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शशि थरूर ने महिलाओं को मैन्स्ट्रुएशन लीव देने की वकालत की है। इसके लिए उन्होंने बाकायदा एक ऑनलाइन याचिका के समर्थन में ट्वीट किया है। बदले में इसके थरूर को सशक्त महिलाओं की बिरादरी की नाराजगी झेलनी पड़ी है। महिलाओं से जुड़ी इस रूटीन बायोलॉजी को हौव्वा बना देना उन्हें किसी भी लिहाज से सशक्त नहीं करेगा। गौरतलब है कि थरूर ने यह ट्वीट अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर किया था जो किसी भी लिहाज से महिला सशक्तिकरण को लेकर उठाया कदम नहीं हो सकता। महिलाओं की आबादी की आधी जनसंख्या और दुनिया की जनसंख्या का 26% हर महीने 2 से लेकर 7 दिनों तक मासिक धर्म से गुजरता है। वहीं कार्यस्थल पर आज भी महिलाओं के पास दुनियाभर के पुरुषों के मुकाबले एक तिहाई ही अधिकार हैं। अमेरिका जैसे देश में 42% महिलाओं ने माना कि उनके साथ दफ्तर में उनके जेंडर की वजह से भेदभाव होता है। जिसमें पुरुषों के मुकाबले कम वेतन मिलना, कम अहमियत वाला काम करवाना, प्रमोशन न देना और अलग-थलग महसूस करवाना शामिल है। यदि इन सब चुनौतियों के बीच महिलाओं को मैन्स्ट्रुएशन लीव दी जाने लगी तो महिलाओं और पुरुष सहकर्मियों के बीच की खाई और गहरी हो जाएगी। किसी भी लिहाज से यह छुट्टी उनके लिए मददगार साबित नहीं हो सकती। कितने ही उदाहरण है जब महिला खिलाड़ियों ने पीरियड्स के दौरान ही किसी महत्वपूर्ण टूर्नामेंट में भाग लिया और अपना बेहतरीन प्रदर्शन कर मेडल भी जीता। मासिक धर्म से जुड़ी सभी शारीरिक चुनौतियों का सामना करते हुए महिलाओं ने इस दौरान दफ्तर में लंबे वक्त तक काम करने, दौड़ने-भागने और एक्सरसाइज करने जैैसे सभी काम किए हैं। यूं भी पहले ही छह महीने की बेहद अहम मैटरनिटी लीव मिलने पर देश के वर्किंग फोर्स में मौजूद पुरुष सहकर्मियों की प्रतिक्रिया कुछ ज्यादा उत्साहजनक नहीं रही है। यही नहीं इस लीव की लड़ाई के लिए कितनी महिलाओं को नौकरी छोड़नी पड़ी है और जिनकी जीत हुई उन्हें दफ्तर में फब्तियां झेलनी पड़ी हैं। तो क्या यह नई छुट्टी महिलाओं को कार्यस्थल पर और पीछे धकेलने का षडयंत्र नहीं? थरूर यदि कुछ करना ही चाहते हैं तो मासिक धर्म से जुड़ी पाबंदियों के पाखंड को खत्म करने को लड़ें। जबकि वह खुद सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री को गैरजरूरी कह चुके हैं।
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