संपादकीय / चंद्रयान-2 का सफल प्रक्षेपण स्पेस टेक्नोलॉजी में नया मुकाम



dainik bhaskar editorial on chandrayaan-2 mission
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dainik bhaskar editorial on chandrayaan-2 mission

Dainik Bhaskar

Jul 23, 2019, 09:22 AM IST

प्रागैतिहासिक काल से ही मानव को मोहित करने वाले चंद्रमा पर 20 जुलाई 1969 को पहली बार मानव के कदम पड़े। उस घटना को भले ही पचास साल पूरे हो गए पर चंद्रमा की पड़ताल जारी है। आज तक अमेरिका, रूस, जापान, यूरोप व चीन के साथ भारत ने भी चंद्र अभियान सफलता से पूरा किया है।

 

चंद्रमा अस्तित्व में कैसे आया यह चाहे अब भी पक्के तौर पर कहना संभव न हो पाया हो पर वहां पहुंचने वाले मानवरहित यानों से नए व महत्वपूर्ण तथ्य उजागर हुए हैं। ‘चंद्रयान-1’ ने चंद्रमा की सतह पर पानी की मौजूदगी के सबूत सबसे पहले दुनिया के सामने प्रस्तुत किए और साथ ही यह भी बताया कि चंद्रमा पर आज भी भूकंप जैसे झटके आते हैं। ‘क्लेमेंटाइन’ के कारण चांद के दक्षिण ध्रुव के स्वरूप का पता चला और वहां पानी होने की संभावना प्रबल हुई। ‘प्रॉस्पेक्टर’ ने चंद्रमा की सतह के समीप स्थित चंुबकीय क्षेत्र का मानचित्र बनाया।

 

चीन का ‘चांग ई 4’ चांद के पृथ्वी से नज़र न आने वाले हिस्से पर उतरा। कुल-मिलाकर इन सारे अभियानों से चांद के कई पहलुओं के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्राप्त होने के साथ नया विज्ञान व नई टेक्नोलॉजी विकसित हुई। ‘चंद्रयान-2’ के जरिये भारत पहली बार चांद की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास करेगा और ऐसा करने वाला वह दुनिया का चौथा देश होगा। सोमवार को ‘चंद्रयान-2’ के सफल प्रक्षेपण के लिए इसरो की टीम अभिनंदन की पात्र हैं।

 

चंद्रमा के अभियानों को चाहे पचास साल हो गए हों पर पूरी दुनिया को ‘चंद्रयान-2’ में उतनी ही दिलचस्पी है, जितनी कभी ‘अपोलो 11’ को लेकर रही होगी, क्योंकि नई टेक्नोलॉजी की मदद से नई जानकारी सामने आने की उम्मीद है। अगर हम विभिन्न देशों के मून मिशन्स पर निगाह डालें तो लगता है कि इसमें स्पर्धा फिर जोर पकड़ रही है।

 

चीन 2035 तक चांद पर मानव भेजने की तैयारी में लगा है तो अमेरिका भी फिर से चांद पर किसी अमेरिकी के कदमों की छाप छोड़ना चाहता है। ‘अपोलो’ की बहन ‘आर्टेमिस’ का नाम शायद इस मिशन को दिया जाए और 2028 तक चंद्रमा पर फिर किसी अमेरिकी के कदम पड़ेंगे। भारत ने आज तक स्पेस रिसर्च की सत्ता-स्पर्धा से दूर रहकर प्रगति का आदर्श सामने रखा है। हो सकता है कि आगामी दशक में भारत को अपना यह आदर्श छोड़ना पड़े। तब तक स्पेस टेक्नोलॉजी में हमारी तरक्की अबाधित जारी रहे, चंद्रयान-2 मिशन उसी दिशा में नया मुकाम है।

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