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राजनीति शास्त्र में जीव की तरह राजनीतिक दल भी जैविक माने जाते हैं। मानव चेतना की एक मेडिकल स्थिति होती है ‘कोमा’ और दूसरी ‘वेजिटेटिव स्टेट’। कोमा में व्यक्ति सोया लगता है, शरीर व दिमाग प्रतिक्रिया देना बंद कर देता है, लेकिन सिर्फ रिलेक्स एक्शन ही उसके जिंदा होने की सनद है। चोट लगने पर भी शरीर प्रतिक्रिया नहीं देता, लेकिन कभी-कभी अंगुलियां हिलती हैं, सांसें अनियमित रूप से चलती हैं। वेजिटेटिव स्टेट में आंखें खुली होने से चैतन्यता का अहसास तो होता है पर दिमाग के काम न करने के कारण बाहरी दुनिया से असंबद्धता रहती है। मेडिकल विज्ञान के अनुसार इस स्थिति में ‘लिक्विड व ऑक्सीजन चेंबर में होते हैं, लिहाज़ा लिक्विड रोगी को जीने नहीं देता और ऑक्सीजन मरने नहीं देता’। कांग्रेस अब इसी स्थिति की ओर जा रही है। गाहे-बगाहे रिफ्लेक्स एक्शन में अंगुलियां हिलने की तरह चुनावी हार के झटके इसे जीवन में लाने की उम्मीद बंधाते हैं। केंद्रीय नेतृत्व को पहला झटका तब लगा जब असम के एक कद्दावर नेता ने पार्टी छोड़ भाजपा ज्वाइन करते हुए कहा कि ‘मैं तीन दिन बैठा रहा पर दिल्ली नेतृत्व नहीं मिला और एक बार जब बात हुई भी तो उस तरह जिसके बारे में ग़ालिब ने कहा था ‘ये क्या कि तुम कहा किए, और वो कहें कि याद नहीं’। असम हाथ से निकल गया। पहले जनमंचों से पीएम की आलोचना से रिफ्लेक्स एक्शन का अहसास तो होता था, लेकिन जब मध्यप्रदेश की हालत पर प्रतिक्रिया तो दूर, नेतृत्व ने मुख्यमंत्री से ही नहीं, दूसरे सबसे कद्दावर युवा नेता से मिलने से इनकार कर दिया तब लगा कि शायद पार्टी नेतृत्व की आंखें खुली हैं पर बाहरी दुनिया का अहसास नहीं है। राज्य में दोनों नेताओं की लड़ाई इस हालत में इसलिए पहुंची कि नेतृत्व ने प्रभावी अंकुश नहीं लगाया। 1970 के दशक के मध्य एक कांग्रेसी प्रधानमंत्री ने कई बार मुख्यमंत्रियों को अलसुबह बुलवाकर मिलने की जगह किसी पीए से कहलवा दिया कि इस्तीफा दे दो, लेकिन आज यह व्यवहार इसलिए सफल नहीं होगा कि बगल में दूसरा राजा, जिसकी ताकत और प्रसिद्धि भी कई गुना ज्यादा है, उसे बड़ा मंसब देने को तैयार है। नेतृत्व इस बात से भी गाफिल है कि अगला नंबर राजस्थान का हो सकता है। जनता यह अहसास दिला रही है कि 135 साल पुरानी पार्टी की जिंदगी के लिए जरूरी ऑक्सीजन तो है पर लिक्विड संकट पैदा कर रहा है।
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