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कानून नहीं, सोच में बदलाव से होगा दुष्कर्म का निदान

8 महीने पहले
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प्रतीकात्मक फोटो।
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पूरा देश नाराज है, संसद गुस्से में है और सरकार फिर एक बार ‘एक्शनमोड’ में। दिल्ली में निर्भया कांड के सात साल अब हैदराबाद की एक महिला पशु-चिकित्सक पुरुषों की इस ‘दानवता’ का शिकार हुई है। पुलिस के अनुसार दरिंदे दुष्कर्म के बाद मृत शरीर के साथ भी कई बार कुकृत्य करते रहे। पहली घटना के बाद भी कानून सख्त किया गया। इस बार भी रक्षामंत्री व गृह राज्यमंत्री इसे और सख्त बनाने का वादा कर रहे हैं। पहली सख्ती से दुष्कर्म तो रुका नहीं, बल्कि अब गैंगरेप ज्यादा होने लगे हैं। हमें समझना होगा कि दुष्कर्मी जब कुकृत्य करता है तो वह यह नहीं सोचता कि आईपीसी में सजा कितने साल की है। दरअसल, यह घृणित सोच से उपजी एक व्यक्तिगत मानसिक बीमारी है, जो प्रभावी ढंग से न रोके जाने के कारण गैंगरीन बन समाज में फैल रही है। नई तकनीक से एक 12-14 साल का बच्चा भी नेट पर वह सबकुछ देख सकता है जो उसके दिमाग को इस अपराध की ओर उन्मुख करे। कुछ वर्षों पूर्व की लांसेट की एक रिपोर्ट बताती है कि एशियाई देशों के पुरुष समाज की सोच में ही समस्या है, जिसमें 70 प्रतिशत दुष्कर्मी इस किस्म के घृषित काम को अपना अधिकार मानते हैं और उनमें 50 फीसदी दुष्कर्म के बाद भी खुद को अपराधी नहीं मानते। जब तक माता-पिता, परिवार, धर्मगुरु, शिक्षक और सभी सामाजिक संगठन जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इसके लिए नई क्रांति के भाव से काम नहीं करेंगे, यह बीमारी फैलती जाएगी। संघ एक बेहद सक्षम, सामाजिक स्तर पर स्वीकार्य और व्यापक संस्था है। इसके तमाम प्रकल्प उत्थान के अनेक प्रयास कर रहे हैं। लेकिन, अब समय आ गया है नए दौर और तकनीक के कुप्रभाव में विलुप्त हो रही नैतिकता को पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए सीधे तौर पर प्रकल्प बनाया जाए। यहां तक कि मां-बाप या चाचा जैसी संस्थाएं जो एक जमाने में युवाओं को बहकने से बचाने में पुलिसिंग का काम करती थीं, वे भी अब इसमें दिलचस्पी नहीं दिखातीं कि रोजाना पढ़ने की जगह किशोर क्यों मोबाइल पर लगा रहता है। चूंकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जन-स्वीकार्यता अभी भी बनी हुई है, लिहाज़ा उन्हें भी अपने उद्बोधनों में इसे व्यापक रूप से शामिल करना होगा। एक ‘मन की बात’ कार्यक्रम में मोदी ने अभिभावकों को कहा था कि वे शाम को बेटी कहां जा रही है, इसकी चिंता तो करते हैं, लेकिन बेटा क्या कर रहा है यह चिंता उन्हें नहीं रहती। 

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