संपादकीय / कैसे कोई राज्य केंद्र का अविवेकपूर्ण कानून माने



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Dainik Bhaskar

Sep 12, 2019, 12:43 AM IST

गुजरात सरकार ने अन्य राज्यों के लिए रास्ता दिखाया है। केंद्र सरकार द्वारा पारित नया मोटर वेहिकल्स एक्ट असंवेदनशील, गैर-जिम्मेदाराना और नामुमकिन-उल-अमल माना गया। एक उदाहरण लें। अगर किसी गाड़ी पर एम्बुलेंस या अग्निशमन वाहन को अवरुद्ध करने का आरोप है तो जुर्माना 10,000 रुपए। जाहिर है यह उल्लंघन पहले तो किस स्थिति में ‘अवरोध’ माना जाएगा और क्या यह मात्र दोनों किस्म के वाहनों की ओर से शिकायत या ट्रैफिक पुलिस की स्वेच्छा पर निर्भर करेगा, यह स्पष्ट नहीं है।

 

फिर क्या यह ट्रैफिक पुलिस की कमाई का जरिया नहीं बन जाएगा? कानून को सख्त करना भारत जैसे देश में जरूरी है, क्योंकि बाकी कोई भय या नैतिकता समाज के एक बड़े भाग की डिक्शनरी से आदतन गायब है। ऐसे में उल्टी दिशा से या शराब पीकर गाड़ी चलाने या लालबत्ती पार करने की सजा सख्त होनी ही चाहिए और राज्यों को इनमें बदलाव की छूट इस कानून ने नहीं दी है (हालांकि, गुजरात सरकार ने उल्टी  दिशा में गाड़ी चलाने के जुर्माने को भी काफी कम कर दिया है, जो उचित नहीं है)।

 

अक्सर खबरों में आता है कि 26 साल का रईसजादा रातभर शराब-पार्टी में नशे के बाद रफ्तार से महंगी गाड़ी चलाते हुए फुटपाथ पर सोये मजदूरों या अल-सुबह टहलने गए बुजुर्ग दंपति को कुचलता हुआ निकल गया। लिहाजा इस कानून की जरूरत काफी समय से थी, लेकिन अगर कोई दंपति बगैर हेलमेट पहने स्कूटर पर बच्चे को लेकर पास के स्कूल में छोड़ने गया है या भूलवश प्रदूषण प्रमाण-पत्र एक या दो दिन न लेने पर 10,000 रुपए जुर्माना निम्न और मध्यम वर्ग के लिए दहशत पैदा करने वाला है और पुलिस के लिए धन-उगाही का अच्छा साधन भी।

 

उत्तरप्रदेश, बिहार, कर्नाटक और ओडिशा ने इसे यथावत स्वीकार करते हुए अधिसूचना ही नहीं जारी की बल्कि कुछ राज्य जरूरत से ज्यादा सक्रियता दिखाने लगे जिससे लोगों में आक्रोश है। न्यायशास्त्र की दुनिया में वह कानून सबसे बुरा माना जाता है जो बने, लेकिन जिसका पालन मुश्किल हो या जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिले। कुछ किस्म के उल्लंघन पर इस कानून की सख्ती स्वागत-योग्य है, लेकिन कम से कम कम्पाउंडेबल श्रेणी के उल्लंघन (जिसमें राज्यों के बदलाव के अधिकार हैं) में राज्य सरकारों को जुर्माना कम करना होगा और पुलिस के भ्रष्टाचार के खिलाफ भी सतर्क रहना होगा अन्यथा यह कानून क्रूर मजाक बनकर रह जाएगा।

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