओर ममता का यह भी कहना है कि सवाल यह नहीं है कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा बल्कि सवाल मोदी बाबू को हटाने का है। देश में दो गठबंधनों के बीच ही सत्ता का बंटवारा होना है। दरार एनडीए में भी पड़ चुकी है, जबकि यूपीए में दरार ज्यादा है। विपक्षी नेता अगर अपनी महत्वाकांक्षा काबू करने में सफल हुए तो ही वे अपने मकसद में कामयाब हो सकते हैं । 

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